श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया, “यदि भक्त इस प्रकार भगवान से प्रार्थना करे [दिव्य लोकों से आसक्त रहने के लिए], तो क्या लक्ष्य प्राप्त करने के पश्चात भी वे उसके प्रिय बने रहेंगे?” तो श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने कृपापूर्वक … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी भगवान की परम अवस्था की खोज कर रहे हैं, जिसमें दिव्य धामों के प्रति कम आसक्ति होती है। सूत्रं – १७३ “इळङ्गोयिल्‌ कैविडेल्‌” ऎन्ऱु इवन्‌ प्रार्थिक्क वेण्डुम्बडिया इरुक्कुम्‌ । सरल अनुवाद जैसा कि इरण्डाम्‌ तिरुवन्दादि … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक इन (भक्तों और दिव्य निवास) को लक्ष्य और साधन मानते हुए अपने आसक्ति के स्तर को समझाते हैं। सूत्रं – १७२ “कल्लुम्‌ कनै कडलुम्‌” ऎन्गिऱपडिये इदु सिद्दित्ताल्‌ अवट्रिल्‌ आदरम्‌ मट्टमाय्‌ इरुक्कुम्‌” सरल अनुवाद … Read more

श्रीवचनभूषण – सूत्रं १७१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका पहले श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने कहा था कि भगवान सभी दिव्यदेशों के प्रति जो प्रेम रखते हैं, वह केवल अपने भक्त के प्रति ही प्रकट करते हैं; अब, कृपापूर्वक यह समझाने के लिए कि अपने भक्त को प्राप्त … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके पश्चात, श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक समझाते हैं कि भगवान को अपने प्रिय भक्त का शरीर कितना प्रिय होता है। सूत्रं – १७० “तिरुमालिरुञ्जोलै मलैये” ऎन्गिरपडिये उगन्दरुळिन निलङ्गळ् ऎल्लावट्रिलुम् पण्णुम् विरुप्पत्तै इवनुडैय शरीरैकदेशत्तिले पण्णुम् सरल अनुवाद जैसा … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी एक अन्य मार्ग से अपने भक्त के दिव्य शरीर के प्रति भगवान के प्रेम को उजागर करते हैं। सूत्रं – १६९ परमार्तनान इवनुडैय शरीर स्थितिक्कु हेतु, केवल भगवदिच्छैयिऱे। सरल अनुवाद भौतिक संसार में रहने के … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक एक उदाहरण देकर समझाते हैं कि भगवान को आऴ्वार् के दिव्य शरीर से न केवल उस प्रकार लगाव है जैसे किसी व्यक्ति को अपने प्रियतम के मैल से होता है, परंतु साथ ही उसमें … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया, “इस प्रकार, जैसे कोई अपने प्रिय व्यक्ति के मैला/श्वेत को चाहता है, उसी प्रकार ईश्वर उस शरीर से प्रीति रखते हैं जिसे आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति त्याग देता है, जैसा कि तिरुविरुत्तम् १ में कहा गया … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी हमें भगवान के शब्दों का स्मरण दिलाते हुए इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि यह केवल सांसारिक उदाहरण में ही नहीं, परंतु पिराट्टी के प्रति भगवान के दृष्टिकोण में भी देखा जाता है। सूत्रं … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया, “क्या दोष (भौतिक शरीर) को दूर करने पर आत्मा का सच्चा स्वरूप अत्यंत शुद्ध और आनंददायक नहीं होगा? ऐसे में शरीर का निष्कासन अवांछनीय क्यों है और शरीर स्वयं वांछनीय क्यों है?”  श्री पिळ्ळै लोकाचार्य … Read more