प्रपन्नामृत – अध्याय ४८

प्रपन्नामृत – अध्याय ४८ यतिराज श्रीरामानुजाचार्य द्वारा यादवाद्रि पर श्रीसम्पत् कुमार भगवान की प्रतिष्ठा 🔹यतिराज जब सम्पतकुमार भगवान को लेकर दिल्ली से यादवाद्रि आरहे थे तब मार्गमें ही वह राजकन्या भगवान के श्रीविग्रहमें विलीन होगयी। 🔹तत्पश्चात श्रीनारायणपुर पहुँचकर यतिराज नें विधीपुर्वक सम्पतकुमार भगवान का संप्रोक्षण करके मूलमुर्ति के समीप प्रतिष्ठित कर दिया। 🔹राजकन्या की भी … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४७

प्रपन्नामृत – अध्याय ४७ 🌷सम्पतकुमार भगवान की प्राप्ति🌷 🔹एक समय तिलक करनेके लिये श्रीरङ्गम से लाया हुवा पासा समाप्त होने को आया। 🔹यतिराज को चिन्ता हुयी की अब श्रीवैष्णव लोग तिलक कैसे करेंगे। 🔹यादवाद्रिनाथ भगवान ने स्वप्नमें आदेश दिया की यादवाद्रि पर तिलकपासा निर्माण करनेके लिये पर्याप्त मात्रा में श्वेतमृत्तिका उपलब्ध है। 🔹यतिराज विष्णुवर्धन राजा … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४६

प्रपन्नामृत – अध्याय ४६ पिशाच बाधा से राजकन्या की मुक्ति 🔹यतिराज मैसुर राज्य के शालग्राम नामक ग्राम में आये। 🔹यहाँके सभी लोग मायावादमें आकण्ठ डुबे हुये थे। 🔹उनपर कृपा करनेके लिये यतिराजनें  दाशरथि स्वामीजी को कहा की ग्राम का मुख्य तालाब है जहाँसे सभी ग्रामवासी जल ग्रहण करते हैं, उस तालाबमें अपने चरण प्रक्षालन करके … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४५

प्रपन्नामृत – अध्याय ४५ चेलाञ्चलाम्बा का वृत्तान्त भाग १/२ 🔹यतिराज अपने शिष्योंको साथ चेलाञ्चलाम्बा के घर पधारें। 🔹चेलाञ्चलाम्बा ने उनका आदर सत्कार करके प्रसाद पाने का आग्रह किया। (रामानुजाचार्य काषाय वस्त्रमें ना होनेके कारण चेलाञ्चलाम्बा उनको पहचान नही पायीं) 🔹उन श्रीवैष्णवोंका प्रसाद के लिये संकोच देखकर चेलाञ्चलाम्बा ने बताया की वें भी रामानुजाचार्य की शिष्यां … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४४

प्रपन्नामृत – अध्याय ४४ पश्चिम दिशा में प्रस्थान 🔹कृमिकण्ठ राजा दुर्जन, श्रीवैष्णवद्वेषी, भगवान श्रीमन्नारायण का निन्दक था और श्रीवैष्णव धर्म से इसको बड़ा विरोध था। 🔹श्रीवैष्णव विरोधी सम्मतिपत्र पर सबके बलपुर्वक हस्ताक्षर करवाके यह आदेश दिया कि जो वैष्णवत्व का आचरण करेगा उसको कठिन दण्ड दिया जायेगा। 🔹राजा के मंत्रीपरिषद के एक सदस्यने (जो कुरेशाचार्य … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४३

प्रपन्नामृत – अध्याय ४३ कृमिकंठ चोलराज की उत्पत्ति का कारण 🔹जिसप्रकार पुत्र के सुयोग्य होनेपर पिता अपना समस्त कार्यभार पुत्र पर सौंप देता है उसी प्रकार अपनी दोनों विभूतियों का कार्य यतिराज को सौंपकर भगवान निश्चिन्ह होगये। 🔹यतिराज और उनके आदेष से ७४ पीठाधीश्वर ने अहर्निश श्रीवैष्णवता का प्रचार करनेमें जीवन लगादिया। 🔹सारा भारत श्रीवैष्णवमय … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४२

  प्रपन्नामृत – अध्याय ४२ आचार्य कृपा ही मोक्ष का उपाय है 🔹श्री महापुर्णाचार्य स्वामीजीने आचार्य आज्ञा से मानेरनम्बि नामक क्षुद्र कुलोत्पन्न महात्मा का ब्रह्ममेध विधी से दाह संस्कार किया। 🔹समस्त रुढिवादी ब्राह्मणोंने धर्म विरुद्ध कार्य बताकर उनकी निन्दा की और उनको पतित मानने लगे। 🔹श्रीमहापूर्णाचार्य की पुत्री अतुलायी ने सभी लोगोंके सामने कहा, “मेरे … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४१

प्रपन्नामृत – अध्याय ४१ धनुर्धरदास का उत्कर्ष 🔹रंगनाथ भगवान के ब्रह्मोत्सव के समाप्ति के दिन भगवान कावेरी स्नान के लिये पधारे तो रामानुजाचार्य भी वहाँ अपने अंतरंग शिष्य धनुर्धरदास के कंधे का सहारा लेकर उपस्थित हुये। 🔹ब्राह्मण शिष्योंने ईर्ष्या द्वेश उच्चकुलाभिमान के वशीभूत होकर यतिराज से इसका कारण पूछा। 🔹यतिराजनें स्पष्ट किया “विद्या, धन, कुल … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ४०

  प्रपन्नामृत – अध्याय ४० धनुर्धरदास पर यतिराज की कृपा 🔹निचुलापुरीमें धनुर्धरदास नामक एक बलशाली विशाल सुदृढ शरीरवाला तथा मल्लविद्यामें निपुण पहलवान रहता था। 🔹धनुर्धरदास एक हेमाम्बा नामक युवती के प्रेममें आसक्त होकर उसके सुन्दर विशाल नेत्र निहारनेमें मग्न रहता था। 🔹एकबार श्रीरंगममें रंगनाथ भगवानका ब्रह्मोत्सव के दर्शन करने हेतु हेमाम्बा आयी हुयी थी। 🔹धनुर्धरदास … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ३९

प्रपन्नामृत – अध्याय ३९ श्रीपराशर भट्टार्य का विवाह भाग १/२ 🔹पराशर भट्टार्य ने बालक अवस्थामें रंगनाथ भगवान के निमित्त रखे गये दूध का स्पर्श किया था। 🔹जब लोगोंनें कहा की बालक का स्पर्श किया हुवा दूध भगवान के योग्य नही है तब भगवान ने कहा, “यह बालक मेरे प्रसाद से जन्मा इसलिये मेरा पुत्र है”। … Read more