श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः
<< आचार्य/भागवत प्रशाद और श्रीपाद तीर्थ
पिछले लेख में हमने आचार्यों और भागवतों के प्रसाद और श्रीपाद तीर्थ की महिमा का अवलोकन किया था। हम अगले भाग को जारी रखेंगे जिसमें श्रीवैष्णवों के जन्म पर ध्यान दिए बिना उनकी महिमा पर चर्चा की गई है।

श्री रम्यजामातृदेव स्वामी (अऴगिय मणवाळप् पेरुमाळ् नायनार्) जो पिळ्ळै लोकाचार्य के दिव्य अनुज थे , आचार्य हृदयम् में गहन और सुंदर अर्थों से अनुग्रहित करते हैं।
८५ वें चूर्णिका में, वे सर्वप्रथम इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि, जो लोग निम्नलिखित घटनाओं को समझते हैं, केवल वे ही वास्तव में एक श्रीवैष्णव के जन्म की प्रकृति को जान पाएँगे – उच्च या निम्न (अनुवादक टिप्पणी: निम्नलिखित अनुभाग स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि किसी की महानता जन्म से नहीं बल्कि भगवान और भागवतों के प्रति उनकी भक्ति से आँकी जाती है। आधुनिक काल और युग में, जहाँ सब कुछ विशुद्ध रूप से शारीरिक विषयों के आधार पर महत्ता दी जाती है, हमारे पूर्वाचार्यों का साहित्य और उनका जीवन हमारे लिए समझने और अनुसरण करने तथा शारीरिक विचार से ऊपर उठकर जीवन जीने के लिए आदर्श उदाहरण हैं। मनोहर विषय यह है कि हमारे पूर्वाचार्य परम आस्तिक थे (वर्णाश्रम धर्म का सख्ती से पालन करने वाले), जो अपनी भक्ति के आधार पर सभी वर्णों के भागवतों का सम्मान करना जानते थे)।
- म्लेच्छनुम् भक्तनानाल् चतुर्वेदीगळ् अनुवर्त्तिक्क अरिवु कुडुत्तु कुलदैवत्तॊडॊक्क पूजै कॊण्डु पावन तीर्थप्रसादनाम् ऎन्गिऱ तिरुमुखप्पडियुम् – भगवान स्वयं कहते हैं कि उनके वास्तविक भक्तों में आठ गुण होने की अपेक्षा की जाती है और यदि कोई म्लेच्छ (जो वर्णाश्रम धर्म का भाग नहीं है) में ये आठ गुण हों – चतुर्वेद के विशेषज्ञ उन्हें स्वीकार करते हैं और उनके साथ कम से कम, भगवान के समान व्यवहार करते हैं (वास्तव में हमें उनका भगवान से भी अधिक सम्मान करना चाहिए/व्यवहार करना चाहिए) – अर्थात, उनके साथ भगवद् विषय साझा करते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनके श्री पाद तीर्थ और शेष प्रसाद को स्वीकार करते हैं क्योंकि इससे वे शुद्ध हो जाएँगे। वे आठ गुण हैं: 1) भगवान के भक्तों के प्रति अनन्य प्रेम, 2) भगवान की (दूसरों द्वारा) पूजा का आनंद लेना, 3) स्वयं भगवान की पूजा करना, 4) बिना किसी अभिमान के रहना, 5) भगवान के बारे में सुनने में आसक्ति रखना, 6) भगवान के बारे में सुनने/सोचने/बोलने पर शारीरिक परिवर्तन (जैसे रोंगटे खड़े होना, आदि), 7) सदा भगवान के बारे में सोचना, 8) भगवान की पूजा के बदले में भौतिक लाभ की माँग न करना।
- विश्वामित्र – विष्णुचित्त – तुलसी भृत्यरोडे उळ्कलन्दु तॊऴुकुलमानवन् निलैयार् पाडलाले ब्राह्मण वेळ्विक्कुऱै मुडित्त्तमैयुम् – नम्पाडुवान् (जिन्होंने तिरुक्कुरुंगुडी में मलै नम्बि भगवान के लिए कैशिक राग गाया – इस प्रकार उनकी तुलना विश्वामित्र ऋषि, श्रीविष्णुचित्त (पेरियाऴ्वार्) और श्रीभक्ताङ्घ्रिरेणु (तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार्) से की गई, जिन्होंने भगवान के लिए तिरुप्पळ्ळिऎऴुच्ची (भगवान को योगनिद्रा से जगाने के लिए गाई गई गीत) गाया), जो उच्च कुल में अवतरित नहीं हुए थे, उन्होंने अपने गीतों के फल से ब्रह्म राक्षस (एक ब्राह्मण जो एक यज्ञ के समय मंत्रों के अनुचित उच्चारण के कारण राक्षस बन गया) को शाप से मुक्त कर दिया ।
- कीऴ्मगन् तलैमगनुक्कु समसखावाय्, तम्बिक्कु मुन् पिरन्दु वेलुम् विल्लुम् कोण्डु पिन् पिरान्दारै सोदित्तु तमैयोन् इळैयोन् सत्भावम् सॊल्लुम्पडि एककुलमानमैयुम् – निषाद राज गुह, जो एक शिकारी परिवार में जन्मा था, परंतु भगवान (श्री राम) के प्रिय सखा और भाई बन गया, उसे इळैय भगवान् (लक्ष्मण) पर शक हुआ, जब भगवान रात में निद्रा कर रहे थे। इसलिए गुह जागता रहा और पूरी रात लक्ष्मण को देखता रहा। साथ ही, जब भरत (जो श्री राम/लक्ष्मण के गुणों को भली-भाँति जानते थे) गुह से मिलने आते हैं, तो गुह भरत को लक्ष्मण की महानता के बारे में ऐसे बताता है जैसे उसे इसके बारे में पता ही न हो – किंतु गुह से यह सुनकर भरत बहुत आनंदित होते हैं – इस प्रकार सभी ५ (श्री राम, गुह, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न) एक ही परिवार बन जाते हैं।

- तूदुमोऴिन्दु वन्दवर्गळुडैय सम्यक्सगुणसह भोजनमुम् – श्रीराम का शबरी (जो एक शिकारी के घर जन्मी थी) से फल लेना और खाना; कृष्ण भगवान का भीष्म, द्रोण आदि को छोड़कर, श्री विदुर के गृह में भोजन करना; सीता माता से मिलने की बात सुनने पर श्रीराम का हनुमान (जो एक वानर हैं) को आलिंगन करना|
- ऒरुपिऱवियिले इरुपिऱवियानारिरुवर्क्कु धर्मसूनुस्वामिगळ् अग्रपूजै कॊडुत्तमैयुम् – युधिष्ठिर ने कृष्ण भगवान (जो ब्राह्मण परिवार में अवतरित नहीं हुए) को प्रथम सम्मान दिया, पेरुम्बुलीयूर अडिगळ् ने श्रीभक्तिसार योगी (तिरुमळिसै आऴ्वार्) को प्रथम सम्मान दिया जिनका पालन-पोषण एक लकड़हारे ने किया था – कृष्ण और तिरुमऴिसै आऴ्वार् दोनों के एक ही जीवन में दो जन्म हुए थे – भगवान कृष्ण क्षत्रिय माता-पिता के घर अवतरित हुए थे और वैश्य परिवार में चले गए और आऴ्वार् ब्राह्मण माता-पिता के घर जन्मे थे और लकड़हारे परिवार में चले गए।
- ऐवरिल् नाल्वरिल् मूवरिल् मुऱ्-पट्टवर्गळ् सन्देहियामल् सहजरोडे पुरोडासमागच् चॆय्द पुत्र कृत्यमुम् – युधिष्ठिर, पाँचों (पाण्डवों) में प्रधान, श्री विदुर (दासी से जन्मे) के लिए चरम कैङ्कर्य करते हैं, श्रीराम, चारों में प्रधान, जटायु (पक्षी) के लिए चरम कैङ्कर्य करते हैं और श्री महापूर्ण स्वामी (पेरिय नम्बि), जो तीन नम्बियों (पेरिय नम्बि, तिरुक्कोष्टीयूर नम्बि, तिरुमलै नम्बि) में प्रधान रहे, माऱनेरि नम्बि के लिए चरम कैंकर्य करते हैं।
- पुष्प त्याग भोग मण्डपङ्गलिल् पनिप्पूवुम् आलवट्टमुम् वीनैयुम् कैयुमान अन्तरंगरै मुडिमन्नवनुम् वैदिकोत्तमरुम् महामुनियुम् अनुवर्त्तित्त क्रममुम्
- पुष्प मंडप (तिरुमला) में श्रीवेङ्कटेश भगवान (तिरुवेंकटमुडयान्) ने कुरुम्बरुत्त नम्बि से मिट्टी के पुष्प स्वीकार किए, जिनकी पूजा तोण्डैमान् चक्रवर्ती ने किया।

2. त्याग मंडप (कांचीपुरम्) में देवराज भगवान (पेररुळाळन्) ने तिरुक्कच्चि नम्बि (काञ्चिपूर्ण स्वामी) से पंखा झलने का कैङ्कर्य स्वीकार किया, जिनकी पूजा श्री रामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) ने की थी।

3. भोग मंडप (श्रीरङ्गम्) में पेरिय पेरुमाळ् ने योगीवाहन स्वामी (तिरुप्पाणाऴ्वार्) से वीणा कैङ्कर्य स्वीकार किया, जिनकी पूजा लोकसारङ्ग मुनि ने की थी।

- याग अनुयाग उत्तर वीधिगळिल् काय अन्न स्थल शुद्धि पण्णिन वृद्धाचारमुम् – रामानुजाचार्य ने पवित्रता पाने के लिए तिरुवाराधन (भगवान की नित्य आराधना सेवा) के समय पिळ्ळै उरङ्गाविल्लीदासर् (धनुर्मास स्वामी) को स्पर्श करते; नम्पिळ्ळै (कलिवैरिदास स्वामी) प्रसाद ग्रहण करने से पहले श्रीपिळ्ळै एऱु तिरुवुडैयार् दासर् से प्रसाद को स्पर्श करने को कहते; नडुविल् तिरुवीधि पिळ्ळै भट्टर (मध्यवीधि भट्टर्) ने पिळ्ळै वानमामलै दासर् से अपने नवनिर्मित घर को शुद्ध करने के लिए उसके चारों ओर प्रदक्षिणा करने को कहा|
अऱिवार्क्किरे जन्म उत्कर्ष अपकर्षङ्गळ् तॆरिवदु। ऊपर बताई गई घटनाओं को जानने और समझने वाले ही सच्ची जन्म के ऊँच-नीच को समझ पाएँगे। अपने सुंदर व्याख्यान में, श्रीवरवरमुनि स्वामी यह निष्कर्ष निकालते हैं कि नायनार् (रम्यजामातृदेव स्वामी) ने इस सिद्धांत को सबसे प्रभावी रूप से समझाया है जिससे मंद बुद्धि लोग भी भागवतों (चाहे उनका जन्म कुछ भी हो) की महिमा सरलता से समझ सकें।
८६वें चूर्णिका में आगे बताया गया है कि:
अज्ञर् भ्रमिक्किऱ वर्णाश्रम विद्या वृत्तङ्गळै कर्तब जन्मम्, च्वपचाधमम् , चिल्पनैपुण्यम्, भस्माहुति, सवविधवालङ्कारम् ऎन्ऱु कऴिप्पार्गळ्
सरल अनुवाद:
- केवल ब्राह्मण वर्ण में जन्म लेना (भगवान और उनके भक्तों के प्रति भक्ति के बिना), भगवा धारण करनेवाले (परंतु उसकी सच्ची महत्त्व नहीं समझने वाला) गधे के समान समझाया गया है
- केवल संन्यास आश्रम में रहने वालों को (भगवान और उनके भक्तों के प्रति भक्ति के बिना) चाण्डालों (कुत्ते खाने वालों) में सबसे पतित माना जाता है
- केवल वेदों का ज्ञान (भगवान और उनके भक्तों के प्रति भक्ति के बिना) केवल कुछ कौशल सीखने के समान माना जाता है जो चप्पल सिलने के समान है (जो पेट भरने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता)
- केवल कर्मों का अनुष्ठान (भगवान और उनके भक्तों के प्रति भक्ति के बिना) जली हुई राख के समान समझाया गया है जो किसी काम की नहीं है
- कोई भी शब्द जो भगवान की महिमा में नहीं कहे हों और कोई भी कार्य जो भगवान के प्रति समर्पित नहीं है, वह मृत शरीर की सजावट के समान है
- भगवान के प्रति भक्ति के बिना उपरोक्त में से कोई भी, एक विधवा के लिए सुंदर आभूषणों के समान है, जो किसी काम के नहीं हैं क्योंकि उसके पास मंगलसूत्र (जिसके बिना वज्ञ इन सारे आभूषणों का प्रयोग नहीं कर सकती) नहीं है । इसी प्रकार, केवल वर्ण, आश्रम, ज्ञान और शब्द (जो भगवान की भक्ति से सराबोर नहीं हैं) अज्ञानियों को आकर्षित करते हैं, किन्तु विद्वान उन्हें अनदेखा कर देंगे और उन्हें कोई महत्त्व नहीं देंगे।
अगले भाग में, पिळ्ळै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र से कई सूत्र उद्धृत किए गए हैं, जहाँ श्रीवैष्णवों की महिमा, उनके जन्म के विचार किये बिना , बताई गई है। सूत्र २१२ तक के सूत्रों में, वैष्णव होने की महिमा पर प्रकाश डाला गया है ।
- सूत्र २१२ – उत्कृष्टमाग भ्रमित्त जन्मम् भ्रम्स सम्भावनैयाले “शरीरे च” ऎन्गिऱपडिये भय जनकम् – जिस जन्म को उच्च जन्म समझ लिया जाता है, वह भय का कारण है क्योंकि
- ऐसे जन्म के लोग, घबराहट से उपायांतर अपना सकते हैं (क्योंकि पहले ३ वर्णों में जन्म लेने के कारण, उनके पास कर्म, ज्ञान, भक्ति योग करने की योग्यता होती है)।
- जैसे कि जितन्ते स्तोत्रं 1.9 “शरीरे च” में, डरने योग्य विभिन्न वस्तुओं के बारे में समझाते हुए, शरीर जो हमें वर्णाश्रम धर्म निभाने की योग्यता देता है, उसे डर के मुख्य कारणों में से एक बताया गया है।
- सूत्रम् २१३ – अदुक्कु स्वरूप प्राप्तमान नैच्यम् भाविक्क वेणुम् – ऐसे उच्च जन्म के लोगों को, दूसरों को देखकर जो सही प्रकार से विनम्रता का पालन कर रहे हैं, विनम्रता का अभ्यास करना होगा जो जीवात्मा के लिए स्वाभाविक स्वरूप है
- सूत्रम् २१४ – अपकृष्टमाग भ्रमित्त उत्कृष्ट जन्मत्तुक्कु इरण्डु दोषमुम् इल्लै – वास्तव में उच्च जन्म (जिसे नीच जन्म समझ लिया जाता है) के लोगों में ये २ दोष नहीं होते। वे दोस हैं –
- वर्ण के आधार पर अपनी कर्तव्यों को लेकर भ्रमित होने के कारण शारीरिक कर्मों के लिए डरना
- स्वाभाविक रूप से नम्रता रखने के बदले में, दूसरों को नम्रतापूर्वक व्यवहार करते देखकर नम्रता अपनाना
- सूत्रम् २१५ – नैच्यम् जन्म सिद्धम् – उच्च कुल के लोगों में विनम्रता स्वाभाविक है (जिन्हें निम्न कुल समझ लिया जाता है)
- सूत्रम् २१६ – आगैयाले उत्कृष्ट जन्ममे श्रेष्ठम् – इस प्रकार वास्तविक उच्च जन्म ही सर्वश्रेष्ठ है
- सूत्रम् २१७ – स्वपचोपि महीपाल – जैसा कि भगवान ने स्वयं इस श्लोक में कहा है, अगर कोई चाण्डाल भी मेरा भक्त है, तो उसे द्विज से भी महान जानो। दूसरी ओर, जो मेरा भक्त नहीं है, भले ही वह सन्यासी हो, वह चण्डाल से भी नीच है।
- सूत्रम् २१८ – निकृष्ट जन्मत्ताल् वन्द दोषंम् समिप्पदु विलक्षण सम्बन्धत्ताले – जो लोग (यथार्थ) नीच योनि में जन्मे हैं, जिसमें उपायान्तर आदि में लिप्त होने की संभावना भरी होती है, उनके दोष श्रीवैष्णवों के साथ संबंध बनाने से दूर हो जाते हैं जो ऐसे दोषों से पूर्णतः मुक्त हैं।
- सूत्रम् २१९ – सम्बन्धत्तुक्कु योग्यदै उण्डाम्पोदु जन्मक्कॊत्तै पोगवेणुम् – एक निष्कलंक श्रीवैष्णव के साथ ऐसा सम्बन्ध बनाने के योग्य बनते समय, व्यक्ति को अपने अयथोचित उच्च जन्म के बारे में सभी अनुचित भ्रान्तियों (घमंड, आदि) को छोड़ देना चाहिए।
- सूत्रम् २२० – जन्मत्तुक्कु कॊत्तैयुम् अदुक्कु परिहारमुम् “पऴुदिला ऒऴुगल् ” एन्गिऱ पाट्टिले अरुळिच् चेय्दार् – किसी के जन्म पर आधारित अन्यथा चिन्तन और ऐसी अन्यथा चिन्तन के निवारण को श्रीभक्ताङ्घ्रिरेणु ने “पऴुदिला ऒऴुगल्” (तिरुमालै पासुरम् ४२) में दयालुतापूर्वक समझाया है। इस पासुरम् में, आऴ्वार् समझाते हैं, “जो लोग निर्बाध ब्राह्मण वंश में आते हैं और जिन्होंने चारों वेदों में निपुणता प्राप्त कर ली है, उन्हें अपने अभिमान आदि से मुक्त होने के लिए, श्रीमन्नारायण के भक्तों की पूजा करनी चाहिए जो ऐसे अभिमान आदि से रहित हैं, और स्वयं को शुद्ध करने के लिए उनसे ज्ञान स्वीकार करना चाहिए”।
- सूत्रम् २२१ – वेदगप्पॊन्पोले इवर्गळोट्टै सम्बन्धम् – ऐसे महान भक्तों के साथ संबंध एक स्पर्शमणि के संपर्क में होने के सामान है (जो लोहे को सोने में बदल देता है)
- सूत्रम् २२२ – इवर्गळ् पक्कल् साम्य बुद्धियुम् आधिक्य बुद्धियुम् नडक्क वेणुम् – ऐसे श्रीवैष्णवों को बराबर और ऊँचा मानना चाहिए।
- सूत्रम् २२३ – अदावदु आचार्य तुल्यरेन्ऱुम् सम्सारिगळिलुम् तन्निलुम् ईश्वरनिलुम् अधिकरेन्ऱुम् निनैक्कै – सटीक रूप से कहें तो, उन्हें अपने आचार्य के समान मानना चाहिए और उन्हें संसारियों (भौतिक वस्तुओं पर ध्यान देने वाले लोग) से, स्वयं से और ईश्वर से भी ऊपर मानना चाहिए।
- सूत्रम् २२४ – आचार्य साम्यत्तुक्कडि आचार्य वचनम् – श्रीवैष्णवों को अपने आचार्य के समान मानना, स्वयं आचार्य के निर्देश के कारण है, जब हम उनके कमल चरणों में शरण लेते हैं।
- सूत्रम् २२५ – इप्पडि निनैयादॊऴिगैयुम् अपचारम् – जैसे श्रीवैष्णवों के जन्म का विश्लेषण करना एक बड़ा अपराध है, वैसे ही श्रीवैष्णवों को उचित सम्मान न देना (पहले बताए गए सिद्धांतों के अनुसार) भी एक बड़ा अपराध/त्रुटि है।
- सूत्रम् २२६ – इव्वर्थम् इतिहास पुराणङ्गळिलुम् , पयिलुम् सुडरॊळि नॆडुमार्कडिमैयिलुम् कण्सोर वॆङ्गुरुदियिलुम् नण्णाद वाळवुणरिलुम् तेट्टरुम् तिऱल्तेनिलुम् मेम्पॊरुळुक्कु मेलिल पाट्टुक्कळिलुम् विचतमागक् काणलाम् – इस सिद्धांत (भागवतों की महिमा का, उनके जन्म का भेदभाव बिना किए) को नीचे दिए गए प्रसंगों पर विस्तार से समझाया गया है :-
- इतिहास (श्रीरामायण और महाभारत) और पुराण
- पयिलुम् सुडरॊळि पदिगम् (दशक) – तिरुवाय्मोऴि ३.७
- नॆडुमार्कडिमै पदिगम् – तिरुवाय्मोऴि ८.१०
- नण्णाद वाळवुणर् पदिगम् – तिरुवाय्मोऴि २.६
- कण्सोर वॆङ्गुरुदि पदिगम् – तिरुवाय्मोऴि ७.४
- तेट्टरुम् तिऱल्तेन् पदिगम् – पेरुमाळ तिरुमोऴि २
- तिरुमालै – ३९ – ४३ पासुरम्
- सूत्रम् २२७ – क्षत्रियनान विश्वामित्रन् ब्रह्मऋषि आनान् – विश्वामित्र जो एक क्षत्रिय परिवार में जन्मे थे, ब्रह्मऋषि बन गए (जो कि सामान्यतः केवल ब्राह्मण के लिए ही लागू होता है)।
- सूत्रम् २२८ – श्रीविभीषणनै रावणन् कुलपाम्सनम् ऎन्ऱान्; पेरुमाळ इक्ष्वाकु वम्श्यनाग निनैत्तु वार्त्तै अरुळिच्चॆय्दार् – रावण ने घोषित किया कि श्रीविभीषण एक विद्रोही है; श्रीराम (पेरुमाळ) ने श्रीविभीषण (जो राक्षस वंश में जन्मे थे) को इक्ष्वाकु वंश में आनेवाले अपने भाई के समान माना और उनसे प्रेमपूर्वक बात की।

- सूत्रम् २२९ – पेरिय उड़ैयारुक्कु पेरुमाळ ब्रह्ममेद संस्कारम् पन्नियरुळिनार् – श्रीराम ने जटायु महाराज (जो पक्षी के रूप में जन्मे थे) के लिए स्नेहपूर्ण चरम कैङ्कर्य (अंतिम संस्कार) किया, जो सामान्यतः पुत्रों/शिष्यों द्वारा अपने पिता/आचार्य के लिए करते हैं।

- सूत्रम् २३० – धर्मपुत्रर् अशरीरि वाक्यत्तैयुम् ज्ञानाधिक्यत्तैयुम् कॊण्डु श्रीविदुररै ब्रह्ममेदत्ताले संस्कारित्तार् – अशरीरी ध्वनि के अनुसार और श्री विदुर के सबसे ज्ञानी स्वभाव को समझते हुए, युधिष्ठिर (जो वर्णाश्रम धर्म में पूर्ण रूप से स्थित थे) ने उनका अंतिम संस्कार किया (भले ही उनका जन्म एक दासी से हुआ था)।
- सूत्रम् २३१ – ऋषिगळ् धर्मव्यादन् वासलिले तुवण्डु धर्मसन्देहङ्गळै समिपित्तुक् कॊण्डार्गळ् – विद्वान संत धर्मव्याद (जो एक कसाई था) के द्वार पर प्रतीक्षा करते थे कि वह अपने माता-पिता की सेवा पूरी करे और धर्म के बारे में उनकी शंका दूर करे।
- सूत्रम् २३२ – कृष्णन् भीष्म द्रोणादिगळै विट्टु श्रीविदुरर् तिरुमाळिगैयिले अमुदु सॆय्दान् – कृष्ण भगवान ने भीष्म, द्रोण, दुर्योधन आदि की उपेक्षा की और श्री विदुर के निवास से भोजन सहर्ष स्वीकार किया।
- सूत्रम् २३३ – पेरुमाळ श्रीशबरी कैयाले अमुदु सॆय्दरुळिनार् – श्रीराम ने श्री शबरी से फल स्वीकार किया, जो एक शिकारी कुल में जन्म लेकर, अपने आचार्य के प्रति बहुत समर्पित थीं।

- सूत्रम् २३४ – माऱनेरि नम्बि विषयमाग पेरियनम्बि उड़ैयवर्क्करुळिच्चॆय्द वार्तैयै स्मरिप्पदु – माऱनेरि नम्बि का अंतिम संस्कार करने के बाद पेरिय नम्बि ने श्रीरामानुज को जो समझाया था, उसका स्मरण करें (कई उदाहरण देते हुए कहा कि जब भी सेवा की आवश्यकता पड़ने पर एक श्रीवैष्णव की सेवा स्वयं करना एक श्रीवैष्णव का दायित्व है)।
यही सिद्धांत हमारे जीयर् (श्री वरवरमुनि स्वामी) ने यतिराज विम्शती श्लोक १६ में समझाया है:
शब्दादिभोगविषया रुचिरस्मदीया
नष्टा भवत्विह भवद्दयया यतीन्द्र।
त्वद्दासदासगणनाचरमावधौ यः
तद्दासतैकरसताऽविरता ममास्तु ॥
हे यतीन्द्र (यतियों के राजा – श्रीरामानुज)! आपकी मधुर दया से मेरी कामुक सुखों की इच्छा नष्ट हो जाए और मेरा प्रेम इतना बढ़ जाए कि मैं आपके सेवकों की सूची में अंतिम सेवक बन जाऊँ।
तिरुवहीन्द्रपुरम में श्रीविल्लीपुत्तुर् पगवर् नाम के एक सन्यासी रहते थे। वह एक ओर स्नान करते थे और अपना अनुष्ठान करते थे, और अन्य लोग, दूसरी ओर अपना अनुष्ठान करते थे। एक बार, जब वह अपने अनुष्ठान के बाद लौट रहे थे, तो एक ब्राह्मण ने पूछा, “आप हमारे साथ घुलने-मिलने के बदले, एक अलग स्थान पर अपना अनुष्ठान क्यों कर रहे हैं?” और उन्होंने उत्तर दिया, “आप सभी ब्राह्मण हैं जो केवल वर्णाश्रम पर ध्यान देते हैं। किंतु हम दास, सेवक (भगवान और भागवतों के प्रति सेवाभाव रखने वाले) हैं – इसलिए हमारे पास आपके साथ घुलने-मिलने का कोई कारण नहीं है” और वह उस स्थान को छोड़कर चले गए। यह घटना तिरुनारायणपुरत्तु आय के आचार्य हृदय व्याख्यान में स्पष्ट रूप से समझाया गया है। श्रीविल्लीपुत्तुर् पगवर अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए यह पुराण श्लोक उद्धृत करते हैं:
विष्णुदासा वयं यूयं ब्राह्मणा वर्णधर्मिनः।
अस्माकं दास वृत्तीनां युष्माकं नास्ति सङ्गतिः।।
सरल अनुवाद: हम विष्णु के सेवक हैं और आप ब्राह्मण हैं जो केवल वर्णाश्रम धर्म का पालन कर रहे हैं। हम दासत्व भाव में हैं इसलिए हमें आपसे मिलने-जुलने का कोई कारण नहीं है।
देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार्) दयापूर्वक अपने ‘ज्ञान सारम्’ में निम्नलिखित पाशुरों के माध्यम से उसी सिद्धांत को स्थापित करते हैं। वे स्पष्टतः बताते हैं कि केवल वर्णाश्रम धर्म को मानने से कोई प्रयोजन नहीं है और कहते हैं कि हर किसी के लिए, श्रीमन् नारायण के चरण कमल ही अंतिम लक्ष्य है।
पासुरम १४ –
भूतङ्गळ् ऐन्दुं पॊरुन्दुडलिनाऱ्-पिऱन्द सादङ्गळ् नान्गिनोडुम् सङ्गतमां भेदङ्गकॊण्डु ऎन्न पयन् पॆरुवीर्
ऎव्वुयिर्क्कुम् इन्दिरै कोन् तन्नडिये काणुम् सरण
सरल अनुवाद: किसी व्यक्ति को उसके वर्ण के आधार पर भेदभाव करने का क्या प्रयोजन है, जो पाँच तत्त्वों से बने शरीर पर आधारित है? सभी के लिए, श्रीमन् नारायण के चरण कमल ही एकमात्र शरण हैं।
पासुरम १५
कुडियुंम् कुलमुम् ऎल्लाम् कोकनगैक् केळ्वन् अडियार्ककु अवन् अडिये आगुम्
पडियिन् मेल् नीर् केऴुवुमाऱुगळिन् पॆरुम् निरमुम् ऎल्लाम् आर् कलियै चेर्न्दिड माय्न्दट्रु
सरल अनुवाद: जैसे नदियों के नाम, रंग, रूप, आदि समुद्र में मिलने पर मिट जाते हैं, वैसे ही श्रीमन्नारायण के भक्त का पैतृक गाँव, परिवार, वंश, आदि अदृश्य हो जाएगा और वह केवल भगवान के कमल चरणों के प्रति उसके लगाव से परिचित किया जाएगा।
देहात्म ज्ञान कार्येण वर्णभेदेन किं फलम्
गतिस्सर्वात्मनां श्रीमन्नरायण पदद्वयम्
सरल अनुवाद: शरीर और आत्मा में अंतर समझने के पश्चात किसी व्यक्ति को उसके वर्ण के आधार पर वर्गीकरण करने का क्या प्रयोजन है? सभी के लिए, श्रीमन्नारायण के चरण कमल ही एकमात्र आश्रय हैं।
एकांति व्यपतेष्टवय: नैव ग्रामकुलाधिपि:
विष्णुना व्यपतेष्टव्यस् तस्य सर्वं स एव हि
सरल अनुवाद: विष्णु के परम भक्त का परिचय उसके पैतृक गाँव, परिवार वंश आदि से नहीं होता। ऐसे भक्त के लिए भगवान स्वयं ही सब कुछ हैं।
श्री शुक ब्रह्मऋषि इतने महान हैं कि उनके पिता वेद व्यास (जो स्वयं ४ वेदों, १८ पुराणों, आदि के संगठन के कारण महान हैं) को शुकतातम् (शुक के पिता) के रूप में जाना जाता है। शास्त्र (भागवत विषय) में अपने पूर्ण ज्ञान के कारण, वह भगवान के प्रति अपने ज्ञान/प्रेम को और संसारियों के कामुक सुखों के प्रति ज्ञान/प्रेम को घोषित करते हैं और सभी से अपना संबंध तोड़ देते हैं। वे कहते हैं :-
अद्य प्रबृति हे लोका ! यूयं यूयं वयं वयम्
अर्थ काम परा यूयं नारायण परा वयम्।
नास्ति सङ्गति: अस्माकं युष्माकं च परस्परम्
वयं तु किङ्करा विष्णो: यूयम् इन्द्रिय किङ्कर:।।
सरल अनुवाद: हे इस संसार के निवासियों! आपको भौतिक धन और वासना की लालसा है; हमें श्रीमन् नारायण की सेवा की लालसा है। आप अपनी इंद्रियों के दास हैं और हम श्रीमन् नारायण के दास हैं, इसलिए हमारे आपस में मिलने का कोई कारण नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी स्वाभाविक पहचान उनके आत्मा पर आधारित है, न कि उनके वर्ण या आश्रम पर।
नाहं विप्रो न च नरपतिर् नापि वैश्यो न शूद्रो नो वा वर्णी च गृहपतिर्नो वनस्तो यतिर्वा किन्तु श्रीमद्भुवनभवनस्तित्यपायैक हेतोर् लक्ष्मीभर्तुर् नरहरितनोर् दासदासस्य दास:
सरल अनुवाद: मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय नहीं हूँ, वैश्य नहीं हूँ और शूद्र नहीं हूँ। मैं ब्रह्मचारी नहीं हूँ, गृहस्थ नहीं हूँ, वानप्रस्थ नहीं हूँ और संन्यासी नहीं हूँ। मैं श्री महालक्ष्मी के पति श्री नरसिंह के सेवक का सेवक हूँ ।
शुक ब्रह्मऋषि कहते हैं, “मेरा धर्म वर्णाश्रम धर्म पर आधारित नहीं है। न ही यह जीवात्मा पर आधारित है, जिसका परिचय ज्ञान और आनंद के आधार पर होता है। किन्तु यह पूर्णतः श्री लक्ष्मीनरसिंह के भक्तों के प्रति मेरी सेवा पर आधारित है। ऐसी समझ होने के पश्चात, हम देख सकते हैं कि केवल २ प्रकार के लोग होते हैं – भागवत (भक्त) और अभागवत (भक्त नहीं) – कोई और वर्गीकरण नहीं हो सकता”। इस प्रकार उन्होंने सभी भौतिकवादी लोगों से अपने संबंध तोड़ लिए और केवल श्री लक्ष्मीनरसिंह भगवान के भक्तों के साथ जुड़ गए। यह चरित्र (घटना) बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय है।
इसके अतिरिक्त, ऐसे भागवतों के स्वरूपों के बारे में बताया गया है:
पञ्चास्त्राङ्गा: पञ्चसंस्कारयुक्ता: पञ्चार्थज्ञा: पञ्चमोपायनिष्टा:
ते वर्णानां पञ्चमाश्चाश्रमणां विष्णोर्भक्ता: पञ्चकाल प्रपन्ना:
सरल अनुवाद: जिनके पास पाँच प्रकार के शस्त्र हैं (भगवान से विरासत में मिले – शंख , चक्र, आदि), जिन्होंने पञ्चसंस्कार किया है, जो पूरे रूप से आचार्य निष्ठा में स्थित हैं और पञ्चकाल पारायण (दिन को पाँच भागों में बाँटा गया है अभिगमन/जागना, उपासना/तिरुवाराधन के लिए सामग्री एकत्रित करना, इज्ज/तिरुवाराधन/आराधना करना, स्वाध्याय/शास्त्र का अध्ययन, और योग/भगवान का ध्यान – भगवान की सेवा के लिए) – उनको, उनके वर्ण और आश्रम के विचार किए बिना, विष्णु भक्त कहते हैं।
देवर्षि भूताप्त नृणानां पितृणां न किङ्करो नायं ऋणी च राजन्
सर्वात्मा यद्चरणं शरण्यं नारायणं लोकगुरुं प्रपन्न:
सरल अनुवाद: जो व्यक्ति पूर्ण रूप से श्रीमन्नारायण के प्रति समर्पित है, जो पूरे ब्रह्माण्ड के गुरु हैं, वह ऋषियों, देवताओं, सांसारिक लोगों, पूर्वजों या किसी के भी ऋणी नहीं है।
इसलिए, विद्वान लोग केवल वर्ण, आश्रम, ज्ञान और अनुष्ठान (जो भगवान की भक्ति के बिना हैं और जिन्हें अज्ञानी लोग मानते हैं) को भगवा ओढ़ने वाले गधे के समान, चण्डाल से भी नीचे, जली हुई राख के समान व्यर्थ, मृत शरीर/विधवाओं पर सुंदर सजावट के समान मानते हैं। ऐसे विद्वानों के लिए, उनकी शरण उनकी अपनी निष्ठा/योग्यता पर आधारित होगी, अर्थात-
- या तो ईश्वर जो बंध/मोक्ष दोनों के लिए उत्तरदायी है या आचार्य जो सिर्फ़ मोक्ष को देख रहे हैं
- या तो वे जो पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित हैं या वे जो अपने आचार्य के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण सबसे बहुत अनुकूल हैं।
इसीलिए, आऴ्वान् (कूरेश स्वामी) ने कहा “न चेत् रामानुजेत् एषा चतुरा चतुरक्षरी; कामवस्थां प्रपद्यन्ते जन्तवो हन्तमातृच:” जहाँ उन्होंने “नारायण” और “रामानुज” शब्दों में स्पष्ट रूप से अंतर किया है – जहाँ नारायण बन्धन और मोक्ष दोनों के लिए समान हैं परंतु रामानुज केवल मोक्ष पर केंद्रित हैं।
इसीलिए रामानुज शब्द का महत्त्वपूर्ण विशेषण है “चतुरा चतुराक्षरी” जिसका अर्थ है “सबसे विवेकपूर्ण चार अक्षरों वाला शब्द”।

अनुवादक टिप्पणी: – इस प्रकार, हमने श्रीवैष्णवों की दिव्य महिमा देखी है, चाहे उनका जन्म कुछ भी हो।
जारी रहेगा…पूरी श्रृंखला यहाँ देखी जा सकती है :- https://granthams.koyil.org/anthimopaya-nishtai-hindi/
अडियेन् जानकी रामानुज दासी
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