श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः
अवतारिका (परिचय)
नायनार दयापूर्वक उदाहरण सहित समझा रहे हैं कि जो लोग विशिष्ट कार्य में (कैङ्कर्य) में संलग्न रहते हैं, उनके साधारण कर्तव्य स्वभाविकत: ही दूर हो जाते हैं।
चूर्णिका -३१
जात्याश्रम दीक्षैगळिल् भेदिक्कुम् धर्मङ्गळ् पोले अत्ताणिच्चेवत्तिल् पॊदुवानदु नऴुवुम्।
सरल व्याख्या –
जैसे कि जाति, आश्रम और दीक्षा के आधार पर कुछ धर्म (कर्तव्य) भिन्न होते हैं, वैसे ही गुह्य (अंतरंग) सेवा में संलग्न रहने से साधारण कर्तव्य लुप्त हो जाते हैं।
व्याख्या (टीका)
जैसे कि – आपस्तम्ब सूत्र “स्वकर्म ब्राह्मणस्य अध्ययनम्, अध्यापनं, यजनं, याजनं, दानं, प्रतिग्रहणं, दायाद्यं, सिलोञ्च: अन्यश्च अपरिगृहीतम् एतान्येव क्षत्रियस्य अध्यापन याजन प्रतिग्रहणानि परिहार्याणी: दण्डयुद्धाधिकारं क्षत्रियवत् वैष्यस्य दण्डयुद्ध वर्जं कृषि गोरक्षा वाणिज्याधिकं ग्राह्यम्” (ब्राह्मण के कर्तव्य हैं- अध्ययनम् (वेदाध्ययन), अध्यापनम् (वेदों को पढ़ाना), यजनम् ( स्वयं के लिए यज्ञ करना), याजनम् (दूसरों के लिए यज्ञ करना), दानम् (दान देना), प्रतिग्रहणम् (दान स्वयं स्वीकार करना), पैतृक सम्पत्ति ग्रहण करना, खेतों से धान एकत्रित करना, बचे हुए फल और जड़ों को जो दूसरों के द्वारा एकत्र न किए गये हो उनको एकत्र करना, क्षत्रिय और ब्राह्मण के लिए उल्लिखित कार्यों में, वेद पढ़ाना, दूसरों के लिए यज्ञ करना और दान देने के अतिरिक्त, वेदाध्ययन, स्वयं के लिए यज्ञ करना और दान देना अन्य तीन कर्तव्य लागू होते हैं, इसके अतिरिक्त वे दूसरों को दण्ड दे सकते हैं और युद्ध में संलग्न हो सकते हैं, दण्डित करना और युद्ध करना क्षत्रियों का कर्तव्य है, इसके अतिरिक्त वैश्यों के लिए अन्य तीन कर्तव्य लागू होते हैं कृषि, गौ रक्षा और व्यापार करना, ब्राह्मणों के लिए अध्ययन, अध्यापन में और दान करना, प्रतिग्रहण अनिवार्य कर्तव्य हैं, जबकि वैश्यों के लिए कृषि, गौ रक्षा और व्यापार अनन्य कर्तव्य हैं। शूद्रों के लिए आपस्तम्ब सूत्र में कहा गया है, “शुश्रूषा शूद्रस्य इतरेषाम् वर्णानाम्” (अन्य वर्णोंके लोगों को उनके संबंधित कर्तव्यों में सहायता करना शूद्रों के लिए अनिवार्य कर्तव्य है)। त्रैवर्णिकों (तीन वर्णों के लोगों) की सहायता करना उनका कर्तव्य है। इस प्रकार एक वर्ण के व्यक्ति के लिए जो अनिवार्य कर्तव्य है, उसे दूसरे वर्ण के व्यक्ति के लिए त्याग देना चाहिए।
ब्रह्मचर्य (संयम) अवस्था में भिक्षा मांगना, समिधा दान आदि करना उचित है परन्तु गृहस्थ अवस्था में इसको त्यागना ही उचित है। गृहस्थाश्रम में अग्निहोत्र और अतिथि सत्कार करना उचित है। वानाश्रम में मनुस्मृति में कहा गया है, “सन्त्यज्य ग्राम्यम् आहारम् सर्वञ्चैव परिच्छदनम्” (ग्राम या शहर के आहार विधि और वस्त्रों का त्याग करना चाहिए) और जैसे पहले आश्रम में जो कुछ भी माननीय था, जैसे गांव में पकाया गया भोजन, वस्त्रादि, उनका त्याग करना चाहिए। मनुस्मृति में कहा गया है, “वसीत चर्म चीरम् वा,” (प्रत्येक को पशु की खाल या वृक्ष की छाल से बने वस्त्रों का उपयोग, जटाधारी केश रखना, दाढ़ी बढ़ाना, नाखून बढ़ाना, वन से प्राप्त होने वाला भोजन करना आदि अनिवार्य है, संन्यास आश्रम में पहले बताते आश्रमों में जो भी माननीय हो जैसे अग्निहोत्र, अतिथि सत्कार आदि और जटाधारी केश रखना उनका त्याग करना चाहिए और मनुस्मृति में कहा गया है, “अनग्निर् अनिकेतस्स्यात्” (अग्नि स्पर्श न करना और कोई निवास स्थान न रखना) अग्नि से सम्पर्क न रखना, निवास स्थान न बनाना और किसी की सहायता न लेना, इन सबका पालन करना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक आश्रम में धर्म भिन्न होता है।
जिसने ज्योतिष्टोम इत्यादि अनुष्ठान करने का संकल्प लिया है, दीक्षा में, उसके लिए उन सभी नित्य कर्म, जो चतुर्वर्ण और चतुराश्रमों के लिए समान हैं, उनका अनुष्ठान नहीं करना चाहिए और केवल ज्योतिष्टोम इत्यादि का ही अनुष्ठान करना चाहिए।
अतः ब्राह्मणों आदि वर्णों के आधारित, ब्रह्मचर्य आदि आश्रमों के आधारित और ज्योतिष्टोम आदि दीक्षा के आधारित कर्तव्य भिन्न-भिन्न हैं। ऐसे ही, जो कैंकर्य में संलग्न हैं अर्थात सेवारत हैं, जिसे असाधारण कहा जाता है क्योंकि वह ईश्वर के एक असाधारण विग्रह (अर्चावतार) के प्रति निभाया था रहा है और इसलिए तिरुप्पल्लाण्डु ८ में “अत्ताणिच् चेवगम्” (अविच्छिन्न सेवा) कहा गया है, जो भी कर्म उस भगवान की आराधना के लिए किए जाते हैं जो देवताओं के अंतर्यामी हैं और देवताएँ उनके शरीर हैं, इसलिए साधारण (सामान्य) कर्म होते हुए, स्वाभाविक रूप से छुट जाते हैं, जैसे कि “उऱङ्गुवान् कैप्पण्डम्” (निद्रावश होने वाले व्यक्ति के हाथ में पकड़े किसी वस्तु के समान, जिसे वह अनायास)
इसके साथ यह स्पष्ट किया गया है कि जिस प्रकार वर्णाश्रम में विधि अनुसार कर्तव्य करने वालों के लिए उपयुक्त कर्तव्य लागू होंगे और अन्य कर्तव्यों का त्याग करना पड़ेगा, उसी प्रकार स्वरूप तादात्म्य दृष्टि वाले (जिन्होंने आत्मा के आन्तरिक शाश्वत स्वरूप को जान लिया है)ऐसे लोगों के लिए, उनके लिए उपयुक्त कर्मों को छोड़कर अन्य सभी कर्म स्वाभाविकता से छूट जाएँगे।
यह सब जानते हुए भी, शिष्ट (हमारे आचार्य और आदरणीय) कर्म क्यों करते हैं? इसका कारण है कि वे संसार के लोगों (जो कैङ्कर्य में एकाग्रचित्त नहीं हैं) को उनके अनुष्ठानों का पालन करने और उसके कारण नष्ट होने से रक्षा करते हैं। (क्योंकि वे कैङ्कर्य में एकाग्रचित्त या स्थिर नहीं हैं, इसलवे अंततः कर्म का भी त्याग कर देंगे, जिसके कारण विनाश होता हैं) वे ये कर्म परहित के लिए ही करते हैं जैसे कि श्रीमद् भगवद्गीता ३.२३ “यदि ह्यहम् न वर्त्येयम् जातु कर्मण्यतन्धृत:। मम वर्तमानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।” (हे अर्जुन!यदि मैं सर्वेश्वर,कर्मों (अपने जन्म के कुल से संबंधित कर्मों) में दृढ़ता से संलग्न रहूँ और उनमें आलस्य रहित निरन्तर संलग्न रहूँ, तो सामान्य मनुष्य मेरे मार्ग का अनुसरण करेंगे) और श्री भगवद्गीता ३.२४ “उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा:प्रजा:।।”
(यदि मैं नियत कर्मों का पालन करना बंद कर दूँ तो ये लोग पतित हो जाएँगे और नष्ट हो जाएँगे। मैं संदूषण की तरह अराजकता उत्पन्न करने वाला बन जाऊँगा और इस प्रकार मानव जाति की शान्ति को नष्ट कर दूँगा, उनके पतन का कारण बन जाऊँगा।)
अडियेन अमिता रामानुजदासी
आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/26/acharya-hrudhayam-31-english/
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