श्री रामायण तनि श्लोकम् – ४ – बाल काण्ड १९.१४ – अहं वेद्मि – भाग ३

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री रंगदेशिकाय नमः

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अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।
वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ।। १.१९.१४ ।।

ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ के पास जाते हैं और उनसे अपने यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को उनके साथ भेजने का अनुरोध करते हैं। राजा दशरथ को उनसे दूर रहने का दुःख होता है। वे अपने छोटे बच्चों (जिन्हें कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा) को युद्ध में भाग लेने के विचार से भी अत्यंत दुःखी होते हैं। उस समय, ऋषि विश्वामित्र उपरोक्त श्लोक कहते हैं। वे राजा दशरथ से कहते हैं कि वे, ऋषि वशिष्ठ और अन्य ऋषियों सहित, श्रीराम के वास्तविक स्वरूप से परिचित हैं, उन्हें (दशरथ को) छोड़कर । वे श्रीराम की महानता की व्याख्या करना आरंभ करते हैं, क्योंकि वे परब्रह्म हैं जिन्होंने आकर्षक रूप,  सौन्दर्य और महान पराक्रम के सहित अवतार लिया है।

अब तक के दोनों भागों के अर्थों का संक्षेप में पुनरावृत्ति करते हैं:

  • अहं वेद्मि : विश्वामित्र कहते हैं, “मैं परिचित हूँ कि श्री राम परमात्मा हैं”| वे परिचित हैं क्योंकि वे तपस्वी हैं, सदैव दर्भ घाँस एवं जटायुक्त केश के साथ हैं, आचार्यों के शरण ग्रहण कर सुश्रुषा पूर्वक उनसे विद्या ग्रहण करते हैं, सदैव योग में स्थित हैं, मुमुक्षु/ मोक्ष में इच्छुक हैं (दशरथ की तरह भुभुक्षु/ भोग में इच्छुक नहीं) | इस कारण वे अपनी अंतर्दृष्टि से श्री राम के वास्तविक स्वरूप को समझते हैं|
  • ‘महात्मानम्’ के सन्दर्भ में ‘आत्मा’ शब्द के पेरियवाच्चान पिळ्ळै द्वारा निम्नलिखित अर्थ समझाए गए हैं – जीवात्मा, धृति, देह, स्वभाव, परमात्मा, उत्साही, सूर्य, अग्नि, मन और वायु 
  • ‘अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्’ श्लोकांश श्रुति वाक्य “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्” मन्त्र का उपबृंहमण् (अर्थ विस्तार) है|
  • सर्वेश्वर जिन्हें ‘महात्मानम्’ कहा गया है, वे दशरथ के पुत्र श्री राम ही हैं|

पेरियवाच्चान् पिळ्ळै स्वामी का व्याख्यान

महर्षि विश्वामित्र के अनुरोध को सुनने के पश्चात महाराज दशरथ प्रत्युत्तर देते हैं कि श्री राम छोटी आयु के होने के कारण युद्ध करने में सक्षम नहीं हैं|  वे यह भी कहते हैं, “ ‘रामम्’ का‌ अर्थ सुकोमल, सौम्य, मधुर/आनंदमय है, जिन्होंने अभी युवावस्था भी नहीं प्राप्त किया है| इस कारण उनका शरीर युद्ध लड़ने योग्य अभ्यस्त नहीं है|”

  • सत्य पराक्रमम्‌ ‐ भगवान का रूप और शौर्य उनके साथ सदैव रहता है, आयु या काल के साथ परिवर्तन नहीं होता।
  • भगवान अपनी इच्छा के अनुरूप अनेक रूप धारण कर सकते हैं, अपने संकल्प के अनुसार उन्हें परिवर्तित कर सकते हैं। किन्तु अपने रूप के विपरीत, भगवान के गुण सदैव अपरिवर्तित, एक समान रहते हैं, शाश्वत हैं 
  • निम्न प्रमाणों से भगवान केे रूप एवं कल्याण गुणों के विषय में जान सकते हैं: 
    • श्री विष्णु पुराण १.२.१ – सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ (शाश्वत रूप एवं स्वभाव वाले।)
    • छन्दोग्य उपनिषद ८.३.१ ‐ “त इमे सत्याः कामा:” (भगवान के कल्याण गुण सदा सब के लिए रोचक और आकर्षक हैं)
    • विष्णु पुराण ६‐५-८४  “इच्छागृहीताभिमतोरुदेहः”   (भगवान अपनी इच्छा से मत्स्य, कूर्म आदि अनेक रूप धारण करते हैं।)
    • विष्णु पुराण ६‐५‐८५ तेजोबलैश्वर्यमहावबोधः सुवीर्यशक्त्यादिगुणैकराशिः। परः पराणौं सकला न यत्र क्लेशादयः सन्ति परापरेशे॥ (वो तेजस, बल, ऐश्वर्य, ज्ञान, वीर्य एवं शक्ति जैसे गुणों के राशि हैं। ये सभी गुण भगवान के पास सदैव रहते हैं।)
  • ऋषि विश्वामिन्न कहते हैं कि श्री राम महान शौर्य एवं वीर्य से युक्त हैं, इस कारण उन्हें केवल किशोर बालक नहीं समझना चाहिए।
  • सत्य पराक्रमम् : सदैव विजयी। सुन्दर काण्ड ३७.५३ : “अव्यवस्थौ हि दृश्येते युद्धे जयपराजयौ।।” (सांसारिक कार्यों में यह देखा जाता है कि कोई भी सदैव विजयी नहीं होता। कभी हारता है, कभी जीतता है । किंतु श्री राम के विषय में यह सत्य नहीं है। श्री राम तो सदैव विजयी ही होते हैं।)
  • अयोध्या काण्ड २.३७ – “गत्वा सौमित्रिसहितो नाऽविजित्य निवर्तते।” (श्रीराम युद्ध करने का निर्णय लेने के पश्चात जीते बिना वह वापस नहीं आएँगे, अर्थात शत्रुओं का पूर्ण रूप से नाश कर ही आते हैं।)
  • सत्य पराक्रमम् – श्रीराम इसकी प्रतीक्षा नहीं करते कि शत्रु उन पर आक्रमण करेंगे और वे उसका सामना करेंगे। अपितु श्रीराम तो शत्रुओं के दुर्ग की ओर प्रस्थान कर उनके दुर्गों पर आक्रमण कर उनका संघार करते हैं – अयोध्या काण्ड १.२९ “अभीयाता प्रहर्ता च”
    • तिरुमऴिसै आऴ्वार् ( भक्तिसार आऴ्वार्) तिरुछन्दविरुत्तम् ५६ में – ‘सॆन्ऱु कॊन्ऱु वॆन्ऱि कॊण्ड वीरने’ (हे योद्धा! जो शत्रुओं के दुर्गों पर आक्रमण कर, उनको नष्ट कर, विजयी हुए।)
    • श्री राम ऐसे विजेता हैं जिन्होंने समुद्र के पार सेतु बाँध दिया, लंका जाकर रावण का वध किया।
  • ‘सत्यपराक्रमम्’ की व्याख्या आगे मुण्डक उपनिषद् २.२.९ के प्रमाण से की गयी है।

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥’ जिसने परब्रह्म का र्दशन किया, उसके हृदय के सारे गाँठ खुल जाते हैं, मन के सारे संशय टूटकर बिखेर जाते हैं और समस्त कर्मों का नाश हो जाता है।’ 

  • यह समझने योग्य है कि जिस परब्रह्म के दर्शन से समस्त पापराशि नष्ट हो जाते हैं, यह स्पष्ट है कि उनका शत्रु भाव से सामना करने वालों का नाश हो जाएगा।
  • ये  परमब्रह्म शिव, ब्रह्मा एंव इन्द्र के द्वारा पूज्य है, जैसा कि तिरुवासिरियम् १ मे कहा गाया हैः “सिवन् अयन् इन्दिरन् इवर् मुदल् अनैत्तोर् दॆय्वक् कुऴाङ्गळ् कैतॊऴक् किडन्द ।” अर्थात्: परब्रह्म श्रीराम जो शिव, ब्रह्मा, इन्द्र आदि के गर्वों का भी भङ्ग कर, उन्हें अपनी आराधना में लगा लेते हैं, तो यह कोई अचरज की बात नहीं की‌राक्षसों का नाश हो जाएगा।
  • सत्य पराक्रमम् – ऐसे महाशौर्यशाली योद्धा परम दयालु एंव कृपालु भी हैं। अपने शत्रुओं को अपनी त्रुटियों को समझने एवं सुधारने का पर्याप्त समय देते हैं। सुधरने के पर्याप्त अवसर देने के पश्चात ही उनका नाश करते हैं।
  • प्राकृत संसार में बंधे होने के कारण कोई भगवान के प्रति द्वेष या शत्रुता रख सकता है। निम्नलिखित प्रमाण भगवान के सहनशीलता एवं क्षमाशीलता को दर्शातें हैं।
    •  श्री रामायण युद्धकाण्ड १८.३५ “अनयैनंहरिश्रेष्ठः दत्तमस्याभयंमया । विभीषणोवासुग्रीवः यदिवारावणस्स्वयम् ।।” अर्थातः यदि रावण भी स्वंय आकर शरणागति करे तो बिना संकोच के मेरे समीप लाओ।
    • श्री रामायण युद्ध काण्ड ५९.१८३ “गच्छानुजानामिरणार्धितस्त्वंप्रविश्यरात्रिंचरराजलकाम्
      आश्वस्यनिर्याहिरथीचधन्वीतदाबलंप्रेक्ष्यसिमेरथस्थः ।।” श्री राम रावण से कहते हैं कि वापस चले जाओ और कल वापस युद्ध क्षेत्र में आना। यह सोचते हुए कि सम्भवतः रावण अपने निर्णय बदलेगा और शरणागति करेगा।
    • पेरियाऴ्वार् तिरुमॊऴि १.७.९ – “वालुगिर्च् चिङ्गवुरुवाय् उळन्तॊट्टु इरणियन् ऒण् मार्वगलम् पिळन्दिट्ट” श्री नरसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का हृदय चीरकर देखा कि क्या उसमें उनके लिए तनिक भी प्रेम है? न पाकर भगवान ने उसे नष्ट कर दिया।

रामं सत्यपराक्रमम् – 

  • श्री राम के कर्म उनके वचन के अनुरूप है। त्रिविक्रम अवतार के जैसे नहीं जहाँ वे महाबली के पास वामन बनकर गये और त्रिविक्रम (अतिविशाल) बन कर तीनों लोकों को चरणों से माप लिया। श्री राम के वचन छलयुक्त नहीं होते।
  • श्री राम को युद्ध जीतने हेतु आयुधों के प्रयोग की भी आवश्यकता नहीं है। वे सौन्दर्य से ही सभी को जीत सकते हैं। श्री रामायण आरण्य काण्ड २६.३६ – “हतान्येकेन रामेण मानुषेण पदातिना ।।”
  • सत्यपराक्रमम् – श्री राम की वीरता इस प्रकार की है कि वे युद्ध करने का निश्चय तभी तक रखते हैं जब तक शत्रु शरणागति न कर ले। यद्यपि श्री राम का सौन्दर्य  ऐसा है कि सभी को मोहित कर दे, फिर भी रावण ने धनुष और बाण लेकर युद्ध किया। श्री राम तभी तक युद्ध करते रहे जब तक रावण पीड़ा से व्याकुल होकर धनुष नीचे नहीं रख दिया। श्री रामायण युद्ध काण्ड ५९.१३९ –  चचालचापञ्चमुमोचवीरः ।।
  • सत्यपराक्रमम् – श्री राम शयन भी कर रहे हों, तब भी शत्रुओं को सौन्दर्य मात्र से जीत लेते हैं। श्री रामायण सुन्दर काण्ड ३८.२४ – “स मया बोधितश्श्रीमान्सुखसुप्तः परन्तपः।”
    श्रीमान् – सौन्दर्ययुक्त
    सुखसुप्त: – शयन करते हुए
    परन्तप: -जो  जीत लेते हैं।

वशिष्ठोऽपि – वशिष्ठ महर्षि (भी) श्री राम के स्वरूप एवं उनके कल्याण गुणों को जानते हैं। निम्न प्रमाण वशिष्ठ भगवान की महानता और इक्ष्वाकु वंश में उनके प्रधान स्थान को दर्शाते हैं।

  • महर्षि  विश्वामित्र आगे कहते हैं कि ये वचन (राम सत्यपराक्रम हैं) केवल इस उद्देश्य से नहीं कहे गये हैं कि महाराज दशरथ प्रसन्न हों और श्री राम को वन भेज दें। वे आगे कहते हैं कि महर्षि वशिष्ठ, जो इक्ष्वाकु वंश के कुलगुरु एवं शुभचिन्तक हैं, वे भी इस विषय में सहमत होंगे। वशिष्ठ भगवान इक्ष्वाकु वंश के कुलगुरु हैं – इसे निम्नलिखित श्लोक में देखा जा सकता है, श्री रामायण अयोध्या काण्ड १११.४ – से तेहं पितुराचार्यस्तव चैव परन्तप। (मैं केवल तुम्हारा ही आचार्य नहीं हूँ, तुम्हारे पिता का भी हूँ।)
  • वशिष्ठ भगवान की महानता को मुरारी कवि ने भी अनर्घराघवम् में बताया है।
    • अनर्घराघवम् २.६० – “कुलगुरुभगवान वशिष्ठ:” (कुलगुरु होने के कारण इक्ष्वाकु वंश द्वारा किये गये सभी यज्ञों का इक्ष्वाकु वंश की समृद्धि का और सगर एवं भगीरथ महाराज द्वारा किये गये लोकोपकार के  कार्यों का श्रेय भी वशिष्ठ भगवान को जाता है।)
  •  वशिष्ठोऽपि – वशिष्ठ महर्षि की विश्वामित्र से सहमत होने का पूर्वकाल में महर्षि विश्वामित्र का रघुवंशी होने के और राजा कौशिक होने के संदर्भ में समझाया गया है, जिनकी महर्षि वशिष्ठ से पूर्व शत्रुता थी। महर्षि विश्वामित्र ऋषि बनने के पूर्व राजा कौशिक थे। महर्षि विश्वामित्र स्पष्ट करते हैं कि उसी वंश से होने के कारण पक्षपात से वशिष्ठ उनसे समर्थन नहीं कर रहे। महर्षि विश्वामित्र कहते हैं कि वास्तव में वशिष्ठ भगवान उनका पक्ष ने लें क्योंकि उनके बीच के पूर्व शत्रुता जो थी। इन कारणों से विश्वामित्र मुनि कहते हैं कि नृप दशरथ वशिष्ठ महर्षि की बातों का विश्वास करें।

वशिष्ठोऽपि – ‘अपि’ का यहाँ अर्थ है ‘भी’ अर्थात् विश्वामित्र ही नहीं वशिष्ठ भी श्री राम को जानते हैं। इससे विश्वामित्र मुनि के अतीत में वशिष्ठ ऋषि से रही शत्रुता के चरित्र का भी स्मरण होता है।

महातेजा: – प्रकाशवान् 

पेरियवाच्चान् पिळ्ळै ‘महातेजाः’ का निम्न अर्थ  प्रदान करते हैः –

  • वशिष्ठ भगवान अपने वंश एवं महान तप के कारण अन्य ऋषियों से श्रेष्ठ हैं। 
  • अखिलाणड कोटिब्रह्माण्डनायक भगवान भी उनके सामने शीश झुकाते हैं एवं उनके शिष्य बनकर सुश्रुषा करते हैं।
  • नृप कौशिक (महर्षि विश्वामित्र) भी, जो यश के राशि कहे जाते हैं  (कौशिको यशसां निधि), वे भी वशिष्ठ के प्रति विशेष आदर रखते हैं। श्री रामयाण बाल काण्ड ६५-२३ – क्षत्रवेदविदां श्रेष्ठो ब्रह्मवेदविदामपि।  ब्रह्मपुत्रो वशिष्ठो मामेवं वदतु देवता:।। श्री रामायण बाल काण्ड ६५-२५ “सत्यं चकार ब्रम्हर्षिरेवमस्तविति चाब्रवीत्” (यहाँ ऋषि विश्वामित्र अपने ब्रह्मर्षि पद के लिए वशिष्ठ भगवान के स्वीकृति एवं सविकार्यता की इच्छा करते हैं।)
  • आपस्तंब सूत्र २.१३.८- “तेषां तेजोविशेषेण प्रत्यवायो न विद्यते।” (महान तपस्वी गण अपने तप के प्रभाव से अपने पापों को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं।) यहाँ एक प्रश्न उठ सकता है कि क्या वशिष्ठ महर्षि ने (पाप समझते हुए) विश्वामित्र महर्षि की बात यूँहीं मान लिया है ?
  • इस शंका को दूर करने के लिए विश्वामित्र महर्षि कहते है महातेजा:।
    • श्री रामायण अयोध्या काण्ड २.२९ “राम सत्पुरुषो लोके सत्यधर्मपरायणः। साक्षाद्रामाद्विनिर्वृत्तो धर्मश्चापि श्रिया सह।।” सत्य और धर्म ही वशिष्ठ महर्षि के जीवन लक्ष्य हैं।
    • वेद भी कहते हैं: “सत्यं वद, धर्मं चर।” वशिष्ठ सदैव सत्य बोलते हैं एवं धर्म का आचरण करते हैं तथा दूसरों को भी धर्म पालन का शिक्षा देते हैं। इस कारण वशिष्ठ महर्षि असत्य स्वीकार नहीं कर सकते।
    • श्री रामायण बाल काण्ड ५६.२३ “धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्। एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वास्त्राणि हतानि मे।।” ब्रह्मतेजस् ही वास्तविक बल है। इस कारण वशिष्ठ महर्षि को उचित ही ‘महातेजाः’ कहा गया है।

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास।
अडियेन रमा श्रीनिवास रामानुज दासी।

आधार: https://granthams.koyil.org/2025/07/01/sri-ramayana-thani-slokam-4-english/

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