श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः।
५. कारीमाऱन्
जैसा कि पूर्व नाम “माऱन्” में वर्णित है, माऱन् का अर्थ है – जो सामान्य सांसारिक लोगों से सर्वथा भिन्न हो, जिसका मन जन्म से ही विषय-भोगों में न जाकर (प्रवृत्त न होकर) केवल भगवान में अनुरक्त हो।
“कारीमाऱन्” नाम में “कारी” श्री शठकोप स्वामी के पूज्य पिताश्री का नाम है।
अतः कारीमाऱन् का अभिप्राय है – कारी के पुत्र श्री शठकोप स्वामी।
श्री शठकोप स्वामी के कुल की सबसे विलक्षण विशेषता यह थी कि उस वंश के समस्त महापुरुष पूर्ण रूप से सर्वेश्वर श्रीमन्नारायण के शरणागत थे।
उनका मन किसी अन्य देवता की उपासना में कभी प्रवृत्त नहीं हुआ। अनन्य भगवदाश्रय और अखण्ड शरणागति उस वंश की अमूल्य परम्परा थी, जो अन्ततः श्री शठकोप स्वामी के दिव्य जीवन में अपनी चरम अभिव्यक्ति को प्राप्त हुई।
श्री शठकोप स्वामी की वंश-परम्परा इस प्रकार वर्णित है:
तिरुवळुतिवळ नाडार्,
अऱन्दाङ्गियार्,
चक्रपाणियार्,
अच्युतर्,
सॆन्दामरैक्कण्णर्,
पॊऱ्-कारियार्,
कारियार्
तथा उनके दिव्य पुत्र माऱन्, अर्थात् श्री शठकोप स्वामी।
इसी कारण आऴ्वार् “कारीमाऱन्” नाम से भी विख्यात हैं।
६. तिरुनावीरुडैय पिरान्
यह श्री शठकोप स्वामी का अत्यन्त मधुर तमिऴ् दिव्य नाम है।
“पिरान्” का अर्थ है, महान उपकारी, परम हितैषी।
“तिरुनावीरुडैय पिरान्” का अर्थ है – वे महापुरुष जिनकी दिव्य जिह्वा अलौकिक सामर्थ्य से सम्पन्न है; जिनकी वाणी स्वयं भगवान के कारण हृदय को भी मोहित एवं आंदोलित करने की क्षमता रखती है।
स्वयं श्री शठकोप स्वामी तिरुवायमोऴि (६.४.९) “कलक्क एऴ् कडल् एऴ् मलै उलगेऴुम् कऴियक् कडाय्”, इस पासुर में कहते हैं: “माल् वण्णनै मलक्कु नावुडैयेऱ्-कु” अर्थात्, “मुझे ऐसी दिव्य वाणी प्राप्त है जो स्वयं श्रीमन्नारायण को भी विस्मित एवं प्रेमविह्वल कर सकती है।”
इसी प्रकार तिरुवायमोऴि (३.९.११) में वे उद्घोष करते हैं,
“एऱ्-कुम् पॆरुम् पुगळ् वानवर् ईसन् कण्णन् तनक्कु ।
एऱ्-कुम् पॆरुम् पुगळ् वण् कुरुगूर्च् चटकोपन् सॊल् ।
एऱ्-कुम् पॆरुम् पुगळ् आयिरत्तुळ् इवैयुम् ओर् पत्तु ।
एऱ्-कुम् पॆरुम् पुगळ् सॊल्ल वल्लार्क्किल्लै सन्ममे…”
इस दिव्य पाशुरम् में आऴ्वार् पहले भगवान श्रीकृष्ण के अनन्त कल्याणगुणों का स्मरण करते हुए प्रश्न करते हैं कि ऐसे अनन्त महिमा-सम्पन्न भगवान का यथार्थ गुणगान करने का सामर्थ्य किसमें है? तत्पश्चात् वे स्वयं इसका समाधान करते हुए कहते हैं कि “एऱ्-कुम् पॆरुम् पुगळ् वण् कुरुगूर्च् चटकोपन्”, अर्थात्—”केवल मैं ही वह हूँ, जिसे भगवान के दिव्य स्वरूप, अनन्त कल्याणगुण एवं अपार महिमा का यथार्थ गान करने का दिव्य अधिकार और सामर्थ्य प्राप्त है।”
इस प्रकार स्वयं श्री शठकोप स्वामी अपने श्रीमुख से यह प्रतिपादित करते हैं कि उनकी दिव्य वाणी साधारण नहीं, अपितु भगवत्कृपा से सम्पन्न, अलौकिक सामर्थ्ययुक्त एवं सम्पूर्ण जगत् के कल्याण का साधन है।
इसी दिव्य वाणी के कारण वे “तिरुनावीरुडैय पिरान्” के नाम से आदरपूर्वक वन्दित किए जाते हैं।
अडियेन् श्यामसुंदर रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2026/07/03/nammazhwars-divine-names-karimaran-thirunavirudaiya-piran/
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