श्रीवचन भूषण – सूत्रं १९२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी एक विश्वसनीय व्यक्ति के शब्दों के माध्यम से दयालुतापूर्वक यह समझा रहे हैं कि जब भागवतों के प्रति गलतियाँ की जाती हैं तो भगवान उचित दंड देंगे। सूत्रं – १९२ “ईश्वरन्‌ अवतरित्तुप्‌ पण्णिन आनैत्‌ तॊळिल्गळ्‌ … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १९१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके बाद, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी जले हुए वस्त्र की प्रकृति की पहचान करते हैं। सूत्रं – १९१ मडिप्पुडवै वॆन्दाल्‌ उण्डैयुम्‌ पावुम्‌ ऒत्तुक्‌ किडक्कुम्‌; काट्रडित्तवाऱे पऱन्दुपोम्‌ सरल अनुवाद जब किसी तह किए हुए वस्त्र को जलाया जाता है, तो … Read more

श्री रामायण तनि श्लोकम् – ७ – बाल काण्ड २०.२ – ऊनषोडशवर्ष: – भाग २

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः पूरी श्रृंखला << भाग ६ ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:।न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:।। १.२०.२ ।। राजा दशरथ कहते हैं— “मेरे कमलनयन श्रीराम सोलह वर्ष से कम आयु के हैं। मैं उसमें राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता नहीं देखता।”  पिछले लेख में निम्नलिखित विषयों का निरूपण … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १९०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया कि “यदि कोई भागवतों के प्रति शत्रुता रखता है तो वह अपना वास्तविक स्वरूप खो देगा; ऐसे में, यह कैसे संभव है कि जो लोग भागवतों के प्रति शत्रुता रखते हैं, उनका नाम और स्वरूप … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १८९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका सूत्र १७९ में, “तन्नैत्‌ ताने …”, कहते हुए, अहंकार (अपने स्वरूप को भ्रमित करना,  अहंकार) और सांसारिक विषयों (सांसारिक सुख) की क्रूर प्रकृति को अलग-अलग पहचाना गया था, जो आत्मा के सच्चे स्वरूप के लिए विनाशकारी हैं; अब, … Read more

श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) के दिव्य नाम – कारीमाऱन्, तिरुनावीरुडैय पिरान्

श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः। पूरी श्रृंखला  << पूर्व ५. कारीमाऱन्  जैसा कि पूर्व नाम “माऱन्” में वर्णित है, माऱन् का अर्थ है – जो सामान्य सांसारिक लोगों से सर्वथा भिन्न हो, जिसका मन जन्म से ही विषय-भोगों में न जाकर (प्रवृत्त न होकर) केवल भगवान में अनुरक्त हो। “कारीमाऱन्” नाम … Read more

श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) के दिव्य नाम – माऱन्, नावीरर्

श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः। पूरी श्रृंखला  << पूर्व ३. माऱन्  माऱन् एक तमिऴ् नाम है। माऱन् का अर्थ है, वह व्यक्ति जो सामान्य लोगों से पूर्णतः भिन्न और विलक्षण हो। श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) का सम्पूर्ण जीवन सांसारिक एवं विषयासक्त लोगों से सर्वथा भिन्न था। एवं विषयासक्त लोगों से पूर्णतः … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १८८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक उन दो प्रकार के व्यक्तित्वों के मध्य में अंतर स्पष्ट करते हैं जिन्हें उदाहरण के रूप में दिखाया गया है। सूत्रं – १८८ केवल नास्तिकनैत्‌ तिरुत्तलाम्‌; आस्तिक नास्तिकनै ऒरुनाळुम्‌ तिरुत्त ऒण्णादु. सरल अनुवाद … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १८७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक उन लोगों के मध्य अंतर समझा रहे हैं जो सांसारिक सुखों के स्वभाव को जाने बिना उनमें लिप्त हैं और उन लोगों के मध्य जो सांसारिक सुखों के स्वभाव को भली-भाँति जानते हुए … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १८६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने एक प्रामाणिक व्यक्तित्व के शब्दों में इस सिद्धांत को स्पष्ट किया है। सूत्रं – १८६ “काट्टिप्‌ पडुप्पायो” ऎन्नक्‌ कडवदिऱे सरल अनुवाद श्रीसहस्रगीति ६.९.९ में स्पष्ट रूप से कहा गया है “काट्टिप्‌ पडुप्पायो”  (क्या … Read more