अन्तिमोपाय निष्ठा – १८ – निष्कर्ष – आचार्य निष्ठा की महिमा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

<< अन्तिमोपाय निष्ठा – १७ – भागवतों की अहैतुक कृपा

पिछले लेख में, हमने भगवान (एम्पेरुमान्), अम्माजी (पिराट्टी), आऴ्वार् और आचार्यों के शब्दों के माध्यम से श्रीवैष्णवों की महिमा देखी। हमने सीता पिराट्टी और श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्) की उन लोगों के प्रति अहैतुक कृपा भी देखी जिन्होंने उन्हें संकट दिया था। अब हम इस दिव्य ग्रंथ का अन्तिम भाग देखेंगे।

इस प्रकार, जैसे कि “स्थावराण्यपि मुच्यन्ते” ( वैष्णव के स्पर्श से पौधे भी मुक्त हो जाते हैं ) और “पशुर् मनुष्य: पक्षी वा” ( पशु, मनुष्य और पक्षी – सभी वैष्णवों के साथ संबंध बनाने से मुक्त हो जाते हैं ) में कहा गया है, हमारे पूर्वाचार्यों ने अपने आचार्यों के प्रति समर्पित हुए, जिनका ध्यान पूरे संसार को उज्जीवित करने में केंद्रित था और जो अति दयालु थे। हमारे पूर्वाचार्य सर्वज्ञानी हैं, विद्वानों में सबसे आगे हैं, जो मूल और बाहरी सिद्धांतों में विभेदन कर सकते हैं, जिन्होंने अपनी सभी उत्तरदायित्व पूरी कर ली हैं (सदाचारियों की शरण लेकर) और सर्वथा मंगलाशासन (भगवान और भागवतों की भलाई के लिए प्रार्थना) पर ध्यान दिया है। जैसे कि नाच्चियार् तिरुमोळि में गोदाम्बा (आण्डाळ्) द्वारा कहा गया है “नानुम् पिऱन्तमै पॊय्यन्ऱे” (नाच्चियार् तिरुमोळि १०.४ – यदि भगवान आकर मुझे नहीं देखते हैं, तो विष्णुचित्त सूरी (पेरियाऴ्वार्) की पुत्री होने में मेरा कोई महत्त्व नहीं है) और “वल्लपरिसु वरुविप्परेल् अदु काण्डुमे” (नाच्चियार् तिरुमोळि १०.१० – यदि विष्णुचित्त सूरी भगवान को बुलाते हैं, तो मैं उनसे मिलूँगी), उन्होंने उन श्रीवैष्णवों की शरण में जाने का निष्कलंक मार्ग सीख लिया है जो सदैव भगवान का गुणगान करते हैं। तत्पश्चात, पूर्ण ज्ञान से बिना किसी संदेह के, वे ऐसे आचार्यों की पूजा/सेवा में, सबसे उपयुक्त उद्देश्य के रूप में, ध्यान केंद्रित करेंगे, और उन्हें लगता है कि वे बोझ से मुक्त हैं और गर्मी में ठंडी हवा में आराम कर रहे हैं। वे अंतिम लक्ष्य के बारे में चिंता से मुक्त हैं जैसे कि “सिट्र वेण्डा” में कहा गया है (तिरुवाय्मोऴि ९.१.७ – चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है) और गुरु परम्परा को पकड़कर उसी में स्थित रहे जैसे कि “देवु मट्रऱियेन् “ में कहा गया है (कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु २ – मैं श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) के अतिरिक्त किसी अन्य भगवान को नहीं जानता)। ऐसे अच्छे गुण इनमें देखे जा सकते हैं –

  • विष्णुचित्त सूरी की दिव्य पुत्री गोदाम्बा का अपने पिता/आचार्य के प्रति प्रेम
  • मधुरकवि आऴ्वार्, श्री शठकोप स्वामी के चरण कमलों में
  • नाथमुनि के चरण कमलों में कुरुगै कावलप्पन्
  • यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के चरण कमलों में दैववारियाण्डान्
  • रामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) के चरण कमलों में वडुग नम्बि
  • नम्पिळ्ळै के चरण कमलों में पिन्बऴगिय पेरुमाळ जीयर्
श्री नम्पिळ्ळै के श्री चरणों में पिन्बऴगिय पेरुमाळ जीयर् – श्रीरङ्गम्
  • वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै और पिळ्ळै लोकाचार्य के चरण कमलों में कूर कुलोत्तम दासर् :
  • तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै और मणपाक्कत्तु नम्बि के चरण कमलों में हमारे जीयर् (वरवरमुनि) :
श्री रामानुज (आऴ्वार् तिरुनगरी), तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै (कोन्तगै), वरवरमुनि (आऴ्वार् तिरुनगरी)

कृपया ध्यान दें कि ऐसे और भी कई महान आत्माएँ हैं जो हमारे पूर्वाचार्यों के प्रति समर्पित हैं।

हमारे जीयर् (वरवरमुनि) के चरण-कमलों में ऐसे कई श्रीवैष्णव हैं, जिनकी अपने आचार्य के प्रति निष्ठा अत्यंत महान है। आज भी (परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर् के समय में) हम ऐसे संबंधों को देख सकते हैं, जहाँ आचार्य और शिष्य — दोनों ही पूर्णतः योग्य हैं। भविष्य में भी, जब तक रामानुज सिद्धांत फलता-फूलता रहेगा — जैसा कि “कलियुम् कॆडुम् कण्डु कॊण्मिन्” (अर्थात् कलि के दुष्प्रभाव नष्ट हो जाएँगे) में कहा गया है — तब तक सदैव ऐसे योग्य व्यक्तित्व विद्यमान रहेंगे। ऐसे व्यक्तित्वों द्वारा यदि सहज भाव से भी कुछ शब्द कहे जाते हैं, तो वे अत्यंत मंगलकारी बन जाते हैं। उनके समस्त दिव्य वचन ‘तिरुमन्त्र’ के गूढ़ अर्थों को प्रकट करते हैं, जो कि संपूर्ण वेदांत का सार है।

वेद शास्त्ररुढा : ज्ञान कड्गतराद्विजा:।
क्रीडार्थमपि ब्रूयुस्स धर्म: परमो मत:।।

सरल अनुवाद – वैदिक शास्त्रों के सिद्धांतों में स्थित और उनके ज्ञान के प्रसार में निपुण ‘द्विज’ (दो बार जन्म लेने वाले) लोग, यदि विनोदवश भी कोई बात कह देते हैं, तो वह बात एक धर्मसम्मत और अत्यंत प्रतिष्ठित मत बन जाती है।

अधिगन्तव्यासंतो यद्यपि कुर्वन्ति नैकमुपदेशम्।
यास्तेषां स्वैरकतास्ता एव भवन्ति शास्त्रार्था:।।

सरल अनुवाद – केवल महापुरुषों की शिक्षाओं का ही नहीं, बल्कि उनके कार्यों का भी गहनता से अध्ययन किया जाना चाहिए। (इसका कारण यह है कि) उनका जो व्यक्तिगत अनुशासन है, वही वास्तव में शास्त्रों का सार है।

ज्ञान सारम् ४० –

अल्लि मलर् पावैक्कन्बर् अडिक्कन्बर्
सोल्लुम् अविडु सुरुतियाम्
नल्ल पड़ियाम् मनु नूर्कवर् सरिदै
पार्वै सेडियार् विनै तोगैक्कु ती

सरल अनुवाद – जो लोग श्री महालक्ष्मी के पति के चरण-कमलों से जुड़े हुए हैं, उनके वचन स्वयं वेदों के समान हैं; उनका जीवन मनुस्मृति का स्रोत है, और उनकी दृष्टि समस्त पापों को नाश करने वाली है।

तदुक्तिमात्रं मंत्रार्घ्यं

सरल अनुवाद – उसके द्वारा कहे गए शब्द ही सर्वश्रेष्ठ मंत्र हैं।

चूँकि ऐसे भक्त अपनी भूल से भी कोई व्यर्थ बात नहीं बोलते—यह बात सर्वविदित है—अतः उनके समस्त दिव्य वचनों में ‘तिरुमंत्र ‘ का ही अर्थ परिलक्षित होगा; और यह ‘तिरुमंत्र’ ही समस्त ‘वेदांत’ का सारतत्व है।

जैसे कि निम्नलिखित श्लोक में कहा गया है, तिरुमंत्र में सभी प्रमाणों के समस्त आवश्यक सिद्धांत और जानने योग्य समस्त विषय समाहित हैं।

ऋचो यजूंषि सामानि तथैवाथर्वाणानि च।
सर्वम् अष्टाक्षरान्तस्थं यच्चान्यद्यपि वाङ्मयम् ।।

सरल अनुवाद – ऋग, यजुर, साम, अथर्वण वेद, वेदांत, इतिहास, पुराण, स्मृति आदि के सभी अर्थ इस अष्टाक्षर महामंत्र में समाहित हैं।

यह महान तिरुमंत्र ३ शब्दों (पदों) के द्वारा ३ मुख्य सिद्धांत बताता है – (शेषत्व – सेवक होने का भाव), नमः (पारतंत्र्य – पूरी तरह निर्भरता) और नारायणाय (कैंकर्य – केवल भगवान के आनंद के लिए, अविच्छिन्न सेवा करना)।

ये सिद्धांत भगवान पर आंशिक रूप से, और भागवतों पर पूरी तरह से लागू हैं। इसीलिए, हमारे पूर्वाचार्यों ने इन प्रमुख सिद्धांतों के सार को समझते हुए, संस्कृत, द्रविड़ और मणिप्रवाल ग्रंथों में एक साथ (एकमत से) इनकी व्याख्या की है।

एक शिष्य को हमेशा ‘आचार्य अभिमान’ (आचार्य की कृपा/स्नेह) की सर्वोच्च निष्ठा में स्थित रहकर चिंतन करना चाहिए और अपने आचार्य को ही अपना स्वामी, आश्रय, आनंद का स्रोत और सभी प्रकार के संबंध का केंद्र मानना ​​चाहिए।

यामुनाचार्य का स्तोत्र रत्नम ५: माता पिता युवतय: – श्री शठकोप स्वामी हमारे लिए माता, पिता, पत्नी, पुत्र आदि हैं;
मधुरकवि आऴ्वार् के कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु 4: अन्नैयाय् अत्तनाय् -– श्री शठकोप स्वामी मेरे माता और पिता हैं ;
वरवरमुनि की आरत्ती प्रबंधं ३ – तन्दै नट्राय् तारम् तनयर् पॆरुञ्चॆल्वम् ऎन्तनक्कु नीये ऎतिरासा – हे यतिराज! मेरे प्यारे पिता! आप मेरे पिता, माता, पत्नी, धन, आदि हैं

जैसे कि निम्नलिखित उदाहरण में बताया गया है:

कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु १ – तॆन् कुरुगूर् नम्बि ऎन्ऱक्काल् अन्निक्कुम् अमुदूरुम् न् नावुकके – मधुरकवि आऴ्वार् – जैसे ही मैं श्री शठकोप स्वामी के दिव्य नामों का उच्चारण करता हूँ, मैं अपनी जिह्वा में अमृत का स्वाद लेता हूँ।

कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु २ – नाविनाल नविट्रु इन्बम् य्दिनेन् – श्री शठकोप स्वामी के नाम/प्रसिद्धि का उच्चारण करने में मुझे बहुत आनंद आता है।

रामानुज नूट्रन्दादि १०२ – न नाविरुंदु म्मैयन् इरामानुसन् ऎन्ऱु अऴैक्कुम् – मेरी जिह्वा लगातार मेरा आपसे अकारण दिव्य संबंध और आपके दिव्य नामों को पुकारेगी।

रामानुज नूट्रन्दादि १ – इरामानुसन् चरणारविन्दम् नाम्मन्नि वाऴ नेञ्जे सॊल्लुवोम् अवन् नामङ्गळे – प्रिय हृदय! आइए हम श्रीरामानुज के कई दिव्य नामों का जप करें ताकि हम ऐसा जीवन जी सकें जो पूरी तरह से श्रीरामानुज के चरणों में समर्पित हो ।

नूट्रन्दादि तनियन् – उन् नाममेल्लाम् ऎन्ऱन् नाविणुल्ले अल्लुम् पगलुम् अमरुम्पडि नल्गु अरुसमय वॆल्लुम् परम इरामानुसा – हे रामानुज, जिन्होंने छह दार्शनिक व्यवस्थाओं को जीतकर वेदान्त सिद्धांत स्थापित किया! आप यह सुनिश्चित करते हैं कि आपके दिव्य नाम हमेशा मेरी जिह्वा पर रहें।

गुरोर् वार्थाश्च कथयेत् – गुरोर् नाम सदा जपेत् – हमेशा आचार्य के वचनों/निर्देशों पर चर्चा करें, हमेशा आचार्य के नामों का जाप करें।

सच्चे आचार्य के साथ ऐसे संबंध में, शिष्य का मनोभाव ऐसा होना चाहिए –

  • आचार्य के प्रति प्रथम समर्पण का निरंतर ध्यान करना चाहिए और उस “नम:” को मंत्र के रूप में रखना चाहिए (अनुवादक टिपण्णी – स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य कहते हैं – जप्तव्यं गुरुपरम्परैयुम् द्वयमुम् – यहाँ अस्मद् गुरुभ्यो नमः…श्रीधराय नमः को द्वय महा मंत्र पाठ करने से पूर्व पाठ किया जानेवाला प्रथम मंत्र माना जाता है।)
  • आचार्य को स्वयं परमेश्वर मानना ​​चाहिए, जैसे कि इस प्रकार बताया गया है-
  • गुरुरेव परम ब्रह्म – गुरु सर्वोच्च भगवान है |
  • ज्ञान सारम् ३८ – तॆनार् कमल तिरुमामगळ् कॊऴुनन् ताने गुरुवागी – श्री महालक्ष्मी के पति स्वयं आचार्य बन जाते हैं।

आचार्य के निवास को ही परम धाम मानना ​​चाहिए – जैसे कि इस प्रकार बताया गया है :

  • येनैव गुरुणा यस्य न्यासविद्या प्रदीयते ।
    तस्य वैकुण्ठदुग्धाब्धिद्वारकाः सर्व एव सः ॥

    जहाँ भी वह आचार्य रहते हैं, जिसने शरणागति का ज्ञान प्रदान किया है, शिष्य के लिए वह स्थान ही श्रीवैकुंठम, क्षीरब्धि और भगवान के अन्य सभी दिव्य निवास हैं।
  • ज्ञान सारम ३६ – विल्लार् मणि कॊळिक्कुम् वेङ्कट पॊर्कुन्ऱु मुदल् सॊल्लार् पॊऴिल् सूऴ् तिरुप्पदिगळ् ऎल्लाम् मरुळाम् इरुळोड मत्तगत्तु तन ताळ् अरुळाले वैत्त अवर् – एक सच्चे शिष्य के लिए, भगवान के सभी निवास स्थान, तिरुमला तिरुपति (तिरुवेंकटम्) से आरंभ होकर (और परमपद, क्षीरब्धि, आदि भी) उनके अपने आचार्य में देखे जा सकते हैं, जिन्होंने अपनी अकारण दया से शिष्य का अज्ञान दूर किया।
  • कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु ११ – नम्बुवार् पति वैकुन्दम् काण्मिने – जो मधुरकवि आऴ्वार् के दिव्य शब्दों में विश्वास करते हैं, वे जहाँ भी रहते हैं वह स्थान वैकुण्ठ बन जाता है।

आचार्य के चरण कमलों को साधन और साध्य मानना ​​चाहिए, जैसे कि नीचे बताया गया है-

  • कूरेश स्वामी (कूरत्ताऴ्वान्) का श्लोक, श्रीरामानुज की महिमा बताती है – “योनित्यम् … रामानुजस्य चरणौ शरणं प्रपध्ये “ – हमेशा श्रीरामानुज के चरण कमलों को ही अपना एकमात्र आश्रय मानो।
  • रामानुज नूट्रन्दादि ४५ – पेऱोन्ऱु मट्रिल्लै निन् चरणन्ऱि अप्पेऱळित्तर्क्कु आरोन्ऱुम् इल्लै मट्र चरणन्ऱि – अमुदनार् श्रीरामानुज (एम्पेरुमानार्) के प्रति ऐसे कहते हैं – मेरे जीवन का लक्ष्य आपके चरण कमलों की सेवा करना है और उसे पूरा करने के लिए आपके चरण कमल ही एकमात्र मार्ग हैं।
  • उपाय उपेय भावेन तमेव शरणं व्रजेत् – आचार्य के चरण कमलों के प्रति, उपाय/मार्ग और उपेय/लक्ष्य के रूप में समर्पण करो।

मन, वाणी और हाथों से आचार्य के चरण कमलों की सेवा को ही अपना परम लक्ष्य मानना ​​चाहिए, जैसा कि नीचे कहा गया है:

  • सुन्दरबाहुस्तवं १२९ – रामानुजार्य वचक: परिवर्तिशीय – कूरेश स्वामी ने सुंदरबाहु एम्पेरुमान से श्रीरंगम में अपने आचार्य की सेवा करने के लिए उन्हें उनके आचार्य से फिर से मिलाने का अनुरोध किया।
  • यतिराज विंशति ४ –
    नित्यं यतीन्द्र तव दिव्यवपुः स्मृतौ मे सक्तं मनो भवतु वाग्गुणकीर्तनेऽसौ ।
    कृत्यं च दास्यकरणेतु करद्वयस्य वृत्त्यन्तरेऽस्तु विमुखं करणत्रयं च ॥ ४ ॥

    वरवरमुनि श्री रामानुज से कहते हैं – हे यतिन्द्र! मेरा मन आपके सुन्दर रूप पर स्थिर रहे; मेरा मुँह आपका नाम और महिमा गाए; मेरे हाथ आपकी सेवा करें; ये किसी और विषय के बारे में न सोचें।
  • श्री वचन भूषण २९९ शक्तिक्किलक्कु आचार्य कैङ्कर्यम् – शिष्यों की क्षमताएँ आचार्य की सेवा करने पर केंद्रित/ प्रयुक्त होनी चाहिए।

शिष्य का कैंकर्य देखकर आचार्य के मुख पर जो प्रसन्नता आती है, उसे ही सबसे बड़ा परिणाम मानना ​​चाहिए, जैसा कि नीचे कहा गया है:

  • श्री वचन भूषण ३२१ – शिष्यन् एन्बदु साध्यान्तर निवृत्तियुम् फल साधन सुश्रूषैयुम् – सच्चे शिष्य का मतलब है वह जो केवल आचार्य को ही अंतिम लक्ष्य मानता है और उन्हें हमेशा खुश करने के लिए उनकी सेवा करता है।

ऐसे अधिकारी (योग्य शिष्य) जो पूरी तरह से आचार्य निष्ठा में स्थित हैं, वे सभी कामुक सुखों और भौतिक इच्छाओं को छोड़ सकते हैं। वे आचार्य के दिव्य शुभ रूप का आनंद ले सकते हैं जैसे कि “सदा पश्यंती ” में कहा गया है (परमपद में जीवात्मा लगातार भगवान के दर्शन करके आनंदित रहते हैं)। इसके अतिरिक्त , वे इस दुनिया और परमपदधाम (जो अंतहीन आनंद का निवास है) दोनों में समान विचारधारा वाले भक्तों के साथ अपने आचार्य की सेवा कर सकते हैं जैसे कि “अत्र परत्र चापि” ( स्तोत्र रत्नं २ ) में कहा गया है और अमृतमय आनंद के सागर में निमग्न हुए निरंतर मंगलाशासन कर सकते हैं।

नाथमुनि – यामुनाचार्य, काट्टू मन्नार् कोइल (अवतार स्थल)

हम निम्नलिखित दिव्य श्रीसूक्तियों को अंतिमोपाय (आचार्य) निष्ठा के प्रमाण के रूप में हमेशा याद रख सकते हैं :-

  • रामानुज नूट्रन्दादि १०४ – कैय्यिल् कनियॆन्न कण्णनै काट्टि तरिलुम् उन्दन् मॆय्यिल् पिरङ्गिय सीरन्ऱि वेण्डिलन् यान् – अगर आप मुझे कृष्ण (जो अपनी सुंदरता और भक्तों के लिए सुलभ होने के लिए जाने जाते हैं) के दर्शन भी करा दें, तो भी मैं केवल आपके दिव्य रूप और गुणों पर ही ध्यान केंद्रित करूंगा और किसी और वस्तु की आवश्यकता नहीं होगी।
  • कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु २ – नाविनाल् नविट्रु इन्बम् एय्दिनेन् – मैं श्री शठकोप स्वामी की महिमा बोलते ही आनंदित हो गया।
  • नाच्चियार् तिरुमॊळि १०.१० – नल्लवेन् तोऴि…विट्टुचित्तर् तङ्गळ् देवरै वल्लपरिसु वरुविप्परेल् अदु काण्डुमे – गोदाम्बा कहती हैं – ” अगर विष्णुचित्त सूरी कृष्ण को आमंत्रित करते हैं और उन्हें किसी तरह आने के लिए कहते हैं, तो मैं उस समय उनसे मिलूँगी। “
  • परमाचार्य यामुनाचार्य ने इस सिद्धांत को “माता पिता युवतय:” श्लोक में श्री शठकोप स्वामी के प्रति समझाया है। उन्होंने स्थापित किया कि श्री शठकोप स्वामी वैष्णव कुलपति (वैष्णवों के नेता) हैं और श्री शठकोप स्वामी ही उनके लिए सब कुछ हैं ।
  • पशुर् मनुष्य पक्षी वा – पशु, मनुष्य या पक्षी – चाहे किसी भी जन्म का हो (चाहे वह शास्त्र के द्वारा ज्ञान पाने के लायक हो या नहीं ), एक वैष्णव से संपर्क होने पर उसे आसानी से परमपद मिल जाता है।
  • बाल मूक जठ अंताश्च – बालक, बहरे, गूंगे, अंधे, लंगड़े आदि जब सच्चे आचार्य की शरण लेते हैं, तो वे निश्चित रूप से परमपद की अंतिम लक्ष्य तक पहुँचेंगे ।
  • आचारस्य प्रसादेन मम सर्वमभीप्सितम्; प्राप्नुयामीति विश्वासो यस्यास्ति स सुखी भवेत्। – जिसे यह विश्वास है कि वह अपने आचार्य की कृपा से अपनी सभी इच्छाएँ प्राप्त कर लेगा, वह सुखी रहेगा।
  • माणिक्कमालै में पेरियवाच्चान् पिळ्ळै के दिव्य शब्द – इहलोकपरलोकङ्गळ् इरन्डुम् आचार्यन् तिरुवडिगळे ऎन्ऱुम् ; दृष्टादृष्टङ्गळ् इरन्डुम् अवने ऎन्ऱुम् विष्वसित्तिरुक्किरदुक्कू मेलिल्लै – इस लोक और परमपद की हर वास्तु को आचार्य के चरण कमल मानना ​​और देखी तथा अनदेखी हितों को स्वयं आचार्य मानना, इससे बढ़कर कुछ नहीं है।
  • श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र ३२२ में पिळ्ळै लोकाचार्य की दिव्य श्रीसूक्ति – मन्त्रमुम् , देवदैयुम्, फलमुम् , फलानुबंधीगलुम् , फालसाधनमुम् , ऐहिकभोगमुम् एल्लाम् आचार्यने ऎन्ऱु निनैक्क कडवन् – शिष्य अपने आचार्य को ही नीचे दिए गए सभी रूप में मानना चाहिए : –
  • मंत्र – जो वह पढ़ता है और जो उसे संसार के दुख से छुटकारा दिलाता है
  • पर देवता – भगवान – जो उस मंत्र का लक्ष्य है
  • फल – कैंकर्य रूप परिणाम जो भगवान का आशीर्वाद है
  • फलानुबंधी – सहायक लाभ जैसे पूर्ण आत्म-साक्षात्कार और परमपद में रहना, आदि
  • फलसाधन – वह माध्यम जिससे लाभ पूरे होते हैं
  • ऐहिकभोगम् – कोई भी अन्य कामुक सुख जिसकी कोई, परमपद जाने से पहले, इस दुनिया में कामना करता है
पिळ्ळै लोकाचार्य, मामुनिगळ्, परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर्

श्री सौम्यजामातृमुने: प्रसादभाव साक्षात्कृत सर्वतत्वं ।
अज्ञानतामिश्र सहस्रभानुं श्री भट्टनातं मुनीमाश्रयामि ।।

सरल अनुवाद – मैं श्रीभट्टनाथ मुनि की शरण लेता हूँ, जिन्होंने श्रीसौम्यजामातृ मुनि की कृपा से सत्य को यथार्त रूप से देखा जैसे वे हैं और जो सहस्र किरणों वाले सूर्य हैं जो अज्ञान के अंधेरे को दूर करते हैं।

इस प्रकार परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर् के अन्तिमोपाय निष्ठा का अनुवाद समाप्त होता है।

अनुवादक’ के टिपण्णी –

इस प्रकार हमने इस आखिरी भाग में आचार्य निष्ठा की पूरी महिमा देखी है।
कुछ संस्कृत प्रमाणों का अनुवाद देने के लिए श्री रंगनाथ स्वामी का धन्यवाद।

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

आधार – https://granthams.koyil.org/2013/07/21/anthimopaya-nishtai-18-conclusion-glories-of-acharya-nishtai/

पूरी शृंखला यहां देखी जा सकती है: – https://granthams.koyil.org/anthimopaya-nishtai-hindi/

संग्रहीत – https://granthams.koyil.org/ ; इसे भी देखें – https://acharyas.koyil.org.

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