आचार्य हृदयम् – २२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – २१ अवतारिका (परिचय) नायनार् इस मूलतत्त्व को तिरुमन्त्र में दर्शा रहे हैं (जिसे पिछली चूर्णिका में समझाया गया था) जो स्वरूप याथात्म्य (आत्मा का आंतरिक सच्चा स्वरूप) को प्रकट करता है। तिरुमन्त्र की संक्षिप्त व्याख्या इस चूर्णिका को सुचारू रूप से समझने … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका सूत्रं १३६ “पूर्ण विषयम्” से लेकर यहाँ तक, अतिरिक्त जानकारी दी गई है, किन्तु इससे पहिले प्रपत्ती की महानता का वर्णन किया जा चुका है। अतः प्रपत्ती की एक और महानता समझाने के लिए श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वमीजी कृपापूर्वक सिद्धोपाय … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १३९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया कि “क्या भगवान के सुलभता से संतुष्ट होने के लिए कोई प्रमाण (शास्त्रों में प्रमाण) है?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने तदपश्चात समझाया। सूत्रं – १३९  “पत्रं पुष्पम्”, “अन्यत् पूर्णात्”, “पुरिवदुवुम् पुगै पूवे” सरल अनुवाद श्रीभगवद्गीता … Read more

श्रीवचनभूषण – सूत्रं १३८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “यद्यपि वह (भगवान) पूर्ण है क्या उसकी पूर्णता चेतन को यह सोचकर पीछे हटा देगी कि ‘हम अपनी शून्यता के कारण उन्हें कभी प्रसन्न नहीं कर सकते’?”  तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक समझाते हैं। … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १३७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व जब पूछा गया कि “परंतु भगवान चेतन से कैसे प्रसन्न होंगे?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक समझाते हैं। सूत्रं १३७ आभिमुख्य सूचक मात्तिरत्तिले सन्तोषम् विळैयुम्। सरल अनुवाद चेतन के अनुकूल चित्त को देखकर ही भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। व्याख्या … Read more

आचार्य हृदयम् – २१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – २० अवतारिका (परिचय) आत्मा के सर्वस्वरूप के ज्ञान में दो भिन्न-भिन्न स्तरों का ज्ञान होता है – स्वरूप ज्ञानम् (सत्य स्वरूप का ज्ञान) और स्वरूप यथात्म्य ज्ञानम् (आन्तरिक सत्य स्वरूप का ज्ञान)। उसमें आत्मा के शेषत्वम् (दासत्व) और ज्ञातृत्वम् (ज्ञाता होने से) … Read more

आचार्य हृदयम् – २०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – १९ अवतारिका (परिचय) वे जन (शास्त्री जो शास्त्र में पारङ्गत हैं) और सारज्ञों (शास्त्र के सार के ज्ञाता) द्वारा इन अवस्थाओं (स्वयं का प्रयास सहित भगवान की कृपा पर निर्भर रहने की अवस्था, और भगवान पर पूर्णाश्रित रहने की अवस्था) को … Read more

आचार्य हृदयम् – १९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – १८ अवतारिका (परिचय) अब, उन मुमुक्षुओं के स्वरूपों की व्याख्या की गई है जो शास्त्रों के और शास्त्रों के सार के अनुयायी हैं। चूर्णिका -१९ शास्त्रिगळ् तॆप्पक्करैयरैप्पोले इरण्डैयुम् इडुक्किप् पिऱविक्कडलै नीन्द सारज्ञर् विट्टत्तिलिरुप्पारैप् पोले इरुकैयुम् विट्टुक् … Read more

आचार्य हृदयम् – १८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – १७ अवतारिका (परिचय) “शास्त्र और तिरुमन्त्र, जो शास्त्र का सार है, क्या योग्य पात्र के या सभी के अनुसरण करने हेतु सुलभ है?” इस प्रश्न का उत्तर यहाँ दिया गया है। चूर्णिका १८ तोल् पुरैये पोमदुक्कुप् … Read more

आचार्य हृदयम् – १७

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – १६ अवतारिका ( परिचय) इस प्रकार, पिछली चूर्णिका में यह बताया गया कि भगवान ने कृपापूर्वक संसारी चेतनों (बद्ध आत्माओं) का उद्धार करने के लिए शास्त्र और तिरुमन्त्र का प्रकटीकरण किया, जो कि उन शास्त्रों का सार … Read more