श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
इससे पहिले श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने समझाया था कि सांसारिक सुखों के सम्पर्क में आने से सच्चे स्वरूप का विनाश होता है और सांसारिक सुखों के माध्यम से आनंद प्राप्त करने का प्रयास विपरीत ज्ञान का परिणाम है; इसके साथ ही, वे कह रहे हैं कि जो व्यक्ति भगवान के गुणों के चिंतन में लीन हो जाता है, वह उन्हें देखकर ही मर जाएगा और सम्पर्क की आवश्यकता नहीं है।
सूत्रं – १८५
असुणमा मुडियुमाप्पोले, भगवदनुभवैकपरनाय् मृदु प्रकृतियाय् इरुक्कुमवन् विषय दर्शनत्ताले मुडियुम्बडि।
सरल अनुवाद
जिस प्रकार असुणमा पक्षी (एक मृदु संगीत प्रिय पक्षी) मर जाता है, उसी प्रकार जो कोमल हृदय वाला व्यक्ति भगवान के सुखों में लीन रहता है, वह सांसारिक सुखों को देखकर मर जाता है।
व्याख्या
असुणमा …
अर्थात् – असुणमा नामक पक्षी मधुर संगीत सुनकर द्रवित हो जाता है; उसी समय यदि कर्कश ढोल बजाया जाए और वह उसे सुने तो वह मर जाएगा; उसी प्रकार, जो केवल भगवान का आनंद लेता है भगवान के गुणों में लीन रहता है और सांसारिक सुखों के नाम सुनकर ही दुखी हो जाता है, वह सांसारिक सुखों को देखते ही व्यथित होकर मर जाएगा क्योंकि, ये सुख आत्मा के सच्चे स्वरूप को नष्ट करते हैं जिसे केवल भगवान का आनंद लेना चाहिए।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/08/srivachana-bhushanam-suthram-185-english/
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