श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४७

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अवतारिका

तत्पश्चात्, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी एक उदाहरण द्वारा समझाते हैं कि चेतन द्वारा की गई प्रपत्ती को पूर्व कर्मों के विषय में सोचते समय अपराध माना जाएगा।

सूत्रं १४७

नॆडुनाळ्‌ अन्यपरैयाय्प्‌ पोन्द भार्यै, लज्जा भयङ्गळ्‌ इन्ऱिक्के भर्तृ सहाशत्तिले निन्ऱु “ऎन्नै अङ्गीकरिक्क वेणुम्‌” एन्ऱु अपेक्षिक्कुमाप्पोले इरुप्पदु ऒन्ऱिऱे इवन्‌ पण्णुम प्रपत्ति।

सरल अनुवाद

एक पत्नी, जो बहुत समय से विवाहेतर सम्बन्ध में थी, बिना किसी लज्जा और भय के, अपने पति के सामने आकर उससे प्रार्थना करती है, “आप मुझे स्वीकार करें।” चेतन द्वारा की जाने वाली प्रपत्ती इसी प्रकार की होती है।

व्याख्या

नॆडुनाळ्‌

अर्थात् – जब एक पत्नी, जिसका अपने पति से कोई लगाव नहीं था और जो अन्य पुरुषों के साथ सम्बन्ध रखती थी और अपने पति का लक्ष्य थी बिना यह सोचे कि “मैं, जो इस अवस्था में हूँ, बिना किसी लज्जा के उनके सामने कैसे खड़ी हो सकती हूँ” और बिना यह सोचे कि “मेरे सभी कृतियों को उन्होंने देखा है। यदि वे मुझे यह सोचकर दंड दें कि ‘इसने इस प्रकार मेरे सामने आने का और मुझसे स्वीकारने की याचना करने का दुस्साहस कैसे किया!’ तो मैं क्या करूँगी?” अपने पति के पास जाती है, उसके सामने खड़ी होती है और उससे उसे स्वीकार करने का अनुरोध करती है यह कितना बड़ा अपराध होगा! इसी प्रकार, चेतन जो चिरकाल से भगवान से दूर रहता रहा, अपने पिछले कार्यों के बारे में सोचने की  लज्जा के बिना और बिना इस डर के कि जब वे दंड देंगे तो हम क्या करेंगे, भगवान के सामने जाता है और वहाँ खड़ा हो जाता है, उन्हें उपाय [अर्थात प्रपत्ति करना] के रूप में स्वीकार करते हुए।इसलिए, यहाँ तक, स्वगत स्वीकार अनुपायत्वम् (स्वयं प्रपत्ती करना, उपाय नहीं होना) और परगत स्वीकार उपायत्वम् (भगवान हमें स्वीकार करना, उपाय होना) की व्याख्या की गई।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/07/01/srivachana-bhushanam-suthram-147-english/

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