श्रीवचन भूषण – सूत्रं १८०

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तत्पश्चात श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक स्वयं को नष्ट करने के ज्ञान को समझाते हैं।

सूत्रं – १८०

तन्नैत्‌ ताने मुडिक्कैयावदु –  अहंकारत्तैयुम्‌ विषयन्गळैयुम्‌ विरुम्बुगै |

सरल अनुवाद

स्वयं का नाश करने का अर्थ है अहंकार (शरीर को आत्मा के समान मानना ​​और स्वयं को स्वतंत्र मानना) और विषयों (सांसारिक सुखों) की इच्छा करना।

व्याख्या

तन्नैत ताने …

अहंकारम्‌ 

आत्मप्रेम (देहात्म अभिमान)(शरीर को आत्मा के समान मानना) और स्वतंत्रता-प्रेम (स्वयं को स्वतंत्र मानना)।

विषयन्गळ्‌

विहित (नियुक्त) और निषिद्ध सुख। 

इनके ,

विरुम्बुगै

प्रति अत्यधिक लालसा रखना।

आत्म स्वरूप (स्वभाव) केवल भगवान की सेवा करना और केवल भगवान का आनंद लेना है; इन [निषिद्ध] अंशों में संलग्न होने का अर्थ है ऐसे सच्चे स्वरूप का विनाश।

श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी द्वय महा मंत्र के उत्तर वाक्य (पश्च भाग) की व्याख्या करते समय इन विषयों की बात क्यों कर रहे हैं?

उत्तर वाक्य में उपस्थित “नमः” के लक्ष्य के लिए बाधाएँ दूर हो जाती हैं – भाष्यकार ने कृपापूर्वक शरणागति गद्यम में तीन चूर्णिकैयों में इसकी व्याख्या किये है, जिसका प्रारम्भ दसवीं चूर्णिकै “मनो वाक्‌ कायैः”  (मेरे मन, शरीर और वाणी आदि द्वारा किए गए सभी पापों को क्षमा करें) से होती है।

श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने स्वयं मुमुक्षुप्पड़ी में नमः शब्द की व्याख्या करते हुए सूत्र १८० में कहा है, “इदिले अविद्यादिगळुम्‌ कळियुण्णुम्‌” (इस नमः में अज्ञान आदि का भी नाश होता है)।

अतः यहाँ भी, देहात्मा अभिमान के रूप में अहंकार, सांसारिक सुखों के प्रति आसक्ति जो ऐसे अहंकार का परिणाम है और भागवत अपचार (भक्तों को ठेस पहुँचाना) जो उपरोक्त दोनों अंशों का परिणाम है इन सभी की श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने कृपापूर्वक निरंतर और अनियमित रूप से व्याख्या की है; अतः यहाँ इनकी व्याख्या करने में कोई दोष नहीं है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/03/srivachana-bhushanam-suthram-180-english/

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