श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः

ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:।
न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:।।
श्री कृष्णपाद आचार्य (पेरियवाच्चान् पिळ्ळै) ने, जो शरणागति-शास्त्र माना जाता है अर्थात श्रीरामायणम् के अनेक महत्त्वपूर्ण श्लोकों पर अत्यन्त गम्भीर और विस्तृत व्याख्यान लिखा है। इस श्रृंखला में अब तक बालकाण्ड के १९.१४वें श्लोक तक की व्याख्या समझाई जा चुकी है। वर्तमान श्लोक का एक विशेष महत्त्व यह है कि इसमें श्रीराम की उस आयु का विश्लेषण किया गया है जब वे विश्वामित्र मुनि के साथ वन गए थे।
राजा दशरथ, विश्वामित्र मुनि, वसिष्ठ भगवन् तथा अन्य ऋषियों के उपदेश सुनने के उपरांत भी श्रीराम की राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता के विषय में आश्वस्त नहीं हो पाते। पुत्र के प्रति अत्यधिक स्नेह के कारण उनके मन में श्रीराम को वन भेजने की इच्छा उत्पन्न नहीं होती। उसी समय राजा दशरथ यह श्लोक विश्वामित्र मुनि से कहते हैं।
प्रतिपदार्थ:
राजीवलोचनः – रक्तवर्ण कमल पुष्प के समान नेत्रों वाले
मे रामः – मेरे श्रीराम
ऊनषोडशवर्षः – जिनकी आयु सोलह वर्ष से कम है
सह राक्षसैः – राक्षसों के साथ
युद्धयोग्यतामस्य – इनके युद्ध करने की योग्यता
न पश्यामि – मैं नहीं देखता
सरलार्थ
राजा दशरथ कहते हैं, “मेरे कमलनयन श्रीराम ने सोलह वर्ष की आयु भी पूर्ण नहीं की है (अभी अत्यन्त युवा है)। मैं उसमें राक्षसों से युद्ध करने की क्षमता नहीं देखता।”
अवतारिका (भूमिका)
कृष्ण ने यह प्रतिज्ञा की थी कि यज्ञ में विघ्न उत्पन्न करने वाली समस्त दुष्ट शक्तियों का वे संहार करेंगे। महाभारत उद्योगपर्व (७४.२७): “यज्ञविघ्नकरं हन्याम्” (मैं उन लोगों का वध करूँगा जो यज्ञ में बाधा डालते हैं।)
विश्वामित्र, ऋषि होने के कारण, भगवान श्री राम (पेरुमाळ) के अन्तःकरण की इच्छा को जानने में समर्थ थे। उन्होंने समझ लिया कि यज्ञ में विघ्न डालने वाले असुरों का विनाश करना परमात्मा का संकल्प है। इसी कारण उन्होंने राजा दशरथ से श्रीराम को अपने साथ वन में भेजने की प्रार्थना की।
किन्तु राजा दशरथ पुत्र-स्नेह से इतने अधिक अभिभूत थे कि वे श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं सके। जैसा कि श्रीसहस्रागीति (तिरुवाय्मोऴि) १.४.३ में शठकोप आऴ्वार् (नम्माऴ्वार्) कहते हैं: “मति ऎल्लाम् उळ् कलङ्कि * मयङ्कुमाल् ऎन्नीरे ” (भगवान् द्वारा प्रदत्त समस्त ज्ञान लुप्त हो गया है और वो पूर्णतः भ्रम में पड़ गयी है।)
(श्री रंगदेशिक स्वामी कृत संस्कृत अनुवाद:
विधिना स्त्रियो हर्षयन्तो मृदुगतयो हंसाः,
मत्या वामनब्रह्मचारी भूत्वा लोकं याचितवतः कुहकस्य ।
मतिशून्यायाः क्रूरपापमेव न नश्येदिति काचित्,
मतिषु सर्वास्वन्तः क्षुभिता मुद्यतीति वदतः ॥
अर्थ: सौभाग्य से संश्लेष प्राप्त करके स्त्रियों के अभिमत कार्य कर उन्हें हर्षित करने वाले सुन्दर गतिशील हे राजहंसों ! बुद्धिबल से वामन ब्रह्मचारी होकर भूमि की भिक्षा माँगने वाले कपटी भगवान् से जाकर यह सन्देश कह दो कि ‘क्या मतिहीन मेरा क्रूर पाप का भोग से अन्त नहीं होगा ?’ ऐसे कहती हुई एक अनुपम नायिका, पूर्णतः मतिभ्रष्ट होकर अचेत हो गयी है ॥)
इस प्रकार राजा दशरथ विश्वामित्र मुनि द्वारा बताए गए भगवान की महानता को समझ नहीं सके। इसलिए वो श्रीराम को विश्वामित्र महर्षि के साथ भेजने को इच्छुक नहीं हुये।
पेरियवाच्चान् पिळ्ळै के व्याख्यान से
पेरियवाच्चान् पिळ्ळै (कृष्णपाद आचार्य) ने राजा दशरथ के अन्तःकरण में चल रहे विचारों तथा श्रीराम को विश्वामित्र मुनि के साथ भेजने से इनकार करने के कारणों का अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया है। उनका वर्णन अनेक शास्त्र-प्रमाणों से समर्थित हैं।
“ऊनषोडशवर्षः” – सोलह वर्ष से कम आयु वाले
राजा दशरथ कहते हैं कि श्रीराम अभी एक निष्कपट और कोमल बालक हैं, जिनमें असुरों का सामना करने योग्य बल अभी नहीं आया है। वे यह भी कहते हैं कि श्रीराम ने अभी सोलह वर्ष की आयु पूर्ण नहीं की है; अतः उन्हें किसी संरक्षक के अधीन रहना चाहिए। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रमाण दिए जाते हैं:
- अनर्घराघवम् प्रथम अंक में कहा गया है: “क्षीरकण्ठश्च रामभद्रः”
अर्थात् – (रामभद्र अभी ऐसे बालक हैं जिनके कण्ठ में मानो दूध की कोमलता शेष है।) - मनु स्मृति में कहा गया है:
“बाल आषोडशाद्वर्षात् पौगण्डश्चेति कीर्त्यते”
गर्भस्थैः सदृशो ज्ञेयः अष्टमाद्वत्सरात् शिशुः । बाल आषोडशाद्वर्षात् पौगण्डोऽपि निगद्यते ॥ (शब्दकल्पद्रुम)
अर्थात् – “जन्म से लेकर १६ वर्ष की आयु पूरी होने तक व्यक्ति को शास्त्रों में ‘बाल’ या ‘पौगण्ड’ कहा जाता है। सोलह वर्ष की आयु तक बालक को अभिभावक के अधीन रहना चाहिए; उसे स्वतन्त्र रूप से उत्तरदायित्व नहीं सौंपना चाहिए।”
राजा दशरथ यह भी कहते हैं कि केवल श्रीराम को भेजना उचित नहीं होगा। वे स्वयं अपनी चतुरंगिणी सेना सहित उनके साथ जाने की इच्छा प्रकट करते हैं, ताकि श्रीराम उनकी देखरेख में रहें।
इसका प्रमाण श्रीरामायणम्, बालकाण्ड २०.१० में मिलता है: “चतुरङ्गसमायुक्तं मया च सहितं नय”
अर्थात् – “मेरी चतुरंगिणी सेना सहित मुझे भी साथ लेकर जाइए।”
“ऊनषोडशवर्षः” – सोलह वर्ष से कम आयु वाले
श्रीरामायणम्, बालकाण्ड २०.७ में कहा गया है:
“बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम् ।
न चास्त्रबलसम्पन्नो न च युद्धविशारदः ॥”
अर्थात् – “वह अभी बालक है; उसने अभी युद्धविद्या पूर्ण रूप से नहीं सीखी है। वह सेना की शक्ति और दुर्बलता को नहीं जानता। उसे अभी शस्त्र-विद्या की पूर्ण शिक्षा प्राप्त नहीं हुई है, और न ही वह युद्धकला में निपुण है।”
इसी कारण राजा दशरथ कहते हैं कि ऐसे श्रीराम को अकेले विश्वामित्र मुनि के साथ भेजना उचित नहीं होगा, जिन्होंने अभी सोलह वर्ष की आयु भी पूर्ण नहीं की है।
वे आगे अपने संकोच के लिए निम्न कारण प्रस्तुत करते हैं: श्रीराम ने अभी अस्त्र-शस्त्र प्रयोग की सम्पूर्ण शिक्षा प्राप्त नहीं की है; उन्हें सेना की सामर्थ्य और सीमाओं का पर्याप्त ज्ञान नहीं है एवं उन्होंने अब तक युद्धभूमि का सामना नहीं किया है।
यहाँ पेरियवाच्चान् पिळ्ळै यह भाव प्रकट करते हैं कि राजा दशरथ स्वयं को भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें श्रीराम को विश्वामित्र के साथ भेजने से रोकने के लिए उनकी आयु का आधार मिल गया। (अर्थात्, यदि विश्वामित्र मुनि श्रीराम के सोलह वर्ष पूर्ण होने के पश्चात आए होते, तो राजा दशरथ इस प्रकार का तर्क प्रस्तुत नहीं कर पाते।)
“ऊनषोडशवर्षः” – श्रीराम की आयु का विश्लेषण
चूँकि यहाँ श्रीराम की आयु स्पष्ट रूप से नहीं कही गई है, अतः पेरियवाच्चान् पिळ्ळै विभिन्न प्रमाणों के आधार पर श्रीराम की आयु का गम्भीर विश्लेषण करते हैं। वे राजा दशरथ, कौसल्यापिराट्टि (अम्माजी) तथा सीतापिराट्टि (अम्माजी) के वचनों का परीक्षण करके एक युक्तिसंगत निष्कर्ष तक पहुँचते हैं।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
अन्ततः पेरियवाच्चान् पिळ्ळै यह सिद्ध करते हैं कि सीता अम्माजी के साथ विवाह के समय श्रीराम की आयु १२ वर्ष थी। यही “ऊनषोडशवर्षः” का वास्तविक आशय है।
राजा दशरथ और सीतापिराट्टि के वचन —
“ऊन” का अर्थ है — “कम”। यहाँ इसका अर्थ “सोलह वर्ष से कम” है। इससे यह सम्भावना बनती है कि श्रीराम की आयु लगभग पन्द्रह वर्ष से कुछ अधिक और सोलह वर्ष से कम रही होगी।
श्रीरामायणम्, सुन्दरकाण्ड ३३.१७ में सीतापिराट्टि कहती हैं:
“समा द्वादश तत्राहं राघवस्य निवेशने।। भुञ्जाना मानुषान्भोगान्सर्वकामसमृद्धिनी।”
अर्थात् – “मैंने श्रीराम के गृह में बारह वर्ष व्यतीत किए।”
“तत्र त्रयोदशे वर्षे राज्येनेक्ष्वाकुनन्दनम्।। अभिषेचयितुं राजा सोपाध्यायः प्रचक्रमे”।।३३.१८।।
उस समय राजा दशरथ ने अपने गुरुओं के साथ मिलकर तेरहवें वर्ष में राज्य के द्वारा इक्ष्वाकुनन्दन (राम) का अभिषेक करने का आरम्भ किया।
यह कथन सीता अम्माजी के द्वारा उनके वैवाहिक जीवन की अवधि के सम्बन्ध में कहा गया है।
इस आधार पर पेरियवाच्चान् पिळ्ळै यह अनुमान करते हैं कि वनगमन के समय भगवान/पेरुमाळ् (श्रीराम) की आयु २८ वर्ष रही होगी। इसका गणित इस प्रकार है:
- १६ वर्ष — “ऊनषोडशवर्षः”, जैसा कि विश्वामित्र के साथ वनगमन के समय राजा दशरथ ने कहा।
- १२ वर्ष — सीतापिराट्टि द्वारा बताए गए वैवाहिक जीवन के वर्ष।
इस प्रकार:
१६ + १२ = २८ वर्ष
सीता अम्माजी के वचन — २५ वर्ष
जब रावण सीताजी का हरण करने आता है, तब सीतापिराट्टि उससे कहती हैं कि वनगमन के समय श्रीराम की आयु १५ वर्ष थी और उनकी अपनी आयु १८ वर्ष थी।
यह प्रमाण श्रीरामायणम्, अरण्यकाण्ड ४७.१० में मिलता है:
“भर्ता मम महातेजा वयसा पञ्चविंशकः।
अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।।”
अर्थात् –
“मेरे तेजस्वी पति की आयु उस समय पच्चीस वर्ष थी।”
“और मेरी आयु अठारह वर्ष थी।”
कौसल्या मैया के वचन — १७ वर्ष
कौसल्या मैया कहती हैं कि वे श्रीराम के जन्म से लेकर सत्रह (१७) वर्षों तक उनके राज्याभिषेक की प्रतीक्षा करती रहीं।
यह प्रमाण श्रीरामायणम्, अयोध्याकाण्ड २०.४५ में मिलता है:
“दश सप्त च वर्षाणि तव जातस्य पुत्रक ।
आसितानि प्रकामङ्क्षन्त्या मया दुःखपरिक्षयम् ॥”
अर्थात् –
“पुत्र! तुम्हारे जन्म से सत्रह वर्ष बीत चुके हैं। मैं इतने वर्षों से अपने दुःखों के अंत की प्रतीक्षा कर रही थी, किन्तु अब यह महान् संकट सामने आ गया है।”
यहाँ “दश सप्त” का अर्थ है — १० + ७ = १७ वर्ष।
उपरोक्त प्रमाणों के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि राज्याभिषेक की घोषणा के समय:
- सीता अम्माजी के वचनों के अनुसार श्रीराम की आयु २५ वर्ष थी।
- कौसल्या मैया के वचनों के अनुसार उनकी आयु १७ वर्ष थी।
- दशरथ जी के वचनों के अनुसार उनकी आयु २८ वर्ष प्रतीत होती है।
इन विभिन्न प्रमाणों का गम्भीर परीक्षण और सामञ्जस्य स्थापित करके पेरियवाच्चान् पिळ्ळै एक समन्वित निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं।
कौसल्या अम्माजी के “१७ वर्ष” वाले कथन का विश्लेषण
पेरियवाच्चान् पिळ्ळै कौसल्यापिराट्टि द्वारा कहे गए “सत्रह वर्ष” के कथन का भी गम्भीर परीक्षण करते हैं।
उपनयन संस्कार को “द्वितीय जन्म” माना जाता है। राजकुमार के लिए यह संस्कार सामान्यतः ग्यारहवें वर्ष में किया जाता है। इस सम्बन्ध में आपस्तम्बसूत्रं में कहा गया है:
“एकादशेषु राजन्यम्”
अर्थात् – “राजकुमार का उपनयन ग्यारहवें वर्ष में किया जाना चाहिए।”
यदि कौसल्या मैया के “१७ वर्ष” को उपनयन (दूसरे जन्म) के बाद के वर्ष माना जाए, तो गणना इस प्रकार होगी:
- १७ वर्ष — उपनयन के बाद के वर्ष
- १० वर्ष — जन्म से उपनयन तक के वर्ष
अतः —
१७ + १० = 27 वर्ष
किन्तु पेरियवाच्चान् पिळ्ळै स्पष्ट करते हैं कि यह मानना अधिक स्वारस्य प्रतीत नहीं होता कि शोक से व्याकुल कौसल्या मैया उस समय “द्वितीय जन्म” आदि सूक्ष्म विचारों को ध्यान में रखकर बोल रही थीं।
इसी प्रकार, यदि पूर्व में प्राप्त २८ वर्ष (१६ (विवाह से पूर्व)+ १२ (अयोध्या में विवाह के पश्चात)) की गणना से उपनयन-पूर्व के १० वर्ष घटा दिए जाएँ, तो परिणाम १८ वर्ष प्राप्त होगा।
अर्थात् –
२८ – १० = १८ वर्ष
इस प्रकार यहाँ १७ और १८ वर्षों का अन्तर उत्पन्न हो जाता है। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि “द्वितीय जन्म” के आधार पर की गई यह गणना पूर्णतः संगत या संतोषजनक नहीं है।
सीता अम्माजी के “२५ वर्ष” वाले कथन का विश्लेषण
पेरियवाच्चान् पिळ्ळै के अनुसार, सीता अम्माजी के वचनों को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए। इसके दो प्रमुख कारण बताए गए हैं।
1. सीतापिराट्टि ने अत्यन्त स्पष्ट रूप से श्रीराम की आयु “२५ वर्ष” बताई है। उन्होंने ठीक-ठीक “पञ्चविंशकः” शब्द का प्रयोग किया है।
यह अन्य गणनाओं से अधिक प्रबल प्रमाण माना जाता है, क्योंकि अन्य स्थानों पर आयु का निष्कर्ष अप्रत्यक्ष रूप से निकाला जाता है, जैसे: “ऊनषोडशवर्षः” — जहाँ “ऊन” एक साधारण शब्द है (१६ + १२ = २८), जहाँ गणना व्युत्पन्न रूप से की जाती है। साधारण शब्द की अपेक्षा निश्चित/स्पष्ट कथन को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
2. सीता पिराट्टि (अम्माजी) ने यह वचन उस समय कहा था जब रावण संन्यासी का वेश धारण करके उनके समीप आया था।
अतः उस समय सीता अम्माजी ने संन्यासी के प्रति आदर के कारण अत्यन्त सतर्कता के साथ अपने शब्दों का प्रयोग किया होगा। इसी कारण “पञ्चविंशकः” शब्द, जो सीतापिराट्टि ने स्वयं कहा, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है और उसे साधारण शब्द के समान अनदेखा नहीं किया जा सकता।
“ऊन” शब्द का विश्लेषण
पेरियवाच्चान् पिळ्ळै “ऊन” शब्द का भी सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं।
“ऊन” का सामान्य अर्थ है — “से कम”। यह शब्द किसी निश्चित संख्या का प्रत्यक्ष निर्देश नहीं करता। अतः वास्तविक आयु को समझने के लिए अन्य प्रमाणों का सहारा लिया जाता है।
जब रावण सहायता के लिए मारीच के पास गया, तब मारीच ने श्रीराम के पराक्रम का वर्णन किया। उसने बताया कि इतनी कम आयु में भी श्रीराम ने उसके भाई का वध किया तथा स्वयं उसे (मारीच को) समुद्र में दूर फेंक दिया था।
इसी वार्ता में मारीच, विश्वामित्र और दशरथ के मध्य हुए संवाद का उल्लेख करता है। उस संवाद में राजा दशरथ विश्वामित्र से कहते हैं कि श्रीराम केवल बारह वर्ष के हैं और अभी अस्त्र-विद्या में पूर्ण निपुण नहीं हुए हैं।
यह प्रमाण श्रीरामायणम्, अरण्यकाण्ड ३८.६ में मिलता है:
“बालो द्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघवः। कामं तु मम यत्सैन्यं मया सह गमिष्यति।”
अर्थात् –“यह (श्रीराम) अभी केवल बारह वर्ष का बालक है और इसने अभी तक अस्त्र-शस्त्रों की पूरी शिक्षा भी प्राप्त नहीं की है। इसलिए, मेरी जो चतुरंगिणी सेना है, वह तो स्वेच्छा से मेरे साथ जाएगी।”
इसी समय श्रीराम का विवाह सीता अम्माजी के साथ हुआ था।
अतः गणना इस प्रकार होती है: १२ वर्ष विवाह से पूर्व, जैसा कि राजा दशरथ ने कहा एवं १२ वर्ष, विवाहोपरान्त का समय, जैसा कि सीता अम्माजी ने कहा।
इस प्रकार: १२ + १२ = २४ वर्ष
अतः इसका आशय यह समझना चाहिए कि वनगमन के समय श्रीराम के २४ वर्ष पूर्ण हो चुके थे और वे २५वें वर्ष में प्रवेश कर चुके थे।
“दश सप्त च” शब्द का विश्लेषण
पूर्व में “दश सप्त च” का अर्थ १७ वर्ष माना गया था। किन्तु इस विरोधाभास को दूर करने के लिए पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, कौशल्या मैया द्वारा कहे गए इस पद का एक विशेष प्रकार से विश्लेषण करते हैं।
आचार्य “दश सप्त च” को इस प्रकार विभाजित करते हैं:
- दश = १०
- सप्त = ७
- च = “और”, अर्थात् एक और सप्त (७)
इस प्रकार गणना होती है: १० + ७ + ७ = २४
अतः उनके अनुसार कौसल्यापिराट्टि के “दश सप्त च” शब्द का आशय १७ नहीं, अपितु २४ है।
विभिन्न प्रमाणों का सामञ्जस्य
प्रथम दृष्टि में निम्नलिखित पदों में परस्पर विरोध प्रतीत होता है:
“ऊनषोडशवर्षः”; “दश सप्त च”; एवं “पञ्चविंशकः”
किन्तु जब इन सभी का प्रमाणों के आधार पर सम्यक् विश्लेषण किया जाता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि वनगमन के समय श्रीराम के २४ वर्ष पूर्ण हो चुके थे और वे २५वें वर्ष में प्रवेश कर रहे थे।
उसके पश्चात दशरथ ने “ऊनषोडशवर्षः” क्यों कहा?
अब भी यह प्रश्न उठ सकता है कि राजा दशरथ ने साधारण रूप से “ऊनषोडशवर्षः” क्यों कहा? यदि श्रीराम वास्तव में १२ वर्ष के थे, तो “द्वादशवर्षः” क्यों नहीं कहा?
वास्तव में अनेक स्थानों पर राजा दशरथ स्वयं श्रीराम को बारह वर्ष का कहते हैं। उदाहरणार्थ:
श्रीरामायणम्, अरण्यकाण्ड ३८.६:
“बालो द्वादशवर्षोऽयम्”
“यह बालक बारह वर्ष का है।”
बालकाण्ड २०.७:
“बालो ह्यकृतविद्यश्च”
“यह बालक अभी अस्त्र-शस्त्र-विद्या में पूर्ण शिक्षित नहीं है।”
बालकाण्ड १९.२२:
“काकपक्षधरं बालम्”
“ऐसा बालक जिसके केश अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुए हैं।”
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि “ऊनषोडशवर्षः” का प्रयोग केवल आयु बताने के लिए नहीं, बल्कि यह दिखाने के लिए किया गया कि सोलह वर्ष से कम आयु का बालक स्वतन्त्र रूप से उत्तरदायित्व उठाने योग्य नहीं माना जाता।
“न युद्धयोग्यतां पश्यामि”
इस सम्बन्ध में स्मृति का प्रमाण दिया जाता है:
“बाल आशोडशाद्वर्षात् पौगण्डश्चेति कीर्त्यते”
अर्थात् –“सोलह वर्ष की आयु तक बालक अभिभावक के अधीन माना जाता है।”
इसी कारण राजा दशरथ विश्वामित्र से कहते हैं कि वे स्वयं भी अपनी सेना सहित श्रीराम के साथ जाएँगे, ताकि श्रीराम उनकी संरक्षण-छाया में रहें।
व्याख्यान के बाकि अंश भाग २ में:
Note:
सीता अम्माजी के लिए ‘पिराट्टि’ और भगवान राम के लिए ‘पेरुमाळ्’ शब्द का प्रयोग सम्प्रदाय में होता है। हनुमान जी को ‘तिरुवडि’ कहते हैं। वैसे ही श्री शठकोप दिव्य-सूरि, जिन्हें परांकुश सूरि भी कहते हैं, उन्हें ‘आऴ्वार्’ कहा जाता है। इन शब्दों के प्रयोग से भ्रमित न हों, किन्तु ये जानकारी आवश्यक है।
अडियेन् माधव श्रीनिवास रामानुज दास।
अडियेन् रमा श्रीनिवास रामानुज दासी।
आधार – https://granthams.koyil.org/2025/07/12/sri-ramayana-thani-slokam-6-english/
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