श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः
पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा – १४ – भागवत अपचार) में हमने भागवत अपचार के दुष्प्रभावों को देखा था। हम इस भाग को जारी रखेंगे जिसमें बताया गया है कि सामान्य रूप से आचार्यों और श्रीवैष्णवों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए और उनकी सेवा कैसे की जाए – विशेष रूप से आचार्य/भागवत प्रसाद (भोजन के अवशेष) और श्रीपाद तीर्थ/चरणामृत (पवित्र जल जो उनके चरण कमलों को शुद्ध करता है) की महिमा बताया गया है।
योसौ मन्त्रवरं प्रादात् संसारोच्छेद साधनम् |
यदि चेद्गुरुवर्यस्य तस्य उच्छिष्टं सुपावनम् ||
सरल अनुवाद: यदि आचार्य जो किसी को संसार से ऊपर उठाने के लिए तिरुमन्त्रम् से अनुग्रहित करते हैं, और उनके द्वारा ग्रहण किये गये भोजन का अवशेष प्रदान करते हैं, तो उसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वह शुद्ध है।
गुरोर्यस्य यतोच्छिष्टं भोज्यं तत्पुत्रशिष्ययोः |
सरल अनुवाद: शिष्य और पुत्रों के लिए गुरु के अवशेषों को ग्रहण करना उचित है।
गुरोर् उच्छिष्टं भुञ्जीतः |
सरल अनुवाद: हमें आचार्य के अवशेषों को पाना चाहिए।
उपरोक्त प्रमाणों और पहले उद्धृत अनेक प्रमाणों के आधार पर, उन शिष्यों (जो परम आचार्य निष्ठा में स्थित हैं) के लिए जो पूर्ण रूप से विश्वास रखते हैं कि उनके आचार्य स्वयं सर्वेश्वर के अवतार हैं, ऐसे आचार्य का प्रसाद (भोजन) और उनके श्रीपाद तीर्थ (प्रक्षाल्य चरणौ पात्रे प्रणिपत्योपयुज्य च ; नित्यं विधिवदर्घ्याद्यैर आवृत्तोप्यर्च्चयेत् गुरुम् – आचार्य के चरणकमलों को धोना चाहिए/प्रक्षालन करना चाहिए और उनके सामने झुकना चाहिए। प्रतिदिन अर्घ्य आदि देकर उनके चरण कमलों की पूजा करनी चाहिए। ) सबसे पवित्र माना जाता है और उस शिष्य को स्तनपान करने वाले बच्चे के लिए माँ के दूध की तरह पोषण/प्रसन्न करता है। यह शिष्य के जीवन भर के लिए सबसे आनंददायक विषय होगा।
आचार्य के प्रति शिष्य के दृष्टिकोण के लिए और भी प्रमाण नीचे दिए गए हैं।

गङ्गासेतुसरस्वत्याः प्रयागान् नैमिशादपि |
पावनं विष्णुभक्तानां पादप्रक्षालनोदकम् ||
सरल अनुवाद: विष्णु के भक्त के श्रीपाद तीर्थ , गंगा, सेतु समुद्र, सरस्वती, प्रयाग, नैमिशारण्यम् सभी बहुत शुद्ध हैं (और दूसरों को शुद्ध कराने में सक्षम हैं) |

यत् तत्समस्तपापानां प्रायश्चित्तं मनीषिभिः |
निर्णीतं भगवद्भक्तपादोदक निषेवणम् ||
सरल अनुवाद: विद्वानों ने निष्कर्ष निकाला है कि भगवान के भक्त के श्रीपाद तीर्थ का सेवन करना सभी प्रकार के पापों का प्रायश्चित है।

तिस्र:कोट्यर्त्तकोटि च तीर्थानि भुवनत्रये
वैष्णवांघ्रि जलात् पुण्यात् कोटि भागेन नो समः ||
सरल अनुवाद: तीनों लोकों (ब्रह्मांड की ऊपरी, मध्य, निचली परतें) की सभी पवित्र नदियाँ मिलकर भी एक वैष्णव के श्रीपाद तीर्थ की तुलना में कुछ भी नहीं हैं।
प्रायश्चित्तं इदं गुह्यं महापातकिनामपि |
वैष्णवांघ्रि जलं शुभ्रं भक्त्या सम्प्राप्यते यदि ||
सरल अनुवाद: सबसे अधिक घृणित पापियों के लिए भी सबसे गुप्त प्रायश्चित भगवान विष्णु के भक्त के दोषरहित श्रीपाद तीर्थ को स्वीकार करना है।
नारदस्यातितेः पादौ सर्वासां मन्दिरे स्वयम् |
कृष्ण प्रक्षाल्य पाणिभ्यां पपौ पादोदकं मुने: ||
सरल अनुवाद: उन्होंने (कृष्ण ने) स्वयं नारद और अतिथि आदि ऋषियों का पदप्रक्षालन किया और उसका (श्रीपाद जल का) सेवन किया।
पेरुमाळ तिरुमोळि २.३
तॊण्डर्चेवड़ी सॆऴुम् सेऱु ऎन् सॆन्निक्कणिवने |
सरल अनुवाद: भक्तों के चरण कमलों से कुचला गया पंक मेरे सिर को सुशोभित करे।
पेरुमाळ तिरुमोळि २.२
तॊण्डरडिप्पॊडि आड नाम् पॆऱिल् गङ्गै नीर् कुडैन्दाडुम् वेट्कै ऎन्नावदे |
सरल अनुवाद: उन श्रीवैष्णवों के चरण कमलों से संबंध प्राप्त करने के पश्चात, जो श्रीमन् नारायण के निरन्तर स्मरण के कारण पवित्रतम हैं, गंगा स्नान के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहा।
तत् पादाम्वदूलं तीर्थं तदुच्छिष्टं सुपावनम् |
तदुक्तिमात्रं मन्त्राग्र्यं तत्स्पृष्टं अखिलं शुचि ||
सरल अनुवाद: उनके चरण कमलों को स्वच्छ करने वाला जल पवित्र है; उनके अवशेष शुद्ध हैं; उनके द्वारा बोले गए शब्द सर्वश्रेष्ठ मन्त्र हैं; उनके द्वारा स्पर्श किया गया सब कुछ स्वच्छ (दोषरहित) है।
कोटिजन्मार्जितं पापं ज्ञानतोज्ञानतः कृतः |
सत्यः प्रदह्यते नृणां वैष्णव उच्छिष्ट भोजनात् ||
सरल अनुवाद: अनेक जन्मों से जाने/अनजाने में किए गए कर्मों से संचित पाप वास्तव में एक वैष्णव के भोजन के अवशेष को खाने मात्र से भस्म हो जाते हैं।
तिरुमालै ४१
पोनगं चॆय्द चेटं तरुवरेल् पुनिदमन्ऱे
सरल अनुवाद: काश भगवान के परम संत भक्त हमें अपने पवित्रतम अवशेषों से आशीर्वाद देते! (अर्थात्, इसे प्राप्त करना बहुत कठिन है)।
इस प्रकार, उपरोक्त प्रमाणों और अन्य बातों से, हम समझते हैं कि हमें उन महान भागवतों के सबसे पवित्र भोजन अवशेषों और श्रीपाद तीर्थ की लालसा करनी चाहिए और उनका सेवन करना चाहिए, जो सबसे शुद्ध रूप से सत्व गुण में स्थित हैं, जो सबसे अधिक ज्ञानी, सबसे अधिक समर्पित और सांसारिक विषयों से सबसे अधिक विरक्त हैं और हमारे अपने आचार्यों के समान हैं। उनके प्रसाद और श्रीपाद तीर्थ का सेवन करते समय, इसे केवल शास्त्रों में बताए अनुसार स्वीकार करने के अतिरिक्त बड़े प्रेम से स्वीकार करना चाहिए क्योंकि यह श्रीवैष्णवों के प्रति एक जीवात्मा की दासता का अंतिम/परम स्थिति है और यही इस जीवात्मा को बनाए रखता है।
इसे आगे समझाया गया है। आपस्तम्ब ऋषि ने उपदेश दिया, “शरीरमेव मातापितरौ जनयत:” (शरीर माता-पिता द्वारा दिया गया है) और “पितु: ज्येष्ठस्य भ्रातुरुच्छिष्टं भोक्तव्यं” (अपने पिता और बड़े भ्राता के भोजन के अवशेष को ग्रहण करना चाहिए| ) यह कहते हुए कि शिष्यों/पुत्रों के लिए पिता के बचे हुए भोजन का सेवन करना चाहिए। उसी ऋषि ने यह भी निर्देश दिया कि, “स हि विद्यातस्तं जनयति तच्छ्रेष्ठं जन्मः” (वह वास्तव में ज्ञान को जन्म देता है। यह जन्म श्रेष्ठ है|) अर्थात् चूँकि आचार्य सच्चे ज्ञान के दाता हैं, इसलिए उन्हें एक विशेष (आध्यात्मिक) पिता भी माना जाता है। यदि यह कहा जाता है कि शारीरिक पिता के अवशेषों को स्वीकार किया जाना चाहिए, तो यह स्पष्ट है कि आध्यात्मिक पिता (महान भागवत जो हमारे आचार्य के समान ही हैं) के अवशेषों और श्रीपाद तीर्थ को स्वीकार और उपभोग किया जाना चाहिए। यहाँ सदाचार्य तुल्यर् (भागवत जो अपने आचार्य के बराबर माने जाते हैं) का अर्थ है कि जैसे कि “आचार्यवत् दैववन् मातृवत् पितृवत्” – (श्रीवैष्णव आचार्य, भगवान, माता, पिता के समान हैं) में कहा गया है, श्रीवैष्णवों के साथ अपने ही आचार्य के समान व्यवहार किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, श्रीवचन भूषण में पिळ्ळै लोकाचार्य के दिव्य शब्दों के अनुसार शुद्ध भागवत वे हैं, जिनकी व्याख्या इस प्रकार की गई है :-
सूत्रम् २५९
अनुकूलरागिरार् ज्ञानभक्तिवैराग्यङ्गळ् इट्टु माऱिनाप्पोले वडिविले तॊडै कॊळ्ळलाम्पडियिरुक्कुम् परमार्त्तर्
सरल अनुवाद: अनुकूल लोग वे होते हैं जो ज्ञान (सच्चा ज्ञान), भक्ति , वैराग्य (भौतिक वस्तुओं में आसक्ति) से भरपूर होते हैं और परमपद जाने के लिए पूर्ण रूप से लालायित रहते हैं। उनके दर्शन पाते ही, हर कोई उनका संगत पाने के लिए प्रेरित होगा – उनका भगवान के प्रति श्रद्धा हर समय उमड़ती भावनाओं से देखी जा सकती है।
सूत्रम् २२३
अदावदु आचार्यतुल्यर् ऎन्ऱुम् संसारिगळिलुं, तन्निलुम्, ईश्वरनिलुम् अधिकर् ऎन्ऱु निनैक्कै |
अर्थात्, श्रीवैष्णव आचार्य के समतुल्य हैं, तथा संसारियों (भौतिकवादी लोगों), स्वयं तथा भगवान से भी अधिक सम्माननीय हैं।
सूत्रम् ४५१
… अनुकूलर् आचार्य परतन्त्रर् …
जो शिष्य अपने आचार्य के प्रति पूर्णतः निष्ठावान है, उसके लिए सर्वाधिक अनुकूल व्यक्ति वे हैं जो पूर्णतः अपने आचार्य पर निर्भर हैं।
तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् (श्रीरङ्गनाथगुरु स्वामी) भी रामानुज नूट्रन्दादि पाशुरम् में इसी सिद्धांत को दर्शाते हैं –
पाशुरम् ८५
… रामानुसनै तॊऴुम् पॆरियोर् पादमल्लाल् ऎन्ऱन् आरुयिर्क्कु यादॊन्ऱुम् पट्रिल्लैये ।
मेरे हृदय का एकमात्र आश्रय श्री रामानुज की पूजा करने वाले महान भागवतों के चरण कमल हैं – और कुछ नहीं।
पाशुरम् १०५
… रामानुसनै तॊऴुम् पॆरियोर् ऎऴुन्दिरैत्ताडुम् इडम् अडियेनुक्कु इरुप्पिड़मे |
मेरा निवास स्थान वह है जहाँ श्री रामानुज की पूजा करने वाले महान भागवत उनकी महिमा गाते नृत्य करते हैं।
अतः भागवत वे हैं जो भौतिकवादी आकांक्षाओं के प्रति किसी भी प्रकार के प्रेम से रहित हैं, जो अपने आचार्यों के प्रति समर्पित हैं तथा ऐसे आचार्य निष्ठवानों की सेवा में निरंतर लगे रहते हैं।
इस सिद्धांत को हमारे सर्वज्ञ आचार्यों ने पर्याप्त प्रमाणों के साथ पूर्ण स्पष्टता से समझाया है। अन्य लोगों ने भी यही समझाया है। इसे तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् द्वारा रामानुज नूट्रन्दादि में समझाया गया है:

पाशुरम् ८०
नल्लार् परवुम् इरामानुसन् तिरु नामम्
नम्ब वल्लार् तिरत्तै मरवादवर्गळ् ऎवर्
अवर्के ऎल्ला विडत्तिलुम् ऎन्ऱुम् ऎप्पोदिलुम् ऎत्तॊऴुम्बुम्
सॊल्लाल् मनत्ताल् करुमत्तिनाल् सॆय्वन सोर्विन्ऱिये
सरल अनुवाद: मैं उन भागवतों की सेवा करूँगा जो परम सात्विक हैं और श्रीरामानुज के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं तथा निरंतर उनके दिव्य नाम का स्मरण करते रहते हैं। उनके लिए मैं सभी स्थानों पर, सभी कालों में, सभी प्रकार से अपने वचनों, मन और कर्मों के माध्यम से बिना किसी आलस्य के सेवा करूँगा।
पाशुरम् १०७
इन्बुट्र सीलत्तिरामानुस ऎन्ऱुम् ऎव्विडत्तुम्
ऎन्बुट्र नोयुडल् तोऱुम् पिऱन्दिऱन्दु
ऎन्नरिय तुन्बुट्रु वीयिनुम् सॊल्लुवदॊन्ऱुण्डु
उन् तॊण्डरकट्के अन्बुट्रिरुक्कुम् पड़ि ऎन्नै आक्की अङ्गाट्पडुत्ते
सरल अनुवाद: प्रिय रामानुज! आप परम दयालु हैं, जो स्वयं मेरे हृदय में आये हैं और इसे महान आशीर्वाद मानते हैं, यद्यपि मैं परम दीन हूँ। मेरा आपसे एक निवेदन है। आप सुनिश्चित करें कि मैं आपके प्रिय सेवकों के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहूँ, चाहे मैं अनेक नीच योनियों में जन्म लूँ, किसी भी रोग से ग्रस्त रहूँ और जहाँ भी, जिस भी अवस्था में जन्म लूँ।
जब कूरत्ताऴ्वान् (कूरेष स्वामी) के प्रिय पुत्र पराशर भट्टर एक बड़ी सभा के सामने भगवद् विषय (तिरुवाय्मोळि कालक्षेप) का व्याख्यान कर रहे थे, तब कूरत्ताऴ्वान् की पत्नी आण्डाळ् (भट्ट की माता) वहाँ पहुँचती हैं, अपने पुत्र के सामने झुकती हैं और श्रीपाद तीर्थ स्वीकार करती हैं। यह देखकर, गोष्ठी में एक श्रीवैष्णव कहते हैं, “एक माँ अपने ही पुत्र के सामने कैसे झुक सकती हैं और उससे श्रीपाद तीर्थ स्वीकार कैसे कर सकती हैं?” और आण्डाळ् उन्हें सभा सहित उत्तर देती हैं, “प्रिय पुत्रों! यदि कोई कहता है कि ‘हम उस भगवान के पवित्र जल और प्रसाद को स्वीकार कर सकते हैं, जिन्हें दूसरों ने प्रतिष्ठा किया है, अपितु उस भगवान के पवित्र जल और प्रसाद कैसे ग्रहण कर सकता हूँ, जिन्हें मैंने स्थापित किया है?’, ऐसे लोग शुष्क हृदय वाले हैं और उन्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है – है न?”। इस घटना को तिरुप्पावै व्याख्यान में अऴगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् (रम्यजामातृदेव स्वामी) ने समझाया है। आण्डाळ् ने अपने ही बेटे से तीर्थ क्यों स्वीकार किया?
क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि:
न परीक्ष्य वयो वन्द्या: नारायणपरायणा: – श्रीमन्नारायण के भक्त की योग्यता को उसकी आयु, क्षमताओं के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए और
पेरुमाळ् तिरुमोळि ७.६ –… वण्ण चॆञ्चिऱु कैविरलनैत्तुम् वारि वाय्कॊण्ड अडिसिलिन् मिच्चिल् उण्ण पॆट्रिलेन् ओ कॊडुविनैयेन् … – कुलशेखर आळ्वार् माता देवकी के भाव में गाते हैं – मैं इतनी दुर्भाग्यशाली हूँ कि मैं उन निवालों को नहीं खा सकी जो कृष्ण के मुँह से गिर रहे थे जब वह अपने सुन्दर लाल उँगलियों से चावल उठाकर मुट्ठी भर खाया था |
जारी रहेगा…
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अडियेन् जानकी रामानुज दासी
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