आचार्य हृदयम् – २१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः

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अवतारिका (परिचय)

आत्मा के सर्वस्वरूप के ज्ञान में दो भिन्न-भिन्न स्तरों का ज्ञान होता है – स्वरूप ज्ञानम् (सत्य स्वरूप का ज्ञान) और स्वरूप यथात्म्य ज्ञानम् (आन्तरिक सत्य स्वरूप का ज्ञान)। उसमें आत्मा के शेषत्वम् (दासत्व) और ज्ञातृत्वम् (ज्ञाता होने से) को नारायण सूक्तम् “पतिम् विश्वस्य” (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी), अच्छिद्रम् “यस्यामि” (मैं भगवान का हूँ) और बृहदारण्यक उपनिषद, न हि विज्ञातुर् विज्ञातेर् विपरिलोभो विद्यते” ( ज्ञानी आत्मा अविनाशी है), बृहदारण्यक उपनिषद में “जानाति ऐवायं पुरुष:” (जिन तत्वों का आत्मा को ज्ञान हो) में दर्शाया गया है; भोक्तृत्व (भोक्ता होने के कारण) का प्रभाव जो भगवद् अनुभव है, ज्ञातृत्व (ज्ञाता होने के कारण) का परिणाम है, जैसे कि तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित है “सोश्नुते सर्वान् कामन् सह ब्रह्मणा विपश्चिता” (आत्मा भगवान के सर्व गुणों का आनन्द उनके साथ रहकर लेता है); ऐसे शास्त्र के माध्यम से स्वयं के स्वरूप को जानने पर, भगवत् शेषत्व (भगवान के प्रति दासत्व) और भगवतानुभव भोक्तृत्व (भगवान का आनन्द लेना) स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है। अपितु जब कोई शास्त्रों के सार में ध्यानमग्न हो जाता है, अर्थात तिरुमन्त्र (अष्टाक्षरी) में, स्वरूप यथात्म्य का स्पष्टीकरण होता है, जो पारतन्त्र्यम् (पूर्ण शरणागत) और भोग्यता (आनन्दपूर्वक) के रूप में है। नायनार् ने इसका स्पष्टीकरण किया कि यह स्वरूप यथात्म्यम् है।

चूर्णिका – २१

शेषत्व भोक्तृत्वङ्गळ् पोलन्ऱे पारतन्त्र्य भोग्यतैगळ्।

सरल व्याख्या –

शेषत्वम् (दास्य भाव) और भोक्तृत्वम् (भोग करने/आनंद लेने वाला) का स्तर पारतन्त्र्यम् (पूर्णाश्रिता) और भोग्यत्वम् (भोग किया जाना) के स्तर के समान नहीं है। (शेषत्वम् और भोक्तृत्व का स्तर कुछ कम है)।

व्याख्यानम् (टीका)

अर्थात् – शेषत्वम् इष्ट विनियोग अर्हता मात्रम् है (इच्छानुसार प्रयोग के लिए तैयार); पारतन्त्र्यम् का अर्थ है शेषी (स्वामी) की इच्छानुसार प्रयोग किया जाना। कथन है, कट्टिप् पॊन् पोले शेषत्वम्, पणिप्पॊन् पोले पारतन्त्र्यम्” (शेषत्वम् एक स्वर्ण दण्ड के समान है, जो उपयोग के लिए तैयार है, पारतन्त्र्यम् स्वर्णाभूषण के समान है जो पहनने के लिए तैयार है)। (इस प्रकार, स्वामी की इच्छानुसार दास का प्रयोग करना ही पारतन्त्र्यम् है)।

भोक्तृत्वम् का अर्थ है ज्ञान के आधार पर आनन्द लेते हुए प्राप्त होने वाला ज्ञानानंद का आनन्द लेना; भोग्यता (भोग्यतै) ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी वस्तु में पाये जाने वाली रुचि, रंग आदि विशेषताएँ केवल आनंद प्राप्तकर्ता के लिए आनन्ददायक हैं। आत्मा में निहित ज्ञान आदि केवल ईश्वर के लिए ही आनन्ददायक होते हैं।

इस प्रकार शेषत्व जो स्वामी की इच्छानुसार प्रयोग होने के लिए तत्पर रहना है, पारतन्त्र्य से भिन्न है जो कि आत्मा को स्वामी की इच्छानुसार सेवा में संलग्न करता है; भोक्तृत्वम्, जिसके भोग में स्वार्थ होता है, भोग्यता से भिन्न है, जो ऐसे भोक्तृत्व को स्वामी के भोगानन्द के लिए एक साधन स्वरूप में उपयोग करता है।

अडियेन् अमिता रामानुज दासी 

आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/15/acharya-hrudhayam-21-english/

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