श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः
पूर्व मे हमने https://granthams.koyil.org/2017/09/04/srivaishnava-tiruvaradhanam-hindi/ पर देखा श्रीवैष्णव तिरुवाराधन की महिमा और उसे करने की विधि | उस लेख में, कई श्लोकों और पाशुरों को उद्धृत करते हुए, श्लोकों का पूरा संदर्भ/सूची नहीं दी गयी थी। इस लेख का उद्देश्य इस जानकारी को प्रदान करना है। तिरुवाराधन में उपयोग किए जाने वाले सभी श्लोकों/पाशुरों को एकत्र करने का प्रयास किया गया है। पूरी सूची देखने के लिए कृपया आगे पढ़ें।

श्रीमन नारायण – परमपदमें

तिरुवाराधन (कोइल आळ्वार – सन्निधि )

नम्मालवार (श्री शठकोप स्वामिजी), एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी), अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी)
प्रमाणोंका संकलन (श्लोक एवं पाशूर)
हमने अभीतक तिरुवाराधनम का महत्त्व तथा तिरुवाराधानम का क्रम देखा। अपितु, उनमें विविध श्लोक तथा पाशूर संक्षिप्त रूप में दिये गए हैं। इस लेख में तिरुवराधानम में निवेदन किए जाने वाले सभी श्लोक तथा पाशूरोंका संकलन करनेका प्रयत्न किया गया है।
सूचना:
- रहस्यत्रय पाठ का अधिकार पञ्चसंस्कार होने पर ही प्राप्त होता है।
- वेद मंत्रों (“ओम” सहित) का पाठ केवल ब्रह्मोपदेश (जो उपनयन संस्कार के भाग के रूप में किया जाता है) के बाद किया जाना चाहिए। एकमात्र अपवाद तिरुमन्त्रम है जो पंचसंस्कार में मंत्रोपदेश का हिस्सा है।
उर्ध्वपुण्ड्र धारण
स्नान के पश्चात् एक शुद्ध स्थान पर बैठकर निम्न मन्त्र का पाठ करते हुये ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक करना चाहिए।


| अनुक्रमांक | स्थान | सफ़ेद पासासे ऊर्ध्वपुण्ड्र करते समय बोलनेका विष्णुमंत्र | श्रीचूर्ण धारण करते समय बोलनेका लक्ष्मीमंत्र |
| १ | मस्तक | ॐ केशवाय नम:॥ | ॐ श्रियै नम:॥ |
| २ | पेट (मध्य) | ॐ नारायणाय नम:॥ | ॐ अमृतोद्भवायै नम:॥ |
| ३ | वक्षस्थल (मध्य) | ॐ माधवाय नम:॥ | ॐ कमलायै नम:॥ |
| ४ | कण्ठ (मध्य) | ॐ गोविन्दाय नम:॥ | ॐ चंद्रशोभिन्यै नम:॥ |
| ५ | पेट (दाहिना) | ॐ विष्णवे नम:॥ | ॐ विष्णुपत्न्यै नम:॥ |
| ६ | वक्षस्थल (दाहिना) | ॐ मधुसूदनाय नम:॥ | ॐ वैष्णव्यै नम:॥ |
| ७ | कण्ठ (दाहिना) | ॐ त्रिविक्रमाय नम:॥ | ॐ वरारोहायै नम:॥ |
| ८ | पेट (वाम) | ॐ वामनाय नम:॥ | ॐ हरिवल्लभायै नम:॥ |
| ९ | वक्षस्थल (वाम) | ॐ श्रीधराय नम:॥ | ॐ शार्ङ्गिण्यै नम:॥ |
| १० | कण्ठ (वाम) | ॐ ऋषीकेशाय नम:॥ | ॐ देव देव्यै नम:॥ |
| ११ | पीठ (मध्य) | ॐ पद्मनाभाय नम:॥ | ॐ महालक्ष्म्यै नम:॥ |
| १२ | ग्रीवा (मध्य) | ॐ दामोदराय नम:॥ | ॐ लोकसुन्दर्यै नम:॥ |
सूचना
- जमीनपर ठीक तरह से बैठकर ही ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिए।
- हाथ में बचा हुआ पासा तथा श्रीचूर्ण धोना नहीं चाहिए बल्कि सर पर पौंछ लेना चाहिए।
- सफ़ेद पासा से किया जानेवाला ऊर्ध्वपुण्ड्र तर्जनी उँगली से करना चाहिए।
- सामान्यत: मरणाशौच में केवल पासा का ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण किया जाता है श्रीचूर्ण नहीं। तो भी अपने आचार्य से पूछकर तथा स्थानीय परंपरा अनुसार चलना चाहिए।
ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाने के पश्चात् गुरूपरम्परा का मन्त्र रूप में (वाक्य गुरूपरंपरा) और श्लोक रूप में अनुसंधान करना चाहिए।
वाक्य गुरुपरम्परा
अस्मद् गुरुभ्यो नम:
अस्मद् परमगुरुभ्यो नम:
अस्मद् सर्वगुरुभ्यो नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्री पराङ्कुशदासाय नम:
श्रीमद् यामुनमुनये नम:
श्री राममिश्राय नम:
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम:
श्रीमन् नाथमुनये नम:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते विश्वक्सेनाय नम:
श्रियै नम:
श्रीधराय नम:
गुरूपरम्परा श्लोक
अस्मद्देशिकम अस्मदीय परमाचार्यान अशेषान् गुरुन्,
श्रीमल्लक्ष्मण योगी पुङ्गव महापूर्णौ मुनिं यामुनम् ।
रामं पद्मविलोचनं मुनिवरं नाथं शठद्वेषिणम्,
सेनेशं श्रियमिन्दिरा सहचरं नारायणं संश्रये ॥
रहस्यत्रय अनुसंधान
(३ गुप्त मन्त्र का जप करना)
गुरूपरम्परा का अनुसंधान कर और फिर उसका जाप कर हमें रहस्यत्रय का जाप करना हैं – ३ गुप्त मन्त्र।
तिरुमन्त्र – ॐ नमो नारायणाय
द्वयम
श्री मन्नारायण चरणौ शरणं प्रपध्ये ।
श्रीमते नारायणाय नमः ॥
चरम श्लोक (श्री कृष्ण चरम श्लोक)
सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहम् त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मासुच:||
श्री वराह चरम श्लोक
स्थिते मनसि सुस्वस्ते शरीरे सतियो नर:
धातुसाम्ये स्थिते स्मार्थ विश्वरूपञ्च मामजम्
तथस्थं मृयमाणन्तु काष्टपाषाण सन्निभम्
अहम् स्मरामि मद् भक्तम् नयामि परमाम् गतिम्
श्री राम चरम श्लोक
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते |
अभयं सर्व भूतेभ्यो ददामि एतत् व्रतं मम ||
ओराण वळि आचार्य तनियन
स्रोत – https://acharyas.koyil.org/index.php/thanians-hindi/
रहस्य त्रय के पश्चात पुर्वचार्यों के तनियन का अनुसंधान होता है – भगवान रंगनाथ से लेकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तक।
- पेरिय पेरुमाळ (श्री रंगनाथ पेरुमाळ) – श्रावण मास, रोहिणि नक्षत्र
श्री स्थनाभरणम् तेजः श्रीरंगेशयमाश्रये ।
चिन्तामणि मिवोत्वान्तम् उत्संगे अनन्तभोगिनः ॥
- पेरिय पिराट्टि (श्री रंगनाच्चियार्) – फाल्गुन मास, उत्तर फाल्गुनि नक्षत्र
नमः श्रीरंग नायक्यै यत् भ्रूविभ्रम भेततः ।
ईशेशितव्य वैशम्य निम्नोन्नतमिदम् जगत् ॥
- सेनै मुदलिआर् (श्री विष्वक्सेन) आश्विन मास , पूर्वाषाढ नक्षत्र
श्री रंगचँद्रमसम् इन्द्रियाविहर्तुम्
विन्यस्यविस्वचिद चिन्नयनाधिकारम् ।
यो निर्वहत्य निसमन्गुळि मुद्रयैव
सेनान्यमन्य विमुकास्तमसि श्रियाम ॥
- नम्मालवार (वैशाख मास , विशाख नक्षत्र)
माता पिता युवतयस्तनया विभूतिः सर्वम् यदेव नियमेन मदन्वयानाम् ।
आद्यस्य नः कुलपतेर्वकुळाभिरामम् श्रिमत्तदन्घ्रि युगळम् प्रणमामि मूर्ध्ना ॥
- नाथमुनिगल् (श्री नाथमुनि) (ज्येष्ठ मास , अनुराधा नक्षत्र)
नमः अचिन्त्याद्भुताक्लिष्ट ज्ञानवैराग्यरासये | नाथायनाथमुनये अगाधभगवद्भक्तिसिन्धवे ।।
- उय्यक्कोन्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष ) (चैत्र मास , कार्तीक नक्षत्र)
नमः पंकजनेत्राय नाथः श्रीपादपंकजे | न्यस्तसर्वभराय अस्मत्कुलनाथायधीमते ।।
- मणक्काल् नम्बि – श्री राममिश्र (माघ मास , माघ नक्षत्र)
अयत्नथो यामुनमात्म दासम् अलर्क्क पत्रार्प्पण निष्क्रियेण ।
यः क्रीत्वानास्तित यौवराज्यम् नमामितम् राममेय सत्वम् ।।
- आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) (आषाढ मास , उत्तर आषाढ नक्षत्र)
यत् पदाम्भोरुहध्यान विध्वस्ताशेष कल्मषः । वस्तुतामुपयातोहम् यामुनेयम् नमामितम् ॥
- पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण / श्री परांकुश दास) (मार्गशीर्ष मास , ज्येष्ठ नक्षत्र)
कमलापति कल्याण गुणामृत निशेवया । पूर्णकामायसततम् पूर्णाय महते नमः ॥
- एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य) (चैत्र मास , आद्र नक्षत्र)
योनित्यमच्युतपदाम्बुजयुग्मरुक्मव्यामोहतस्तदितराणि तृणाय मेने ।
अस्मद्गुरोर्भगवतोस्य दयैक सिन्धोः रामानुजस्य चरणौ शरणम् प्रपद्ये ॥
- एम्बार् (श्री गोविन्द पेरुमाळ्) (गोविन्दाचार्य – पुष्य मास , पुनर्वसु नक्षत्र)
रामानुज पदच्छाया गोविन्दाह्वानपायिनी । तदायत्तस्वरूपा सा जीयान्मद्विश्रमस्थली ॥
- श्री पराशर भट्टर् (वैशाख मास , अनुराधा नक्षत्र)
श्री पराशर भट्टार्य श्रीरंगेश पुरोहितः । श्रीवत्सांग सुतस्श्रीमान् श्रेयसेमेस्तु भूयसे ॥
- नन्जीयर् (श्री माधवाचार्य) (फाल्गुन मास , उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र)
नमो वेदान्त वेद्याय जगंमंगळ हेतवे । यस्य वागामृतासार भूरितम् भुवनत्रयम् ॥
- नम्पिळ्ळै (कार्तीक मास , कार्तीक नक्षत्र)
वेदान्त वेद्यामृत वारिरासेर्वेदार्थसारामृतपूरमग्रयम् ।
आदायवर्शन्तमहम् प्रपद्ये कारुण्यपूर्णम्कलिवैरिदासम् ॥
- वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य) (ज्येष्ठ मास , स्वाति नक्षत्र)
श्री कृष्ण पाद पादाब्जे नमामि सिरसा सदा । यत्प्रसाद प्रभावेन सर्व सिद्धिरभून्मम ॥
- पिळ्ळै लोकाचार्य (आश्विन मास , श्रावण नक्षत्र)
लोकाचार्याय गुरवे कृष्णपादस्य सूनवे । संसारभोगिसन्दष्ट जीवजीवातवे नमः ॥
- तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (वैशाख मास , विशाखा नक्षत्र)
नम श्रीशैलनाथाय कुन्ती नगर जन्मने । प्रसादलब्ध परम प्राप्य कैन्कर्यशालिने ॥
- अळगिय मनवाळ मामुनि (अश्विन / अश्वयुज मास , मूल नक्षत्र)
श्रीशैलेशदयापात्रम् दीभक्त्यादिगुणार्णवम् । यतीन्द्रप्रवणम्वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम् ॥
- श्री पोन्नडिक्काल जीयर (कन्या – पुनर्वसु) – वानामामलै (तोताद्रि) मठ शिष्यों द्वारा पाठ किया जाता है
रम्यजामात्रुयोगीन्द्रपादरेखामयम् सदा । तदा यत्तात्मसत्तादिम् रामानुजमुनिम् भजे ॥
इसके बाद, अपने आचार्य के मठ/थिरुमालिगै परंपरा के तनियनो का पाठ किया जाता है।
इसके बाद व्यक्ति संध्यावंदनम और माध्याह्निकम करता है (तिरुवाराधनम माध्याह्निकम के बाद दोपहर के समय किया जाता है)।
स्वयं को शुद्ध करने के लिए मंत्र स्नान का श्लोक
ध्यान दें: सुबह के अनुष्ठान और तिरुवाराधनम के बीच के समय में कोई भी दूषित हो सकता था – इसलिए यह शुद्धिकरण
प्रक्रिया है।
भुवि मूर्ध्नि तताकाशे मूर्ध्न्याकाशे तथा भुवि |
आकाशे भुवि मूर्ध्निस्यात् अपोहिष्तेथि मन्त्रथ: ||
और अध्ययन करें,
आपो हिष्ठा मयोभुव: | था न ऊर्जे दधातन: | महे रणाय चक्षसे | यो वः शिवतमो रस: | तस्य भाजयतेह नः | उशतीरिव मातरः | तस्मा अरङ्गमाम व: | यस्य क्षयाय जिन्वथ: | आपो जनयथा च नः |
तुलसी के पत्ते एकत्र करते समय श्रद्धापूर्वक पढ़े जाने वाले श्लोक
तुलस्यमृत जन्मासि सदा त्वम् केशवप्रिये |
केशवार्थम् लुणामि त्वाम् वरधा भव सोबने ||
(ध्यान दें: तुलसी के पत्ते सभी दिन नहीं तोड़े जा सकते – कुछ प्रतिबंध हैं)
सार्वजनिक तनियन
(कोइल आळ्वार – सन्निधि के सामने पात्र आदि व्यवस्थित करते समय पाठ करें) – स्रोत https://divyaprabandham.koyil.org/index.php/thaniyans-hindi/
- श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कि स्तुति में तनियन – भगवान श्रीरंगनाथ द्वारा रचित)
श्रीशैलेश दयापात्रं धीभक्त्यादि गुणार्णवम् ।
यतीन्द्र प्रवणं रम्यजामातरं मुनिम् ॥
पोन्नडिक्काल् जीयर् (प्रथम तोताद्रि जीयर्) की स्तुति करने वाला यह तनियन् दोड्डैयङ्गार् अप्पै द्वारा रचित है। दोड्डैयङ्गार् अप्पै, पोन्नडिक्काल् जीयर् के अष्ट दिक्गजों (आठ प्रमुख शिष्यों) में से एक थे। इस तनियन् का पाठ वानमामलै मठ के शिष्यों तथा पोन्नडिक्काल् जीयर् की परंपरा के अनुसरण करने वाले आचार्य तिरुवंशों के शिष्यों द्वारा किया जाता है।
रम्यजामातृयोगीन्द्र पादरेखामयंसदा ।
तदा यत्तात्म सत्तान्दि रामानुजमुनिं भजे ॥
- गुरूपरम्परा कि स्तुति में तनियन – श्रीकुरेश स्वामीजी द्वारा रचित
लक्ष्मीनाथ समारम्भां नाथयामुन मध्यमाम।
अस्मदाचार्य पर्यन्ता वन्दे गुरुपरम्परा॥
- श्रीरामानुज स्वामीजी कि स्तुति के लिये तनियन – श्रीकुरेश स्वामीजी द्वारा रचित
यो नित्यमच्युतपदाम्बुजयुग्मरूक्म
व्यामोहतस्तदितराणि तृणाय मेने ।
अस्मदगुरोर्भगवतोSस्य दयैकसिंधोः
रामानुजस्य चरणौ शरणं प्रपध्ये ॥
- श्रीशठकोप स्वामीजी कि स्तुति के लिये तनियन – श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित
माता पिता युवतयस्तनया विभूति:
सर्वं यदेव नियमेन मदन्वयानाम् ।
आध्यरस्य न: कुलपतेर्वकुलाभिरामं
श्रीमत्तदंघ्रियुगलमं प्रणमामि मूर्ध्ना ॥
- आल्वार और श्रीरामानुज स्वामीजी कि स्तुति के लिये तनियन – श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी द्वारा रचित
भूतं सरश्च महादाहवयभट्टनाथ
श्री भक्तिसारकुलशेखर योगिवाहन् ।
भक्तांघ्रिरेणु परकाल यतीन्द्रमिश्रान्
श्रीमत्परांकुशमुनिं प्रणतोस्मि नित्यम् ॥
टिप्पणी : सामान्यतः यहाँ से दिव्य प्रबन्ध के पाठ नियमित रूप से किए जाते हैं। अनध्ययन काल में विशेषकर, दिव्य प्रबंध पाशुरों के स्थान पर हम उपदेश रत्नमाला और तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि के पाशुरों का पाठ करते हैं।
सन्निधि/भगवान के मंदिर के समक्ष दीप जलाते समय अनुसंधान किए जाने वाले श्लोक / पाशुरम।
वैयम् तगळिया वार्कडलॆ नेय्याग
वॆय्य कदिरोन् विळक्काग
सॆय्य सुडर् आऴियान् अडिक्के सूट्टिनेन् सॊल् मालै
इडराऴि नीङ्गुगवे ऎन्ऱु
(मुदल् तिरुवन्तादि 1)
अन्बे तगळिया आर्वमे नॆय्याग
इन्बुरुगु चिन्तै इडु तिरिया
नन्बुरुगि ज्ञानच् चुडर् विळक्कु एट्रिनेन् नारणर्कु
ज्ञानत्त् तमिऴ् पुरिन्द नान्
(इरण्डाम् तिरुवन्तादि 1)
तिरुक्कण्डेन् पॊन् मेनि कण्डेन्
तिगऴुम् अरुक्कन् अणि निऱमुम् कण्डेन्
सॆरुक् किळरुम् पॊन् आऴि कण्डेन् पुरि सङ्गम् कैक्कण्डेन्
ऎन् आऴि वण्णन् पाल् इन्ऱु
(मू़न्ऱाम् तिरुवन्तादि 1)
भगवान कि सन्निधी के दरवाजे खोलने से पहिले गाने के श्लोक
दंडवत प्रणाम अर्पित करें और निम्नलिखित श्लोकों का पाठ करें:
अपराध सहस्र भाजनं पतितं भीम भवार्णवोदरे ।
अगतिं शरणागतं हरे कृपया केवलम् आत्मसात्कुरु ॥ (स्तोत्र रत्न – ४८)
न धर्मनिष्ठोऽस्मि न चात्मवेदी न भक्तिमान् त्वच्चरणारविन्दे ।
अकिञ्चनोऽनन्यगतिश् शरण्य त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये ॥ (स्तोत्र रत्न – २२)
जितन्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन |
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुष पूर्वज ||
(जिथन्ते स्तोत्रम् 1)
देवानां दानवानां च सामान्यम् अधिदैवतम् |
सर्वधा चरणद्वन्द्वं व्रजामि शरणं तव ||
(जिथन्ते स्तोत्रम् 2)
कौसल्या सुप्रजा राम! पूर्वा संध्या प्रवर्तते |
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम् ||
(श्री रामायण, श्री वेङ्कटेश सुप्रभातम्)
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द! उत्तिष्ठ गरुडध्वज! |
उत्तिष्ठ कमला कान्त! त्रैलोक्यं मङ्गळं कुरु ||
(श्री रामायण, श्री वेङ्कटेश सुप्रभातम्)
नायकनाय् निन्ऱ नन्दगोपनुडैय
कोयिल् काप्पाने! कॊडित् तोन्ऱुम् तोरण
वायिल् काप्पाने! मणिक्कदवम् ताळ् तिऱवाय्
आयर् सिऱुमियरोमुक्कु अऱैपऱै
मायन् मणिवण्णन् नॆन्नले वाय् नेर्न्दान्
तूयोमाय् वन्दोम् तुयिलॆऴप् पाडुवान्
वायाल् मुन्नम् मुन्नम् माट्रादे अम्मा
नी नेय निलैक् कदवम् नीक्केलोर् एम्पावाय् (तिरुप्पावै – १६)
मारि मलै मुऴञ्जिल् मन्निक् किडन्दुरङ्गुम्
सीरीय सिङ्गम् अरिवुट्रु ती विऴित्तु
वेरि मयिर् पॊङ्ग ऎप्पाडुम् पेर्न्दुदऱि
मूरि निमिर्न्दु मुऴङ्गिप् पुरप्पट्टु
पोदरुमा पोले नी पूवैप् पूवण्णा!
उन् कोयिल् निन्ऱु इङ्गने पोन्दरुळि कोप्पुडैय
सीरिय सिङ्गासनत्तिरुन्दु, याम् वन्द
कारियम् आराय्न्दरुळेलोर् ऎम्पावाय् (तिरुप्पावै २३)
अन्ऱु इव्वुलगम् अळन्दाय्! अडि पोट्रि
सॆन्ऱङ्गुत् तॆन्निलङ्गै सॆट्राय्! तिरल् पोट्रि
पॊन्नच् चगडम् उदैत्ताय्! पुगऴ् पोट्रि
कन्ऱु कुणिला ऎरिन्दाय्! कऴल् पोट्रि
कुन्ऱु कुडैया ऎडुत्ताय्! गुणम् पोट्रि
वेन्ऱु पगै कॆडुक्कुम् निन् कैयिल् वेल् पोट्रि
ऎन्ऱॆन्ऱुम् उन् सेवगमे येत्तिप् पऱै कॊळ्वान्
इन्ऱु याम् वन्दोम् इरङ्गेलोर् ऎम्पावाय् (तिरुप्पावै – २४)
कूर्मादीन् दिव्यलोकान् तदनु मणिमयं मण्टपं तत्र शेषं
तस्मिन् धर्मादिपीठं तदुपरि कमलं चामरग्राहिणीश् च ।
विष्णुं देवीर् विभूषायुधगणम् उरगं पादुके वैनतेयं
सेनेशं द्वारपालान् कुमुदमुखगणान् विष्णुभक्तान् प्रपद्ये ॥
(पुराण श्लोक)
भगवान कि सन्निधी के दरवाजे ३ बार ताली बजाकर खोलना ।
अङ्गण्माञालत्तरशर्, अभिमान
भङ्गमाय्वन्दु निन्पल्लिक्कट्टिल्र्कीले
शङ्गमिरुप्पोर्पोल्वन्दु तलैप्पेय्दोम्
किङ्गिणिवाय्च्चेय्द तामरैप्पूप्पोले
शेङ्गण्शिरुच्चिरिदे येम्मेल्विलियावो
तिङ्गलुमादित्तियनुमेलुन्दार्पोल्
अङ्गणिरण्डुङ्गोण्डेङ्गल्मेल् नोक्कुदियेल
एङ्गल्मेर्चापमिलिन्देलोरेम्बावाय् (तिरुप्पावै २२)
सव्यं पादं प्रसार्य श्रितदुरितहरं दक्षिणं कुञ्चयित्वा
जानुन्याधाय सव्येतरं इतरभुजं नागभोगे निधाय |
पश्चात् बाहुद्वयेन प्रतिभट शमने धारयन् शङ्खचक्रे
देविभूषादि जुष्टो वितरतु भगवान् शर्म वैकुण्ठनाथः ||
(पुराण श्लोक)
पिछले दिन का निर्माल्य हटाते हुए, इस पासुरम का पाठ करें:
उडुत्तुक् कळैन्द निन् पीदग आडै उडुत्तुक् कलत्तदुण्डु
तॊडुत्त तुऴाय् मलर् सूडिक्कळैन्दन सूडुम् इत्तॊण्डर्गळोम्
विडुत्त तिसैक् करुमम् तिरुत्तित् तिरुवोणत् तिरुविऴविल्
पडुत्त पैन्नागणैप् पळ्ळि कॊण्डानुक्कुप् पल्लाण्डु कूऱुतुमे (तिरुप्पल्लाण्डु 9)
मन्त्रासन करें
स्नानासन करें – पुरुष सूक्त, नारायण सूक्त, विष्णु सूक्त, श्री सूक्त, भू सूक्त, नीळा सूक्त, परियाऴ्वार् तिरुमोऴि, वॆण्णॆयळैन्त कुणुङ्गु पदिगम् (दशक) का यथा अवकाश पाठ करें।
अलंकारासन आरम्भ करें।
पहले ये श्लोकम् / पासुरम् का पाठ करें।
गंधद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ (श्री सूक्तम्)
पूसुम् सान्दु ऎन्नञ्जमे पुनैयुम् कण्णि ऎनतुडैय
वाचगं सॆय्मालैये वान्पट्टाडैयुम् अह्ते
तेसमाना अणिकलनुम् ऎन्कैकूप्पुच् चॆय्गैये
ईसन ज्ञालमुण्डुमिऴ्न्द ऎन्दै एकमूर्त्तिक्के ॥
(तिरुवाय्मोऴि 4.3.2)
धूप अर्पण करते समय पाठ किए जाने वाले श्लोकम् / पासुरम्
ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्वतं योऽस्मान्
धूर्वति तं धूर्वयं वयं धूर्वामस् त्वं देवानाम् असि
धूपम् आघ्रापयामि॥ (ऋग्वेदम्)
परिवतिल् ईसनैप्पाडि विरिवदु मेवलुऱुवीर्
पिरिवगै इन्ऱि नन्नीर् तूय् पुरिवदुवुम् पुगै पूवे ॥
(तिरुवाय्मोऴि 1.6.1)
अनध्यान काल में इसे पाठ करें:
परिवतिल् ईसन्पडियै पण्बुडने पेसि
अरियनलन् आराधनैक्कॆन्ऱु
उरिमैयुडन् ओदियरुळ् माऱन् ऒऴिवित्तान् इव्वुलगिल्
पेदैयर्गळ् तङ्गळ् पिऱप्पु ॥
(तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्ताधि 6)
दीप अर्पण करते समय पाठ किए जाने वाले श्लोक / पासुरम्
उद्दीप्यस्व जातवेदोऽपघ्नन् निॠतिं मम ।
पशूगुंस् च मह्यमावह जीवनं च दिशो दिश ॥
(महानारायण उपनिषद्)
वैयं तगळिया, अन्बे तगळिया, तिरुक्कण्डेन पासुरम्
(पहले सम्मिलित)
मङ्गुल् तोय् सॆन्नि वडवेङ्गडत्तानै
कङ्गुल् पुगुन्दार्गळ् काप्पनिवान्
तिङ्गळ् सडैयेऱ वैत्तानुम् तामरै मेलानुम्
कुडैयेऱत् ताम् कुवित्तुक् कॊण्डु ॥
(नान्मुगन् तिरुवन्ताधि 43)
मंत्र पुष्पम/ वेद पाठ आरम्भ में पढ़े जाने मंत्र
हरि: ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं ऋत्विजम् |
होतारँ रत्नधातमम् ||
हरि: ॐ (ऋग्वेद)
हरि: ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्स्थोपायवस्स्थ देवो वस्सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे ||
हरि: ॐ (यजुर्वेद)
हरि: ॐ अग्न आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये |
नि होता सत्सि बर्हिषि ||
हरि: ॐ (सामवेद)
हरि: ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये |
शं यो रभिस्रवन्तु नः ||
हरि: ॐ (अथर्ववेद)
ॐ इति अग्ने व्याहरेत् |
नम इति पश्चात् |
नारायणायेत् उपरिष्टात् |
ॐ इति एकाक्षरम् |
नम इति द्वे अक्षरे |
नारायणायेति पञ्चाक्षराणि |
एतद् वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदम् |
यो ह वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदमध्येति |
अनपब्रव स्सर्वमायुरेति |
विन्दते प्राजापत्यं रायस्पोषं गौपत्यम् |
ततो अमृतत्वम् अश्नुते ततो अमृतत्वम् अश्नुत इति |
य एवं वेद |
इत्युपनिषद् |
अथ कर्माण्याचाराद्यानी गृह्यन्त उदगयन पूर्वपक्षाहः
पुण्याहेषु कार्याणि यज्ञोपवीतिना प्रदक्षिणम् |
इच्छामो हि महाबाहुं रघुवीरं महाबलम् |
गजेन महता यान्तं रामं छत्रावृताननम् ||
तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम् |
बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे || (श्री रामायणं )
तासाम् आविरभूच्छौरिः स्मयमान मुखाम्बुजः |
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान् मन्मथ मन्मथ: || (श्रीमद् भागवतम्)
एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णव निकेतनः |
नाग पर्यङ्कम् उत्सृज्य ह्यागतो मथुरां पुरीम् || (श्रीमद् विष्णु पुराणम्)
वैकुण्ठे तु परे लोके श्रिया सार्धं जगत्पति: |
आस्ते विष्णुर् अचिन्त्यात्मा भक्तैर् भागवतैस् सह || (लिंग पुराणम्)
चॆन्ऱाल् कुडैयाम् इरुन्दाल् सिंगासनमाम्
निन्ऱाल् मरवडियाम् नीळ् कडलुळ् ऎन्ऱुम् पुणैयाम्
अणिविळक्काम् पूम्पतट्टाम् पुल्कुम् अणैयाम्
तिरुमाऱ्-कु अऱवु (मुदल् तिरुवंताधि 53, 2 बार पाठ)
अनध्ययन काल के लिए पासुरम / स्तोत्र
ऎम्पॆरुमानार् दरिसनम् ऎन्ऱे इदऱ्-कु |
नम्पॆरुमाळ् पेरिट्टु नाट्टि वैत्तार् – अम्पुवियोर्
इन्द दरिसनत्तै ऎम्पॆरुमानार् वळर्त्त |
अन्दच् चॆयल् अऱिगैक्का || (उपदेश रत्नमालाइ ३८)
कदा पुनश्शङ्ख रथाङ्ग कल्पक ध्वज अरविन्द अङ्कुश वज्र लाञ्छनम् |
त्रिविक्रम त्वत् चरणाम्बुज द्वयं मदीय मूर्धानम् अलङ्करिष्यति || (स्तोत्र रत्नम् 31)
श्री माधवाङ्घ्रि जलजद्वय नित्य सेवा |
प्रेमा विलाशय पराङ्कुश पाद भक्तम् |
कामादि दोष हरम् आत्म पादाश्रितानाम् |
रामानुजं यतिपतिं प्रणामामि मूर्ध्ना || (यतिराज विंशति )
अर्चना (तुलसी और पुष्प का प्रयोग कर):
ॐ केशवाय नम:
ॐ नारायणाय नम:
ॐ माधवाय नम:
ॐ गोविन्दाय नम:
ॐ विष्णवे नम:
ॐ मधुसूदनाय नम:
ॐ त्रिविक्रमाय नम:
ॐ वामनाय नम:
ॐ श्रीधराय नम:
ॐ हृषीकेशाय नम:
ॐ पद्मनाभाय नम:
ॐ दामोदराय नम:
ॐ श्रियै नम:
ॐ अमृतोद्भवायै नम:
ॐ कमलायै नम:
ॐ चंद्रसोदर्यै नम:
ॐ विष्णुपत्न्यै नम:
ॐ वैष्णव्यै नम:
ॐ वरारोहायै नम:
ॐ हरिवल्लभायै नम:
ॐ शार्ङ्गिण्यै नम:
ॐ देवदेव्यै नम:
ॐ लोकसुंदर्यै नम:
ॐ महालक्ष्म्यै नम:
इसके बाद सेवाकालम् का प्रारंभ करें, जिस में सामान्य तनियन् और जितनी अधिक पासुरम संभव हो उतनी पाठ की जाए।
भोज्यासन
भोग (भोजन) बनाएँ और उसे भगवान, तायार् (श्रीमहालक्ष्मी), आऴ्वार् और आचार्य को अर्पित करें।
भोग भगवान को अर्पित करते समय निम्नलिखित श्लोक/पासुरम् पाठ करें।
कूड़ारै वॆल्लुम् सीर् गोविन्दा ! उन्तन्नैप्
पाडिप् पऱै कॊण्डु याम् पॆऱु सम्मानम्
नाडु पुगऴुम् परिसिनाल् नन्ऱाग
सूडगमे तोळ् वळैये तोडे सॆविप्पूवे
पाडगमे ऎन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्
आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नॆय् पॆय्दु मुऴङ्गै वऴिवार
कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् ऎम्बावाय् (तिरुपावै २७)
नाऱु नऱुम् पॊऴिल् मालिरुञ्जोलै नम्बिक्कु नान्
नूऱु तडाविल् वॆण्णॆय् वाय् नेर्न्दु परावि वैत्तेन्
नूऱु तडा निऱैन्द अक्कारवडिसिल् सॊन्नेन्
एऱु तिरुवुडैयान् इन्ऱु वन्दु इवै कॊळ्ळुङ्गॊलो? (नाच्चियार् तिरुमोऴि 9. 6 )
उलगम् उण्ड पॆरु वाया उलप्पिल् कीर्त्ति अम्माने!
निलवुम् सुडर् सूऴॊळि मूर्त्ति नॆडियाय अडियेन् आरुयिरे!
तिलदम् उलगुक्काय् निन्ऱ तिरुवेङ्गडत्तु ऎम्पॆरुमाने!
कुल तॊल् अडियेन् उन पादम् कूडुमाऱु कूऱाये (तिरुवाय्मोळी 6.10.10)
या प्रीति: विदुरार्पीते मुररिपो कुन्त्यार्पिते याद्वशी
या गोवर्धनमूर्ध्नि या च पृथुके स्तन्ये यशोदार्पिते ॥
भारद्वाजसमर्पिते शबरिकादत्तेSधरे योषिताम्
या प्रीतिर्मुनि पत्नि भक्ति रचितेप्यत्रापि तां तां कुरू ॥ (कृष्ण करणामृतम)
भोग अर्पण के समय:
“अडियेन् मेवी अमरगिन्ऱ अमुदे! आरावमुदे अमुदु सॆयदरुळ वेण्डुम” (4 बार) कहकर भोग अर्पित करें।
अर्थ:
“मैं यह अमृत अर्पित कर रहा हूँ! हे अनंत अमृत (भगवान), कृपया इसे कृपापूर्वक स्वीकार करें।”
आरती (नैवेद्य के पश्चात) पाठ किया जाने वाला श्लोक
तद् विष्णोः परमं पदँ सदा पश्यन्ति सूरयः
दिवीव चक्षुराततम्, तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवाँसस्समिन्धते
विष्णोः यः परमं पदम् (श्री विष्णु सूक्तं)
पर्याप्त्या अनन्तरायाय सर्व स्तोमोऽतिरात्र उत्तम महर्भवति सर्वस्याप्त्यै सर्वस्य जित्यै सर्वमेव तेनाप्नोति सर्वं जयति (श्री विष्णु सूक्तं)
साट्रुमुरै (सात्तुमुरै/मुक्तक श्लोक) करें:
मंगल श्लोक का पाठ करें (भगवान, आण्डाळ् (गोदाम्बा), नम्माऴ्वार् (शठकोप स्वामी), तिरुमङ्गै आऴ्वार् (परकाल स्वामी), रामानुजाचार्य, श्री वरवरमुनि स्वामी और सभी आचार्यों के मंगल श्लोक)।
पूरा सूची देखने के लिए कृपया यहाँ देखें: https://acharyas.koyil.org/index.php/mangala-slokams/
साट्रुमुरै (सात्तुमुरै ) पासुरम का पाठ करें।
“सॆय्य तमरैत् ताळिनै वाऴिये …” (श्रीवरवरमुनि स्वामी का वाऴि तिरुनामम्) का पाठ करें।
“तिरुविरुन्द मलर्त् ताळ्गळ् वाऴिये …” (पॊन्नडिक्काल् जियर् का वाऴि तिरुनामम्) – वानममालै मठ शिष्यगण के लिए।
गुरुपरम्परा वाऴि तिरुनामम् का पाठ करें और उस दिन जिस किसी आऴ्वार्/आचार्य का तिरुनक्षत्र (अवतार दिन) पड़ता हो, उनका वाऴि तिरुनामम् का पाठ करें।
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पर्यङ्कासनम्
पन्नगाधीश पर्यङ्के रमा हस्तोपधानके |
सुखं शेष्व गजाद्रीश सर्वा जागृत जागृत ||
क्षीरसागर तरङ्क शीकरासीकरा, सार तारकित चारु मूर्तये |
भोगि भोग शयनीय शायिने माधवाय मधुविद्विषे नमः || (मुकुंद माला)
साष्टांग दंडवत प्रणाम अर्पित करें और पाठ करें:
उपचारापदेशेन कृतानहरहर्मया |
अपचारान इमान् सर्वान् क्षमस्व पुरुषोत्तम ||
उऱकल् उऱकल् उऱकल् ऒण् सुडर् आऴिये सङ्गे
अऱवॆऱि नान्दक वाळे अऴगिय सार्ङ्गगमे तण्डे
इऱवु पडामल् इरुन्द ऎण्मर् उलोगपालीर्गाळ्!
पऱवैयरैया उऱगल् पळ्ळि अऱै कुऱिक् कॊण्मिन् (पेरियाऴ्वार् तिरुमोऴि ५.२.९)
पनिक्कडलिल् पळ्ळिकोळै पऴगविट्टु
ओडि वन्दु ऎन्
मनक्कडळुल् वाऴ वल्ल माय मणाळ नम्बी!
तनिक् कडले तनिच्चुडरे तनि उलगे ऎन्ऱॆन्ऱु
उनक्किडमाय् इरुक्क ऎन्नै उनक्कु उरित्ताक्किनये (पेरियाऴ्वार् तिरुमोऴि ५.४.९)
दासानुदास सपना रामानुज दासी, दासानुदास केशव रामानुज दास और दासानुदास कन्नन रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2014/12/srivaishnava-thiruvaradhanam-pramanams/
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