श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः
अवतारिका (परिचय)
अब, उन मुमुक्षुओं के स्वरूपों की व्याख्या की गई है जो शास्त्रों के और शास्त्रों के सार के अनुयायी हैं।
चूर्णिका -१९
शास्त्रिगळ् तॆप्पक्करैयरैप्पोले इरण्डैयुम् इडुक्किप् पिऱविक्कडलै नीन्द सारज्ञर् विट्टत्तिलिरुप्पारैप् पोले इरुकैयुम् विट्टुक् करै कुऱुगुम् कालम् ऎण्णुवर्गळ्।
सरल व्याख्या
शास्त्रों का अनुसरण करने वाले उन लोगों के समान हैं जो दोनों हाथों की सहायता से जन्म सागर रूपी नदी को पार करने का प्रयास करते हैं; शास्त्र के सार को जानने वाले लोग उन के समान हैं जो जहाज के ऊपरी हिस्से पर आराम से बैठकर किनारे उतरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
व्याख्यानम् (टीका)
अर्थात्,
शास्त्रिगळ्
उन शास्त्रों का अनुसरण करने वाले जो जलप्रलय के सागर को पार करने और भगवान तक पहुँचने के लिए भगवान की उपासना को ही साधन स्वरूप निश्चित करते हैं, जैसे कि बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है, “आत्मावा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्य: मन्तव्य: निधिध्यासित्व्य:” (हे मैत्रेय! भगवान को सुनना, मनन करना, ध्यान करना और देखना चाहिए), बृहदारण्यक उपनिषद, “आत्मा इत्येव उपासीत” (आत्मा के रूप में स्तुति और पूजा की जानी चाहिए), मुण्डकोपनिषद, “ओम् इति आत्मानं ध्यायत” (भगवान का ध्यान प्रणव के साथ किया जाना चाहिए); शास्त्रानुसार भगवान दाता हैं जैसे मुण्डकोपनिषद में “अमृतस्यैष सेतु:” (भगवान मोक्ष प्रदान करने वाले दाता हैं) और ब्रह्मसूत्रं ३.२.८ “फलमत उपपत्ते:” (यह कथन उचित है कि सर्व लाभ भगवान द्वारा प्रदान किए जाते हैं)।
तॆप्पक्कैयरैप् पोले इरण्डैयुम् इडुक्कि पिऱविक्कडलै नीन्द
जिस प्रकार कोई व्यक्ति नदी पार करने के लिए एक हाथ से नाव को पकड़कर, दूसरे हाथ से चप्पू चलाने का प्रयास करता है, उसी प्रकार संसार रूपी सागर को पार करने का प्रयास स्वयं के प्रयास और भगवान के अनुग्रह के सहारे जैसे तिरुवाय्मोऴि २.८.१ में वर्णित है, “पिऱविक्कडल् नीन्दुवार्क्के” (जो इस भौतिक संसार सागर में इस अस्तित्व को पार करना चाहते हैं) करेंगे।
सारज्ञर्
तिरुमंत्रम् को जानने वाले, जो यह ज्ञात कराता है कि अपने प्रयासों का त्याग करने के पश्चात् भगवान ही एकमात्र उपाय हैं
विट्टत्तिलिरुप्पारैप् पोले इरुकैयुम् विट्टुक् करै कुऱुगुम् कालम् ऎण्णुवर्गळ्।
पार उतरने के लिए नाव पर चढ़ने वाला व्यक्ति स्वयं प्रयास त्यागकर, हाथ से नाव को पकड़ना छोड़कर बाहर की ओर देखेगा कि, “हम कब पार उतरेंगे” और ऊपरी हिस्से पर रहेगा; इसी प्रकार विष्णुधर्म में वर्णित है “विष्णुपोदम्” (विष्णु नाम की नैय्या) वह नैय्या जो दो छोर (वैकुंठ और संसार) तक विस्तृत है जो संसार सागर को पार करने की सहायक है, जैसे नाच्चियार् तिरुमोऴि ५.४ में वर्णित है, “वैगुन्दन् ऎन्बदोर् तोणि” (वैकुंठन् (वैकुण्ठनाथ) नामक नैय्या), भगवान के ज्ञान, योग्यता आदि और स्वयं की पारतन्त्र्यम् (भगवान पर पूर्णाश्रित होना) का ध्यान करके बोझ से मुक्त होकर, जैसे दोनों हाथ छोड़कर मुक्त हो जाना, स्वयं के प्रयास के अनुसार उपासना और उस प्रयास से प्राप्त होने वाली भगवान की कृपा का त्याग करके, केवल भगवान की कृपा को एकमात्र उपाय स्वरूप जानकर, उस क्षण का सोचना कि जब वे भगवद्प्राप्ति के छोर तक पहुँचेंगे, जैसे कि तिरुवाय्मोऴि ६.९.९ “कूविक् कॊळ्ळुम् कालम् इन्नम् कुऱुगादो?” (क्या इस अवस्था में भी मुझे उन दिव्य चरणों में समर्पित होने का समय शीघ्र नहीं आयेगा?) में और तिरुवाय्मोऴि१.२.९ में वर्णित है, “आक्कै विडुम् पॊऴुदु ऎण्णे” (इस जीवन के अन्त में ही कैङ्कर्य की खोज करो)।
इस प्रकार शास्त्र और शास्त्र के सार के ज्ञाता के विचारों का स्पष्टीकरण करके व्याख्या की गई है ।
अडियेन् अमिता रामानुजदासी
आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/13/acharya-hrudhayam-19-english/
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