श्री रामायण तनि श्लोकम् – ७ – बाल काण्ड २०.२ – ऊनषोडशवर्ष: – भाग २

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ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:।
न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:।। १.२०.२ ।।

राजा दशरथ कहते हैं— “मेरे कमलनयन श्रीराम सोलह वर्ष से कम आयु के हैं। मैं उसमें राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता नहीं देखता।” 

पिछले लेख में निम्नलिखित विषयों का निरूपण किया गया था—

  • उन प्रमाणों का विवेचन किया गया जिनमें सीता अम्माजी के साथ विवाह के समय श्रीराम की आयु का वर्णन है।
  • “ऊनषोडशवर्ष”, “दश सप्त च”, “पञ्चविंशक” आदि प्रमाणों में जो आयु-संबंधी विरोधाभास प्रतीत होते हैं, उनका समाधान किया गया।
  • पेरियवाच्चान् पिळ्ळै के विश्लेषण और यथार्थ व्याख्या के आधार पर यह सिद्ध किया गया कि विवाह के समय श्रीराम की आयु १२ वर्ष थी तथा वनगमन के समय उनकी आयु २४ वर्ष थी।
  • श्रीराम की वास्तविक आयु १२ वर्ष होने पर भी उन्हें “ऊनषोडशवर्ष” (सोलह वर्ष से कम आयु वाला) कहने के पीछे राजा दशरथ की मंशा को समझाया गया। इसका उद्देश्य यह बताना था कि सोलह वर्ष से कम आयु का व्यक्ति अभी स्वतंत्र रूप से उत्तरदायित्व ग्रहण करने योग्य नहीं माना जाता। विभिन्न प्रमाणों द्वारा यह भी दर्शाया गया कि इस आयु से पूर्व व्यक्ति को किसी न किसी अभिभावक के संरक्षण में ही माना जाता है।

पेरियवाच्चान् पिळ्ळै (कृष्णपाद आचार्य) की व्याख्या से 

ऊनषोडशवर्षः — अर्थात सोलह वर्ष से कम आयु।

जब श्रीराम महर्षि विश्वामित्र के साथ वन में गए, तब वे इतनी कोमल अवस्था में थे मानो अभी दूध पीने वाले बालक हों। इसे निम्न प्रमाणों से स्पष्ट किया गया है—

बालरामायण — “कृतं तत् क्षीरकण्ठेन” — (जिसके कण्ठ में अभी भी दूध है।)

अनर्घराघवम् (1) — “क्षीरकण्ठश्च रामभद्रः” — (श्रीरामभद्र अभी भी कण्ठ में दूध रखने वाले बालक हैं।)

ऊनषोडशवर्षः — श्रीराम इतने अल्पवयस्क थे कि बाल्यावस्था के लक्षण भी स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं हुए थे। यहाँ तक कि उनके केश भी इतने बड़े नहीं हुए थे कि उन्हें बाँधा जा सके।

श्रीरामायण, बालकाण्ड १९.९ — “काकपक्षधरं वीरम्” — (कौए के पंख के समान छोटे केश धारण करने वाला वीर।)

रघुवंशम् ११.१ — “तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते” — (तेजस्वी (पराक्रमी या गुणवान) पुरुषों की आयु या अवस्था नहीं देखी जाती।)

पेरियाऴ्वार् तिरुमोऴि १.४.८ — “सिऱियन् ऎन्ऱु ऎन् इळम् सिङ्गत्तै इगऴेल् कण्डाय्” — (मेरे पुत्र को छोटा बालक समझकर उस युवा सिंह का तिरस्कार मत करो — ऐसा माता यशोदा कहती हैं।)

ऐसे, राजा दशरथ कहते हैं कि श्रीराम एक छोटे बालक हैं, अतः उनमें राक्षसों से युद्ध करने के लिए आवश्यक साहस नहीं है।

महर्षि विश्वामित्र उत्तर देते हैं कि जैसे एक छोटी-सी चिंगारी भी अग्नि उत्पन्न करने में समर्थ होती है, वैसे ही श्रीराम की सामर्थ्य उनकी बालसुलभ अवस्था के कारण अप्रकट है। 

श्रीरामायण, बालकाण्ड १९.९ — “शक्तो ह्येष मया गुप्तो दिव्येन स्वेन तेजसा।” — (यह अपने स्वाभाविक दिव्य तेज को प्रकट किए बिना, अपने अवतार के अनुरूप एक छोटे बालक के रूप में दिखाई दे रहे हैं।)

महर्षि विश्वामित्र कहते हैं कि वे स्नेहपूर्वक श्रीराम को उनके स्वाभाविक महात्म्य का बोध करा सकते हैं; तब वे राक्षसों से युद्ध करने के लिए आवश्यक सभी कौशलों से युक्त हो जाएँगे।

मे रामः — मेरे श्रीराम।

  • राजा दशरथ कहते हैं— “यह मत समझो कि ये परशुराम हैं, जिन्होंने अपने परशु से इक्कीस पीढ़ियों के राजाओं का वध करके उन्हें दण्डित किया था। ये मेरे श्रीराम हैं।”
  • अपने पुत्र के प्रति ममता के कारण राजा दशरथ उन्हें “मेरे श्रीराम” कहकर संबोधित करते हैं।
  • राजा दशरथ कहते हैं कि अत्यन्त परिश्रम और दीर्घकालीन प्रतीक्षा के पश्चात् साठ हजार वर्षों में प्राप्त हुए श्रीराम के दर्शन से मिलने वाले आनन्द को उनसे छीन लेना उचित नहीं है। यह उसी प्रकार है जैसे कोई व्यक्ति भोजन करने ही वाला हो और अत्यन्त भूखे व्यक्ति का हाथ पकड़कर उसे भोजन करने से रोक दिया जाए।
    • श्रीरामायण, बालकाण्ड २०.११ — “षष्टि वर्षसहस्राणि जातस्य मम कौशिक। दुःखेनोत्पादितश्चायं न रामं नेतुमर्हसि॥” — (यह पुत्र मुझे अत्यन्त कष्ट और कठिनाई के उपरान्त प्राप्त हुआ है।)
    • तिरुविरुत्तम् ३७ — “नॆडुङ्गालमुम् कण्णन् नीळ् मलर्प् पादम् परविप् पॆट्र” — (माता अपनी पुत्री के विषय में कहती है— भगवान् के कमल-समान चरणों की दीर्घकाल तक स्तुति और प्रार्थना करने के फलस्वरूप, उनकी कृपा से मुझे यह पुत्री प्राप्त हुई।)

मे रामः

“अनुपहतां वृत्तिं चरेत्” — (मनुष्य को केवल उसी आजीविका का पालन करना चाहिए जो शास्त्रों द्वारा अनुमोदित हो।) ऋषियों के लिए यह विहित नहीं है कि वे ऐसी वस्तु को स्वीकार करें जो उन्हें स्वामित्व अथवा ममताभाव से दी गई हो। अतः महर्षि विश्वामित्र “मे रामः” (मेरे श्रीराम) इस प्रकार ममताभाव से संबोधित किए गए श्रीराम को स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि वे उन्हें “मेरे पुत्र” के स्वामित्व-भाव के साथ अर्पित किए जा रहे हैं।

रामः

राजा दशरथ कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य आस्वादन के लिए है। श्रीराम का दर्शन किए बिना तथा उनके सौन्दर्य का आनन्द लिए बिना उन्हें युद्धभूमि में भेज देना उसी प्रकार है जैसे किसी सुन्दर पुष्पमाला को धारण किए बिना ही मसलकर धूप में रख दिया जाए। इसी प्रकार के कथन निम्नलिखित प्रमाणों में भी प्राप्त होते हैं —

छान्दोग्य उपनिषद् ३.१० — “एतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति” — (मुक्तात्माएँ और नित्यसूरि भगवान् रूपी अमृत का निरन्तर दर्शन करके ही सन्तुष्ट होते हैं।)

श्रीरामायण, अयोध्याकाण्ड १३.१०४ — “नन्दामि पश्यन्नपि दर्शनेन” — (अपने अन्तःचक्षुओं से श्रीराम का दर्शन करने पर मुझे अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता है; और बाह्य नेत्रों से उनका दर्शन करने पर मैं स्वयं को पुनः युवा अनुभव करता हूँ।)

महर्षि विश्वामित्र कहते हैं— “श्रीराम अपने सौन्दर्य से सभी को जीत सकते हैं; अतः उन्हें असुरों से युद्ध करने के लिए साथ ले जाने में कोई हानि नहीं है। वे अपने सौन्दर्य से ही शत्रुओं को पीछे हटने के लिए विवश कर देंगे। युद्ध करते समय उनके घुँघराले केशों में धारण किए हुए पुष्प भी नहीं मुरझाएँगे। उनके मुख पर पसीना का एक बूँद भी नहीं आएगा।” इस प्रकार के उल्लेख युद्धकाण्ड तथा सुन्दरकाण्ड में भी प्राप्त होते हैं।

श्रीरामायण, युद्धकाण्ड १०६.६ — “रञ्जनीयस्य विक्रमैः” — (उनका पराक्रम शत्रुओं को भी आनन्द प्रदान करता है।)

श्रीरामायण, सुन्दरकाण्ड ३०.४१ — “रामम् अक्लिष्टकर्माणम्” — (जो महान् से महान् कार्यों को भी बिना किसी क्लेश के सम्पन्न कर देते हैं।)

राजीवलोचनः — अर्थात् कमल के समान नेत्रों वाले।

  • राजा दशरथ और महर्षि विश्वामित्र दोनों ही श्रीराम के कमल-समान नेत्रों से आकृष्ट हैं। राजा दशरथ उन्हें पितृस्नेह की दृष्टि से देखते हैं, जबकि महर्षि विश्वामित्र उन्हें सर्वशक्तिमान के रूप में देखते हैं। उनके बीच का निम्नलिखित संवाद इन दोनों दृष्टिकोणों को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।
  • राजा दशरथ कहते हैं— “श्रीराम के कमल-समान नेत्र सूर्य के दर्शन मात्र से ही खिल उठते हैं। अतः युद्ध करते समय दीर्घकाल तक सूर्य के ताप में रहने से उनके इन कमल-नेत्रों को कष्ट होगा।”
  • महर्षि विश्वामित्र कहते हैं— “जिस प्रकार कमल सूर्य को देखकर प्रसन्न होकर खिल उठता है, उसी प्रकार युद्धभूमि में शत्रुओं का दर्शन श्रीराम को केवल प्रसन्न ही करेगा।”
  • राजा दशरथ आगे कहते हैं— “उनके नेत्र कमल के समान अत्यन्त कोमल हैं; इसलिए सूर्य के सम्पर्क में आने पर वे लाल हो जाते हैं।”  “राजीवं रक्तपद्मं स्यात्” — (सूर्य के सम्पर्क में आने पर उनके नेत्र रक्तवर्ण हो जाएँगे।)
  • महर्षि विश्वामित्र उत्तर देते हैं— “उनके नेत्र युद्धभूमि में केवल क्रोध के कारण लाल होते हैं।” सन्दर्भ — श्रीरामायण, युद्धकाण्ड २१.१३ — “समुद्रस्य ततः क्रुद्धो रामो रक्तान्तलोचनः ।” — (श्रीराम के नेत्र लाल हो गए।) हनुमन्नाटकम् १२.२ — “किञ्चिद् भ्रूभङ्गलीलानियमितजलधिम्” — (जिसने अपनी भौंहों को थोड़ा सा सिकोड़ने की लीला मात्र से (यानी खेल-खेल में ही) पूरे अथाह समुद्र को मर्यादा में बांध दिया था/नियंत्रित कर लिया था)
  • राजा दशरथ महर्षि विश्वामित्र की बात स्वीकार नहीं करते और संवाद आगे चलता है।
  • राजा दशरथ कहते हैं— “श्रीराम अभी बहुत छोटे हैं; अतः उनके नेत्र सूर्य के सम्पर्क के कारण ही लाल होते हैं, क्रोध के कारण नहीं।”
  • उपर्युक्त तर्कों से राजा दशरथ को संतुष्ट न कर पाने पर महर्षि विश्वामित्र कहते हैं— “युद्ध रात्रि में कराया जा सकता है; तब सूर्य श्रीराम को कष्ट नहीं देगा।”
  • महर्षि विश्वामित्र से मतभेद देखते हुए राजा दशरथ आगे कहते हैं— “ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः।” (असुर रात्रिचर हैं; वे रात्रि में अपनी शक्ति और पराक्रम का प्रयोग करेंगे तथा श्रीराम को हानि पहुँचा सकते हैं। श्रीराम अभी छोटे बालक हैं; वे रात्रि में युद्ध नहीं कर सकते। वे कमल-नेत्र वाले हैं। जैसे कमल रात्रि में बन्द हो जाता है, वैसे ही श्रीराम रात्रि में जागकर युद्ध नहीं कर सकते।) तिरुप्पावै २२ — “किङ्किणि वाय्च्चेय्द तामरैप्पूप् पोले सेङ्गण् सिरुचिरिदे एम्मेल् विऴियावो” — (किङ्किणि (एक छोटी घंटिका/घुंघरू) के छोटे से छिद्र के समान अपने कमल-सदृश अरुण नेत्रों को थोड़ा-थोड़ा खोलकर हम पर कृपादृष्टि कीजिए।)
  • राजा दशरथ आगे श्रीराम के कमल-नेत्रों की शोभा का और अधिक वर्णन करते हुए कहते हैं — “श्रीराम के नेत्र इतने सुन्दर हैं कि उनका लक्ष्य युद्धभूमि नहीं, बल्कि हम होने चाहिए। जैसे जल से बाहर निकालने पर कमल मुरझा जाता है, वैसे ही मेरे समीप रहते हुए जो श्रीराम प्रसन्न और तेजस्वी हैं, वे मुझसे दूर ले जाए जाने पर अपनी कान्ति खो देंगे।”
  • महर्षि विश्वामित्र कहते हैं— “इन कमल-नेत्रों में शत्रुओं को पराजित करने की शक्ति है।”
    • जितन्ते स्तोत्रम् १.१ — “जितन्ते पुण्डरीकाक्ष” — (हे कमलनयन/ पुण्डरीकाक्ष ! आपकी विजय हो।)
    • तिरुवाय्मोऴि १०.३.१ — “तामरैक्कण्गळ् कोण्डु ईर्दियालो!” —  (संस्कृत – तामरसनयनाभ्यां बाधसे हा ! दया नास्ति दयाशून्यस्त्वं कृष्ण ! ॥) (अपने कमल के समान नेत्र से देखकर हाय! मुझे पीड़ा पहुँचा रहे हैं; हे कृष्ण आप निर्दयी हो, आप में दया नहीं है ।।)
  • राजा दशरथ किसी प्रकार भी संतुष्ट नहीं हो पाते और आगे कहते हैं— “न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि।” — (मैं इसे इस युद्ध के योग्य नहीं देखता।) वे कहते हैं— “ये सब बातें उसके हितचिन्तकों के सम्बन्ध में सत्य हो सकती हैं। किन्तु असुर उसके उन कमल-समान नेत्रों से मोहित हों, यह आवश्यक नहीं है। अतः मैं उसे असुरों से युद्ध करने के योग्य नहीं देखता।”
  • महर्षि विश्वामित्र इसके उत्तर में शूर्पणखा का उदाहरण देते हैं, जो श्रीराम के नेत्रों से मोहित हो गई थी। शूर्पणखा, यद्यपि असुरकुल से सम्बन्ध रखती थी, फिर भी उसने श्रीराम का वर्णन “पुण्डरीकविशालाक्षैः” — (विशाल कमल-समान नेत्रों वाले) — इस प्रकार किया है। वे कहते हैं— “श्रीराम न केवल अपने कमल-समान नेत्रों से असुरों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि मैं उन्हें असुरों से युद्ध करने के लिए दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्रदान कर सकता हूँ।”
  • राजा दशरथ कहते हैं— “अस्य युद्धयोग्यतां न पश्यामि।” — (जो यहाँ उपस्थित है, उसे मैं युद्ध के योग्य नहीं देखता।) अस्य — अर्थात् यह श्रीराम, जो अभी बालक हैं और अत्यन्त कोमल हैं। “उनकी इस अल्पायु में, जब वे बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्रों का भार वहन करने में भी समर्थ नहीं हैं, तब उन्हें युद्ध में कैसे सम्मिलित किया जा सकता है?” अस्य — अर्थात् यह श्रीराम, जो मेरे समीप, मेरे ठीक पास खड़े हैं। “वे यहीं उपस्थित हैं; अतः आप स्वयं इन्हें देखकर वास्तविक स्थिति का विचार कीजिए।”
  • राजा दशरथ आगे कहते हैं— “उन्हें युद्ध में ले जाने के स्थान पर आप उन्हें प्रेमपूर्वक अपनी गोद में बिठाइए और उनके ललाट का स्नेहपूर्वक घ्राण करके अपना वात्सल्य प्रकट कीजिए।” श्रीरामायण, बालकाण्ड २२.३ — “स्वपुत्रं मूर्ध्न्युपाघ्राय” — (अपने पुत्र के मस्तक का स्नेहपूर्वक घ्राण करना (सूँघना)।) यह बाल्यावस्था युद्ध में प्रवृत्त होने की अपेक्षा क्रीड़ा के लिए अधिक उपयुक्त है। श्रीमद्भागवतम् ३.२.३० — “बालः क्रीडनकानिव” — (बालक के खिलौने के समान।) महाभारतम्, सभापर्व ४०.७८ — “बालः क्रीडनकैरिव” — (जैसे कोई बालक अपने खिलौनों के साथ खेलता है।)
  • राजा दशरथ आगे जोड़ते हैं— “इस समय आपका मन अपने यज्ञ को पूर्ण करने के उद्देश्य में लगा हुआ है। उसी लक्ष्य की प्रमुखता के कारण आप मेरी स्थिति को नहीं देख पा रहे हैं।” इसी प्रकार का सन्दर्भ यामानुचार्य (आळवन्दार्) कृत आगमप्रामाण्यम् की भूमिका में भी प्राप्त होता है— “अभिनिवेशवशीकृतचेतसां बहुविधामपि सम्भवति भ्रमः।” — (किसी एक विषय में अत्यधिक आसक्ति अथवा अनुराग होने पर, महान् पुरुषों के मन में भी अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न हो सकते हैं।)
  • महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के वचनों से सन्तुष्ट नहीं होते और आगे कहते हैं— “आपका यह कथन कि श्रीराम युद्ध के योग्य नहीं हैं, सत्य नहीं है। श्रीराम और लक्ष्मण के अनेक युद्धों में सम्मिलित होने के उदाहरण उपलब्ध हैं।” श्रीरामायण, अयोध्याकाण्ड २.३६ — “यदा व्रजति संग्रामं ग्रामार्थे नगरस्य वा । गत्वा सौमित्रिसहितो नाविजित्य निवर्तते॥” — (यदि किसी ग्राम अथवा नगर की रक्षा के लिए युद्ध में जाना पड़े, तो श्रीराम लक्ष्मण के साथ जाकर शत्रुओं को पराजित किए बिना कभी वापस नहीं लौटते।) श्रीरामायण, अयोध्याकाण्ड 2.37 — “संग्रामात् पुनरागम्य” — (युद्धभूमि से पुनः लौटकर।)
  • राजा दशरथ महर्षि विश्वामित्र को शान्त करने का प्रयास करते हुए कहते हैं— “आपके द्वारा दिए गए सभी उदाहरण सत्य हैं; किन्तु उन युद्धों में असुरों के साथ युद्ध नहीं हुआ था। मेरा यह कहना नहीं है कि श्रीराम युद्ध कर ही नहीं सकते; मेरा अभिप्राय केवल इतना है कि इस अल्पायु में वे असुरों से युद्ध नहीं कर सकते।” “राक्षसैः” — अर्थात् राक्षसों के साथ। “कूटयुद्धा हि राक्षसाः।” — (राक्षस धर्मसम्मत रीति से युद्ध नहीं करते।) श्रीराम सदैव धर्मानुकूल युद्ध ही करते हैं; किन्तु असुर माया का प्रयोग कर सकते हैं, अथवा छिपकर आक्रमण करके अधार्मिक रीति से युद्ध कर सकते हैं। ऐसे शत्रुओं के साथ श्रीराम का युद्ध करना उचित नहीं होगा। अतः मैं श्रीराम को आपके साथ भेजने में समर्थ नहीं हूँ।

अस्य राक्षसैः

  • अस्य — अर्थात् श्रीराम, राक्षसैः — अर्थात् असुरों के साथ।
  • अस्य — यह एकवचन का प्रयोग है, जिससे अभिप्राय है कि श्रीराम अकेले हैं।
  • राक्षसैः — यह बहुवचन का प्रयोग है, जिससे सूचित होता है कि असुर अनेक हैं।
  • राजा दशरथ कहते हैं कि एक ओर अकेले श्रीराम मानव रूप में हैं और दूसरी ओर सम्पूर्ण असुर-समुदाय है। इस कारण से भी श्रीराम का उनके साथ युद्ध में प्रवृत्त होना उचित नहीं है।

यहीं पर राजा दशरथ और महर्षि विश्वामित्र के मध्य होने वाले इस संवाद का समापन होता है।

अगले श्लोक का व्याख्यान अगले लेख में प्रस्तुत किया जाएगा।

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास।
अडियेन रमा श्रीनिवास रामानुज दासी।

आधार –  https://granthams.koyil.org/2025/07/14/sri-ramayana-thani-slokam-7-english/ 

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