श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने एक प्रामाणिक व्यक्तित्व के शब्दों में इस सिद्धांत को स्पष्ट किया है।
सूत्रं – १८६
“काट्टिप् पडुप्पायो” ऎन्नक् कडवदिऱे
सरल अनुवाद
श्रीसहस्रगीति ६.९.९ में स्पष्ट रूप से कहा गया है “काट्टिप् पडुप्पायो” (क्या तुम मुझे अन्य वस्तु दिखाओगे और मुझे नष्ट कर दोगे?)
व्याख्या
काट्टि …
इसका अर्थ है, जैसा कि आऴ्वार् ने कहा, “क्या तुम मुझे, जो पापी हूँ, इस संसार में रहने के लिए विवश करके नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे हो, जहाँ मैं उपयुक्त नहीं रहूँगा, और वह भी नीच सुखों को दिखाकर जो भिन्न-भिन्न रूप के हैं और स्वभाव से ही बुरे हैं?”
अडियेन् केशव रामानुज दास
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