प्रपन्नामृत – अध्याय ५५

प्रपन्नामृत – अध्याय ५५ श्री आन्ध्रपूर्णाचार्य स्वामी की अनन्य आचार्य निष्ठा 🔹श्री आन्ध्रपूर्णाचार्य अपने आचार्य यतिराज के श्रीचरणों को ही उपाय उपेय मानकर उनकी सेवा में रहते थे। 🔹श्री आन्ध्रपूर्णाचार्य जब यतिराज के साथ रंगनाथ भगवान के दर्शन के लिये जाते तब वे रंगनाथ भगवान का दर्शन न करके यतिराज के दर्शन ही करते थे। … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ५४

प्रपन्नामृत – अध्याय ५४ श्री यतिराज अष्टोत्तर शतनाम 🔹 यतिराजने सभी विरोधी मतोंको परास्त करके समस्त लोकोंमें श्रेष्ठ जनोंद्वारा सम्मत श्रीवैष्णव सिद्धान्त की स्थापना की। 🔹 यतिराज के ७४ प्रधान शिष्य तथा असंख्य शिष्य थे। 🔹सभी शिष्य नित्य आचार्य सेवा में संलग्न रहते थे। 🔹आचार्य वरदविष्णु, आचार्य कुरेश, श्रीभाष्य के व्याख्यान का कैंकर्य करते थे। … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ५३

प्रपन्नामृत – अध्याय ५३ श्रीगोदाम्बा के अभिष्ट की पूर्ति 🔹प्राचीन समय में गोदाम्बाजी ने एक बार उनसे रचित दिव्य प्रबन्ध में भगवान से प्रार्थना की थी की, “यदि आपने मेरा पाणिग्रहण संस्कार करलिया तो मैं आपको सौ घडे क्षीरान्न तथा सौ घडे माखन का भोग लगाउंगी। 🔹उक्त दिव्य प्रबन्ध में लिखित गोदाम्बाजी के अभिष्ट को … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ५२

प्रपन्नामृत – अध्याय ५२ श्री वरदान भगवान के द्वारा कुरेशाचार्य को दृष्टिप्रदान 🔹एक दिन यतिराज ने कुरेश स्वामीजी को वरदराज भगवान् का स्तोत्र रचनेकी आज्ञा प्रदान की और कहा की भगवान से नेत्र ज्योति माँगो। 🔹स्तोत्र की रचना करके कुरेश स्वामीजी ने यतिराज को श्रवण कराया। 🔹फिर यतिराज के साथ काँची जाकर यह स्तोत्र वरदराज … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ५१

प्रपन्नामृत – अध्याय ५१ यतिराज का पुन: श्रीरंगम् लौट आना 🔹श्रीवैष्णव द्वेषी राजा चौल नरेश ने महापुर्ण स्वामीजी एवं कुरेश स्वामीजी को नेत्रहीन बनाने के पश्चात् राज्य के सभी श्रीवैष्णव मन्दिर तोड़ना प्रारंभ करदिया। 🔹श्री रंगनाथ भगवान का मन्दिर तोडने के लिये जब वह सेना सहित जा रहा था तब उसके कण्ठमें कीड़े पड़ गये … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ५०

प्रपन्नामृत – अध्याय ५० श्री कुरेश स्वामी का सुन्दर गिरि पर निवास 🔹एकबार कुरेश स्वामीजी रंगनाथ भगवान के दर्शन के लिये गये तो द्वारपोलोंने उन्हे रोकदिया। 🔹द्वारपालोंने कहा की “कृमिकण्ठ राजा नाराज न हो इसलिये यतिराज के संबंधियोंको मंदिरमें प्रवेश नही दिया जा रहा है”। 🔹द्वारपालोंने आगे कहा, “फिर भी आप तो महात्मा हैं इसलिये … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४९

प्रपन्नामृत – अध्याय ४९ श्री कुरेशस्वामी और कृमिकण्ठ का विवाद 🔹जब कुरेश स्वामीजी और महापुर्ण स्वामीजी कृमिकण्ठ के राजदरबारमें लाये गये तब उस श्रीवैष्णवद्वेषी राजा ने कठोर शब्दोंमें कुरेश स्वामीजी से कहा, “लिखो, शिव से बढ़कर संसारमें अन्य कोई श्रेष्ठ तत्व नही” 🔹कुरेश स्वामीजी ने धैर्यपुर्वक विविध प्रमाण देकर श्रीमन्नारायण ही परतत्व हैं यह सिद्ध … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४८

प्रपन्नामृत – अध्याय ४८ यतिराज श्रीरामानुजाचार्य द्वारा यादवाद्रि पर श्रीसम्पत् कुमार भगवान की प्रतिष्ठा 🔹यतिराज जब सम्पतकुमार भगवान को लेकर दिल्ली से यादवाद्रि आरहे थे तब मार्गमें ही वह राजकन्या भगवान के श्रीविग्रहमें विलीन होगयी। 🔹तत्पश्चात श्रीनारायणपुर पहुँचकर यतिराज नें विधीपुर्वक सम्पतकुमार भगवान का संप्रोक्षण करके मूलमुर्ति के समीप प्रतिष्ठित कर दिया। 🔹राजकन्या की भी … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४७

प्रपन्नामृत – अध्याय ४७ 🌷सम्पतकुमार भगवान की प्राप्ति🌷 🔹एक समय तिलक करनेके लिये श्रीरङ्गम से लाया हुवा पासा समाप्त होने को आया। 🔹यतिराज को चिन्ता हुयी की अब श्रीवैष्णव लोग तिलक कैसे करेंगे। 🔹यादवाद्रिनाथ भगवान ने स्वप्नमें आदेश दिया की यादवाद्रि पर तिलकपासा निर्माण करनेके लिये पर्याप्त मात्रा में श्वेतमृत्तिका उपलब्ध है। 🔹यतिराज विष्णुवर्धन राजा … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४६

प्रपन्नामृत – अध्याय ४६ पिशाच बाधा से राजकन्या की मुक्ति 🔹यतिराज मैसुर राज्य के शालग्राम नामक ग्राम में आये। 🔹यहाँके सभी लोग मायावादमें आकण्ठ डुबे हुये थे। 🔹उनपर कृपा करनेके लिये यतिराजनें  दाशरथि स्वामीजी को कहा की ग्राम का मुख्य तालाब है जहाँसे सभी ग्रामवासी जल ग्रहण करते हैं, उस तालाबमें अपने चरण प्रक्षालन करके … Read more