श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः
<< अन्तिमोपाय निष्ठा – १६ – जन्म के निरपेक्ष भागवतों की महिमा
पिछले लेख में, हमने श्रीवैष्णवों की महिमा देखी, चाहे उनका जन्म कुछ भी हो। हम अगले भाग में आगे बढ़ेंगे जहाँ हम देखेंगे कि एम्पेरुमान्, आळ्वार् और आचार्यों द्वारा श्रीवैष्णवों की महिमा की जा रही है और हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन की कुछ घटनाएँ भी हैं जो इसे दर्शाती हैं।
भगवान स्वयं कई अवसर पर श्री वैष्णवों की महिमा बताते हैं।
लोके केचन मद्भक्ता सद्धर्मामृतवर्षिण: |
समयन्त्यगमत्युग्रं मेघा इव तवानलम्।।
सरल अनुवाद: ये मेरे कुछ भक्त हैं जो आने वाले संकट को ऐसे रोकते हैं जैसे वर्षा के मेघ अग्नि की ऊष्मा/तपन को शांत कर देते हैं।

ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् |
सरल अनुवाद: जो ज्ञानी पूर्णतः मेरे प्रति समर्पित है, वह मेरी आत्मा है – यह मेरी मत है।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय:।
सरल अनुवाद: जो ज्ञानी मेरे प्रति समर्पित है, उसका मेरे प्रति अत्यधिक प्रीति है – मेरा भी उसके प्रति समान (वास्तव में अधिक) प्रीति है।

मम प्राणा हि पाण्डवा:
सरल अनुवाद: पाण्डव मेरे प्राणों के समान हैं।
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभि:॥
सरल अनुवाद: मैं सदैव उन ऋषियों के कमल चरणों की धूल को स्वीकार करता हूँ, जो स्वार्थी लाभ की इच्छा नहीं रखते, जो शांत हैं, जो शत्रुओं से रहित हैं, जो सभी आत्माओं के प्रति समान दृष्टि रखते हैं।

मम भक्तेषु प्रीतिरभ्यधिका नृप।
तस्मान् मद् भक्तभक्ताश्च पूजनीय विशेषत:।।
सरल अनुवाद: मेरे भक्तों के लिए मेरा प्रेम अत्यधिक है, इसलिए जब मेरे भक्तों की पूजा होती है तो यह मेरे लिए अति विशेष और प्रिय होता है।

अन्नाद्यं पुरतो न्यस्तं दर्शनाद्गृह्यते मया।
रसान् दासस्य जिह्वायामस्नामि कमलोद्भव।।
सरल अनुवाद: हे कमलोद्भव (ब्रह्मा – कमल के फूल में पैदा हुए)! मैं पहले अपनी दृष्टि से मुझे दिए गए प्रशाद को स्वीकार करता हूँ, तत्पश्चात अपने भक्तों की जीभ से उसका आनंद लेता हूँ।
मद्भक्त जन वात्सल्यं पूजायां च अनुमोदनं
स्वयमभ्यर्चनं चैव मदर्थे डम्बवर्जनं
मत्कथाश्रवणे भक्तिस्स्वरनेत्रांकविक्रिया
ममानुस्मरणं नित्यं यच्च मां नोपजीवति।
भक्तिरष्टाविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेपि वर्धते
स विप्रेन्त्रो मुनिश्श्रीमान् स यतिश्च च पण्डित:
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्।।
सरल अनुवाद: मेरे भक्तों में मुख्यतः ये आठ गुण होते हैं – 1) एम्पेरुमान् के भक्तों के लिए अहैतुक प्रीति, 2) भगवान की (दूसरों द्वारा) पूजा का आनंद लेना, 3) स्वयं भगवान की पूजा करना, 4) बिना किसी अभिमान के रहना, 5) भगवान के बारे में सुनने में आसक्ति रखना, 6) भगवान के बारे में सुनने/सोचने/बोलने पर शारीरिक परिवर्तन (जैसे रोंगटे खड़े होना, आदि), 7) सदा भगवान के बारे में सोचना, 8) भगवान की पूजा के बदले में भौतिक लाभ की माँग न करना। ऐसे भक्त, भले ही वे म्लेच्छ हों, वे ब्राह्मणों के नेताओं, ध्यानियों, कैंकर्य में संलग्न लोगों और यहाँ तक कि संन्यासियों और विद्वानों द्वारा मेरे समान ही पूजनीय हैं। वे ऐसे विद्वानों से ज्ञान देने और लेने के भी पात्र हैं।
इस प्रकार, भगवान स्वयं अपने भक्तों के बारे में कहते हैं कि –
- वे पूरी जगत को पवित्र करने में सक्षम हैं
- वे मेरी अपनी आत्मा के समान हैं
- वे मेरे प्राणों के समान हैं
- मैं स्वयं उनका अनुसरण करता हूँ और उनके कमल-चरणों की धूल पाने की इच्छा रखता हूँ
- जो कोई भी उनका सम्मान/सेवा करता है, वह मुझे बहुत प्रिय है
- मैं उनके साथ व्यवहार करके भोजन आदि का स्वाद लेता हूँ
- भले ही वे म्लेच्छ के रूप में जन्मे हों, वे मेरे समान पूजनीय हैं
भूमि पिराट्टी (भूदेवी) घोषणा करती हैं कि उनका परम लक्ष्य महाभागवतों को देखना, स्पर्श करना और उनके साथ चर्चा करना है; वह यह भी कहती हैं कि वह उनके संपूर्ण दिव्य और शुभ गुणों का वर्णन करने में सक्षम नहीं हैं और वह उनकी महिमा को पूर्णतः समझा नहीं सकतीं। इसे इन श्लोकों में समझाया गया है:
अक्ष्णो: फलं तादृशदर्शनं हि तन्वा: फलं तादृशगात्रसङ्गम्।
जिह्वाफलं तादृशकीर्तनञ्च सुदुर्लभा भागवता हि लोके।।
सरल अनुवाद: हमारे नेत्रों का उद्देश्य महान भागवतों को देखना है; हमारे शरीर का उद्देश्य महान भागवतों द्वारा स्पर्श किया जाना है; हमारी जीभ का उद्देश्य महान भागवतों का महिमामंडन करना है; ऐसे भागवत इस संसार में मिलना कठिन है।
नाहं समर्थो भागवत् प्रियाणां वक्तुं गुणान् पद्म भुवोप्यगण्यान्।
भवत्रभावं भगवान् हि वेत्ति तथा भवन्तो भगवत् प्रभावम्।।
सरल अनुवाद: मैं उन लोगों की महानता के बारे में बात करने में असमर्थ हूँ जो भगवान के प्रति समर्पित हैं। केवल भगवान ही उनकी महानता जानते हैं और केवल वे ही भगवान की महानता जानते हैं।
आऴ्वारों ने भी भागवतों की महिमा की और पुष्टि किया कि यम धर्मराज के सेवक का उन पर कोई नियंत्रण नहीं है।

तिरुमऴिसै आऴ्वार् – नान्मुगन् तिरुवन्तादि ६८
तिऱम्बेन्मिन् कण्डीर्
तिरुवड़ी तन् नामम् मऱन्दुम् पुरम्तॊऴा मान्दर्
इऱैञ्चियुम् सादुवराय् पोदुमिङ्गळ् ऎन्ऱान्
नमनुम् तन् तूदुवरैक् कूवि चॆविक्कु
सरल अनुवाद: यमराज अपने सेवकों से कहते हैं, “इस निर्देश को अनदेखा मत करो। जब तुम ऐसे श्रीवैष्णवों को देखो जो भगवान के नाम तक भूल सकते हैं किन्तु अन्य देवताओं की पूजा नहीं करते, तो तुम उनकी पूजा करो, उनके साथ आदर से व्यवहार करो और शुद्ध हो जाओ।” (अनुवादक टिप्पणी: एक प्रारूपिक उदाहरण दिया गया है – जब पति-पत्नी के बीच मतभेद होता है, यदि पत्नी पति से बात नहीं करती तो भी यह स्वीकार्य है, किन्तु यदि वह किसी अन्य पुरुष को ढूँढ़ती है, तो यह सर्वथा अस्वीकार्य है)।
पोय्गै आऴ्वार् – मुदल तिरुवन्तादि ५५
अवन् तमर् ऎव्विनैयरागिलुम
ऎङ्कोन् अवन तमरे ऎन्ड्रोळिवदु अल्लाल्
नमन् तमराल् आरायपट्टु अरियार् कन्डीर्
अरावणै मेल् पेरायर्क्कु आट्पट्टार् पेर्
सरल अनुवाद: उनके कर्म चाहे जो भी हो, श्रीवैष्णव मेरे स्वामी हैं क्योंकि वे श्रीमन् नारायण के प्रति समर्पित हैं। यहाँ तक कि यमराज भी उन श्रीवैष्णवों के दोषों का विश्लेषण करने के योग्य नहीं हैं जो पूरी तरह से उस भगवान के प्रति समर्पित हैं जो आदिशेष पर लेटे हुए हैं और एक ग्वाले के रूप में प्रकट हुए थे।
नम्माऴ्वार् (शठकोप स्वामी) – तिरुवाय्मोऴि ५.२.१

पॊलिग पॊलिग पॊलिग पोयिट्रु वल्लुयिर्च् चाबम्
नलियुम् नरगमुम् नैन्द नमनुक्कु इङ्गु यादॊन्ऱुम् इल्लै
कलियुम् कॆडुम् कण्डुकॊण्मिन्
कडल्वण्णन् भूदङ्गळ् मण् मेल् मलिय पुगुन्दु इसै पाड़ि आडि उऴि तर कण्डोम्
सरल अनुवाद: मैंने बहुत सारे भागवतों को गाते और नाचते देखा है जो पूर्ण रूप से भगवान के प्रति समर्पित हैं, जो समुद्र के समान सबसे शक्तिशाली हैं (जो मोतियों आदि से भरे हुए हैं) और समुद्र के समान नीले रंग में होते हुए सबसे सुंदर हैं। इन भागवतों के कारण लोगों के मन का अज्ञान दूर होता है। जब अज्ञान चला जाता है, तो यम और उनके सेवकों के लिए कोई काम नहीं रहता जो अज्ञानियों को नरक जैसे स्थानों पर दण्ड देते हैं। कलियुग के दोष जो मूल कारण हैं, वे भी दूर हो गए हैं। यह शुभता सदा बनी रहे।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् – पेरियतिरुमोऴि ८.१०.७
वॆळ्ळै नीर् वॆळ्ळत्तु अणैन्द अरवणै मेल्
तुळ्ळु नीर् मॆळ्ळ तुयिन्ऱ पॆरुमाने
वळ्ळले! उन् तमर्क्कु ऎन्ऱुम् नमन् तमर्
कळ्ळर् पोल कण्णप्पुरत्तुऱै अम्माने!
सरल अनुवाद: हे मेरे स्वामी जो क्षीराब्धि (क्षीर सागर) में आदिशेष पर शयन हैं! हे तिरुक्कण्णपुरम के स्वामी ( जो मेरे सामने उपस्थित हैं)! जब यमदूत आपके भक्तों को देखते हैं, तो वे वैसे ही छिप जाते हैं जैसे चोर दूसरों से छिपते हैं।
आऴ्वार् (तोण्डरडिप्पोडी आऴ्वार्) घोषणा करते हैं कि – नावलिट्टु उऴितरुगिन्ऱोम् नमन्तमर् तलैगळ् मीदे – हम विजयी ध्वनि करते हैं और यमदूतों के सिरों के ऊपर से चलते हैं।
इस प्रकार आऴ्वार् यह स्थापित करते हैं कि यमदूत न केवल श्रीवैष्णवों को नियंत्रण नहीं कर सकते, इसके विपरीत यदि वे ऐसे काम करने का प्रयास भी करें तो उन्हें बहुत कष्ट भुगतना भी होगा। श्रीवैष्णवों की ऐसी महिमा है।
न कलु भागवता यम विषयं गच्छन्ति – (भागवत और यम का एक दूसरे से कोई लेना-देना नहीं है) भी भागवतों की महिमा बताता है। इस विषय पर, अगला श्लोक यम आदि का भागवतों के साथ व्यवहार समझाता है।
स्व पुरुषम् अपि वीक्ष्य पाचहस्तं वदति यमः किल तस्य कर्णमूले
परिहर मधुसूदन प्रपन्नान् प्रभुरहम् अन्यनृणां न वैष्णवानाम्।
कमलनयन वासुदेव विष्णो धरणिधराच्युत शङ्खचक्रपाणे
भव शरणमितीरयन्ती ये वै त्यज भटदूरतरेण दानपापान्।।
सरल अनुवाद: यम अपने सेवकों को पास बुलाते हैं और चुपके से उन्हें समझाते हैं कि वे उन श्रीवैष्णवों के स्वामी नहीं हैं जो मधुसूदन को समर्पित हैं, और, इतर लोग ही उनके नियंत्रण में हैं। वे उनसे यह भी कहते हैं कि वे श्रीवैष्णवों के प्रति निष्पक्ष रहें और उनसे दूर रहें क्योंकि वे उस भगवान को समर्पित हैं जिन्हें कमलनेत्र (कमलनयन), वासुदेव, विष्णु, धरणीधर (जो जगत को संभालते हैं) और अपने हाथों में शंख और चक्र धारण करने वाले के रूप में जाने जाते हैं।
इस प्रकार यम धर्म राजन अपने सेवकों को निर्देश देते हैं कि वे श्रीवैष्णवों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं और उन्हें भगवान के क्रोध से स्वयं को बचाने के लिए श्रीवैष्णवों से दूर रहने के लिए कहते हैं। भागवतों के बारे में ये सभी महीमा श्रीविष्णु पुराण आदि में बताई गई हैं।
अभागवतों के साथ घुलने-मिलने से भागवतों और भगवान से अलगाव हो जाएगा। भागवतों के साथ घुलने-मिलने से भगवान से मिलन होगा, अभागवतों से अलग होकर अंत में मोक्ष मिलेगा। जो लोग सच्चे आचार्य की देखरेख में रहते हैं, वे संसार के बारे में कभी भी भ्रमित नहीं होंगे। किंतु जब एक शिष्य ऐसे देखरेख से बाहर निकल जाता है, तो वह इस संसार में निरंतर दुख झेलता रहेगा। इस विषय को आच्चान् पिळ्ळै ने माणिक्क मालै में समझाया है।
इस प्रकार, एक शिष्य के लिए सब कुछ उसके आचार्य के अधीन होना चाहिए। इसके विपरीत, घबराहट के कारण, यदि वह आचार्य के साथ संबंध को भूल जाता है और अपनी इच्छा से यदि वह अकृत्य करणम् (शास्त्र में अस्वीकृत गतिविधियों में संलग्न होना), भगवतपचार (भगवान को अपमानित करना), भागवत अपचार (भागवतों को अपमानित करना), असह्य अपचार (भगवान-भागवत के प्रति अकारण अपराध) में लिप्त हो जाता है और परिणामस्वरूप रौरव नरक आदि जैसे नारकीय क्षेत्रों में कष्ट सहने का पात्र बन जाता है। एक सच्चे आचार्य, अपनी अहैतुकी दया से, उन्हें होने वाले कष्टों पर चिंतन करते हुए, ऐसे पतित शिष्यों को भी शुद्ध कर देंगे जैसा कि कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु 10 में बताया गया है – पयनन्ऱागिलुम् पाङ्गल्लरागिलुम् सॆयल् नन्ऱाग तिरुत्ति पणिकॊळ्वान् – (मधुरकवि आऴ्वार् कहते हैं जब मैं किसी काम का नहीं था और पूरी तरह से अपरिपक्व था, तब भी शठकोप स्वामी ने मुझे सुधारा और अपनी सेवा में लगा दी) – यह एक सच्चे आचार्य का गुण है।
आचार्यों की अहैतुक कृपा का यह सिद्धांत हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन की कुछ घटनाओं के माध्यम से समझाया गया है।

इसी अहैतुक कृपा के कारण है, जब कूरत्ताळ्वान् के शिष्य नालूरान् ने किरिमिकण्ठ के साथ मिलकर आऴ्वान् (जो नालूरान के आचार्य हैं) के प्रति सबसे बड़ा अपराध किया, तो भगवान उनसे बहुत क्रोधित हुए और कहा “न क्षमामि” (मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा)। परंतु आऴ्वान् भगवान से असहमत होते हैं और उनसे अनुरोध करते हैं कि “नालूरान को मेरे जैसा ही लोक (परमपद) मिलना चाहिए”।
जब पराशर भट्टर् के शिष्यों में से एक शिष्य, अवांछनीय मित्रता के कारण भ्रमित हो जाता है, अत्यधिक भौतिकवादी रूप से आसक्त हो जाता है तो भट्टर् से कहता है “भट्टर्! अब हमारा कोई संबंध नहीं है” और भट्टर् के चरण कमलों को छोड़ने का प्रयास करता है। भट्टर् उससे कहते हैं, “बेटा! तुम ऐसे सोच सकते हो। भले ही तुम मेरा सम्बन्ध छोड़ दो, मैं नहीं छोड़ूँगा” और उसे पुनः सुधारते हैं।
नञ्जीयर् का एक शिष्य था जो उन्हें बहुत प्रिय था, बहुत अलग था और पूर्णतः से शुभ स्वभाव से भरा हुआ था।
परंतु दोषपूर्ण आहार का ग्रहण के कारण, उसका अहंकार आदि, नञ्जीयर् की शरण में जाने के पूर्व उसके हाथ में जो भाला था, उसे लेकर राजा की सेवा में पुनः चला जाता है। नञ्जीयर् किसी प्रकार उसे पकड़ लेते हैं और उसे एकांत में एक कक्ष में ले जाते हैं और उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए द्वार बंद कर देते हैं। श्रीवैष्णव जो नञ्जीयर् के चरण कमलों से जुड़े हुए हैं, चिंतित हो जाते हैं और कहते हैं, “ओह! यह घातक है; नञ्जीयर् को तुरंत उस कक्ष से निकलना चाहिए जहाँ वह मनुष्य हाथ में भाला लिए हुए है जिसका उपयोग नञ्जीयर् पर आक्रमण करने के लिए किया जा सकता है।” नञ्जीयर् उत्तर देते हैं, “मैं तब तक नहीं जाऊँगा जब तक वह शुद्ध नहीं हो जाता; या तो उसे अपनी आध्यात्मिक स्थिति समझनी चाहिए और ऊपर उठना चाहिए या मैं उसके भाले से उसके हाथों मर जाऊँगा।”

पिळ्ळै लोकाचार्य श्रीवचन भूषणम् दिव्य शास्त्र में कहते हैं कि जब कोई किसी के प्रति अपराध करते हैं, तब वह उनके प्रति पॊऱै (करुणा), कृपै (कृपा/दया), चिरिप्पु (मंदहास), उगप्पु (प्रसन्नता) और उपकारस्मृति (कृतज्ञता) रखना चाहिए। इतना ही नहीं, वह स्वयं सम्मानजनक प्रकार से व्यवहार करता है और एक श्रीवैष्णव को कैसे होना चाहिए, इसका प्रतीक बनता है।
स्वीकरोति सदाचार्यस् सर्वानप्य विशेषतः।
यत्पुनस्तेषु वैषम्यं तेषां चिज्ञानवृत्तयोः।।
सरल अनुवाद: एक सदाचार्य सभी को स्वीकार करते हैं , यहाँ तक कि उन लोगों को भी जिनमें कोई भलाई नहीं है। इसके पश्चात, स्वीकृत आत्माओं को आत्मज्ञान और उससे जुडे अनुष्ठानों (अनुशासन के साथ व्यावहारिक कार्यान्वयन) को सिखाकर उनके दोषों को दूर किए जाते हैं।
तेषामेव हि दोषोयं चास्येति विनिश्चितम्।
अपक्व पद्मकोशानाम् अविकाशो रवेर्यथा ।।
सरल अनुवाद: जैसे एक अधखिले कमल की पंखुड़ियाँ सूर्य की किरणों से नहीं खिलतीं, उसी प्रकार आचार्य भी शिष्य के दोषों को उसकी अपरिपक्वता की कमी मानते हैं, न कि स्वयं शिष्य की कमी। (यह मानते हुए कि शिष्य को ज्ञान, अनुशासन इत्यादि में परिपक्व होने की आवश्यकता है, आचार्य उसे दोषपूर्ण मानकर नकारने के विपरीत, उसे सुधारते हैं)।
जैसे कि उपरोक्त श्लोकों में पहचाना गया है, भले ही कोई शिष्य किसी आचार्य के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर भी, अपनी अज्ञानता या दृढ़ विश्वास की कमी के कारण फिर से ऐसे अवांछनीय गतिविधियों में संलग्न हो जाता है जो उसके विनाश का कारण बनते हैं, तो आचार्य उसे सुधारते हैं और उसकी रक्षा करते हैं। वे ऐसा अपने उपदेशों के माध्यम से करते हैं, जैसे कि “स्खालित्ये शासितारम्” ( जब शिष्य कोई गलती करता है, तो उसे सही उपदेश देकर सुधारना) में कहा गया है; और साथ ही अपनी असीम करुणा के बल पर भी, जैसे कि “देशिको मे दयालुः” (देशिको मे दयालुः – आचार्य मेरे प्रति अत्यंत दयालु हैं) में कहा गया है।
वासुदेवं प्रपन्नानां यान्येव चरितानि वै।
तान्येव धर्मशास्त्राणित्येवं वेद विदो विदुः।।
सरल अनुवाद: जो लोग वेदों में पारंगत हैं, वे वासुदेव के प्रपन्नों (पूर्णतः समर्पित भक्तों) के जीवन को ही धर्म शास्त्र मानते हैं।
हमारे पूर्वाचार्यों के ये सभी उत्कृष्ट गुण, हमारे आचार्य (श्रीवरवरमुनि स्वामी) में पूर्ण रूप से दिखते हैं। जब वे आऴ्वार् तिरुनगरी में ओलमेच्चान् मठ (एक फूस की कुटिया) में विश्राम कर रहे थे, तो दुष्ट हृदय वाले लोग (जैसे वे चण्डाल, जिन्होंने स्वयं रामानुजाचार्य को दिए गए भोजन में विष मिला दिया था) जो श्रीवरवरमुनि से ईर्ष्या करते हैं, आधी रात को मठ में आग लगा देते हैं। (अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि अपने आदिशेष रूप धारण कर, जलते हुए मठ से, चुपके से बाहर निकलते हैं और बाहर खड़े होकर अंततः जलते हुए मठ को देखते हैं)। स्थानीय प्रशासक उन पाखंडियों को ढूँढ़ते हैं, उन्हें उनके सबसे घिनौने अपराध के लिए कड़ी दंड देने हेतु। परंतु, जैसा कि निम्नलिखित प्रमाणों में पहचाना गया है, श्रीवरवरमुनि प्रशासकों से असहमत रहे, अपराधियों को क्षमा करते हैं और उन्हें मुक्त कर देते हैं। (अनुवादक टिप्पणी: यहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की तुलना सीता माता से की गई है जिन्होंने उन्हें हानि पहुँचाने वालों के प्रति सबसे कृपापूर्वक और दयालु व्यवहार किया– उसी समान श्रीवरवरमुनि स्वामी ने भी उन्हें मारने का प्रयत्न करने वालों पर अपनी दया का वर्षाव किया और अंततः उन्हें भी सुधार दिया)।

पापानां वा शुभानां वा वधार्हाणां प्लवङ्गम।
कार्यं कारुण्यमार्येण न कश्चिन्नापराध्यति।।
सरल अनुवाद: सीता पिराट्टी हनुमान से कहती हैं – हे हनुमान! दयालुता एक अच्छे व्यक्ति के द्वारा या तो पापी के प्रति दिखानी चाहिए, या नेक मनुष्य के प्रति अन्यथा ऐसे मनुष्य के प्रति जो मृत्यु के ही लायक क्यों न हो, क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो कभी अनुचित कार्य न किया हो।
भवेयं शरणं हि व:
सरल अनुवाद: सीता पिराट्टी राक्षसियों से – मैं किसी भी परिस्थिति में आप सब की रक्षा करूँगी
क: कुप्येत वानरोत्तम:
सरल अनुवाद: सीता पिराट्टी हनुमान से – उन दास-दासियों पर कौन क्रोधित होगा जो केवल अपने स्वामी की आज्ञा का पालन कर रही हैं?
इस प्रकार, परम दयालु आचार्य श्री वरवरमुनि स्वामी ने यह सुनिश्चित किया कि सबसे पतित आत्माओं को भी प्रशासकों द्वारा दंडित नहीं किया जाए – यह घटना सर्वत्र प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त, हमारे आचार्य का अत्यंत दयालु स्वभाव और उनके अवतार वैशिष्ट्य (उनका आदिशेष के अवतार होने का और श्री रामानुजाचार्य के द्वितीय आगमन होने का विशेष स्वरूप) को नेवले और तोते की घटना, वृक्ष (श्री वरवरमुनि द्वारा तिन्तिडिका वृक्ष (इमली के वृक्ष) को मोक्ष प्रदान करना) की घटना और अनेक महान पुरुषों (जैसे वरदगुरु (कोयिलण्णन्), तिरुपति के साधु श्रीवैष्णव जन आदि – जहाँ कई लोग मामुनिगळ की महानता का पूर्वाभास करते हैं) के स्वप्नों से समझा जा सकता है।
इस प्रकार, हमने भगवान, पिराट्टी ,आऴ्वार् और आचार्यों द्वारा दर्शाए गए श्रीवैष्णवों की दिव्य महिमा देखी है और कुछ घटनाएँ भी देखी हैं जो इसे दर्शाते हैं। हमने सीता पिराट्टी और श्री वरवरमुनि द्वारा उन्हें संकट देने वालों के प्रति दिखाई गई अहैतुक कृपा को भी देखा। अब हम इस दिव्य ग्रंथ का अंतिम भाग अगले लेख में देखेंगे।
जारी रहेगा…पूरी श्रृंखला यहाँ देखी जा सकती है :- https://granthams.koyil.org/anthimopaya-nishtai-hindi/
अडियेन् जानकी रामानुज दासी
आधार – https://granthams.koyil.org/2013/07/19/anthimopaya-nishtai-17-causeless-mercy-of-bhagavathas/
प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – https://pillai.koyil.org