आचार्य हृदयम् – २२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः

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अवतारिका (परिचय)

नायनार् इस मूलतत्त्व को तिरुमन्त्र में दर्शा रहे हैं (जिसे पिछली चूर्णिका में समझाया गया था) जो स्वरूप याथात्म्य (आत्मा का आंतरिक सच्चा स्वरूप) को प्रकट करता है।

तिरुमन्त्र की संक्षिप्त व्याख्या इस चूर्णिका को सुचारू रूप से समझने में सहायक होगी-

  • तिरुमन्त्र में ३ शब्द हैं – प्रणवम् (प्रणव/ॐ), नमः, नारायणाय।
  • प्रणव के ३ भाग हैं – ‘अकारम्’ (भगवान), ‘उकारम्’ (अनन्यता), ‘मकारम्’ (जीवात्मा)। ‘अकारम्’ के साथ लुप्त चतुर्थी विभक्ति – ‘आय’ है। सरलार्थ यह है – जीवात्मा विशेष रूप से भगवान के लिए ही उपलब्ध है। यहाँ शेष-शेषी संबंध (जीवात्मा और भगवान के मध्य दास और स्वामी का संबंध) का प्रकटीकरण किया है।
  • नमः – ‘न’ + ‘म:’। ‘म:’ के अंत में षष्ठी विभक्ति होती है अर्थात्, “मैं अपने लिए हूँ”। ‘न’ निषेध को दर्शाता है कि, “मैं अपने लिए नहीं हूँ” जो यह प्रकट करता है कि भगवान रक्षक हैं और आत्मा सुरक्षित है। ‘नमः’ को जब एक साथ देखें तो यह आत्मसमर्पण (आत्मा का भगवान के प्रति परतन्त्र होना) का संकेत देता है।
  • नारायणाय – ‘नारायण’ + ‘आय’। नारायण का अर्थ है ‘नार’ + ‘अयन: – जिसके दो अर्थ हैं। १) सभी शाश्वत सत्ताओं का धाम स्वयं भगवान हैं और भगवान ही उनका आश्रय हैं। २) भगवान सभी शाश्वत सत्ताओं में अन्तर्यामी रूप में निवास करते हैं। ‘आय’ जो चतुर्थी विभक्ति है, नारायण की सेवा ही उद्देश्य है इसका प्रकटीकरण करता है।

चूर्णिका -२२

ज्ञान चतुर्थिगळिन् मेलेयिऱे आनन्द षष्टिगळुक्कु उदयम्।

सरल व्याख्या –

प्रणव में ज्ञान जो (प्रणव में ‘मकारम्’ में उपस्थित है) भोक्तृत्व (भोगने वाला है) को दर्शाता है, और प्रणव में लुप्त चतुर्थी विभक्ति (चौथे भाव का गुप्त होना) जो शेषत्व (दास्य भाव) को दर्शाता है, के पश्चात् ‘नारायणाय’ में व्यक्त चतुर्थी विभक्ति (‘आय’ प्रकट है) जिसमें आनन्दम् (आनन्द) निहित है, और ‘नमः’ जो पारतन्त्र्यम् (पूर्ण समर्पण) को दर्शाता है, आते हैं।

व्याख्यानम् (टीका) 

अर्थात् – [प्रणवम् में] ‘मकारम्’ जो निम्नलिखित को सूचित करता है: १) आत्मा, और २) ज्ञान जो धातु (क्रिया का मूल रूप) “मन -ज्ञाने” से जाना जाता है, और जो भोक्तृत्व की ओर ले जाता है – उस ‘मकारम्’ में आनन्दम् जाना जाता है; ऐसा आनन्दम् चतुर्थी (चतुर्थ विभक्ति) में होते हुए, आनन्द का प्रकटीकरण करता है और ‘मकारम्’ के लिए एक विवरण (स्पष्टीकरण) के रूप में है।

[प्रणवम् के] प्रथम अक्षर ‘अकारम्’ का वह भाग जो शेषत्व को दर्शाता है, अर्थात लुप्त चतुर्थी, के पश्चात ‘नमः’ जो पारतन्त्र्यम् को दर्शाता है, यह ज्ञात होता है।

इसके सहित, जबकि आत्मस्वरूप के शेषत्व और भोक्तृत्व पहले से ही विद्यमान हैं, और इसलिए कि पारतन्त्र्य और भोग्यता को अन्ततः आत्मा के आंतरिक, सच्चे स्वरूप के रूप में जाना जाता है, अतः शेषत्वम्/भोक्तृत्वम् और पारतन्त्र्य/भोग्यता में बहुत अंतर है। परंतु, इस दृष्टिकोण में एक छोटी त्रुटि दिखाई देती है। वह इसलिए कि यहाँ (चूर्णिका में) षष्ठी विभक्ति (छठा रूप) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अर्थ से ‘नमः’ को नहीं दर्शाने के कारण, यह प्रश्न आता है कि, “क्या हम षष्ठी विभक्ति (म:) से अंत होने वाले शब्द को षष्ठी नहीं कह सकते?”और प्रत्युत्तर है, “नहीं, यह उचित नहीं है। ‘नमः’ में दो शब्द हैं और दूसरा अन्तिम शब्द ही षष्ठी से समाप्त हो रहा है।” इसके प्रत्युत्तर में जब पूछा जाए, “तब क्या किया जा सकता है?”, तब एक और व्याख्या दी जाती है।

अर्थात् – [प्रणव के] तृतीय अक्षर ‘मकारम्’ से, उसके धातु (क्रिया का मूल रूप), “मन ज्ञाने” में, ज्ञान जो भोक्तृत्व की ओर ले जाता है, दर्शाया जाता है; तत्पश्चात् ‘मकारम्’ की व्याख्या जो ‘नारायणाय’ के साथ चतुर्थी विभक्ति (आय) में है, यह आनन्द (कैङ्कर्य में) की व्याख्या करता है, अतः आनन्दम् दर्शाया जाता है; इस आनन्दम् में, स्वयं के आनन्द की अपेक्षा विद्यमान रहती है और तत्पश्चात् काकाक्षी न्यायानुसार, ‘नमः’ द्वारा समाप्त हो जाती है (जैसे कौवे की आँख सभी दिशाओं में घूमेगी, ‘नमः’ तिरुमन्त्र के सभी शब्दों के साथ जुड़ जाएगी)। (इस प्रकार) प्रथम अक्षर (अकारम्) में लुप्त चतुर्थी (आय) के पश्चात्, जो शेषत्व को दर्शाता है, षष्ठी विभक्ति (म:) को दर्शाता है, यह षष्ठी स्वातंत्र्य (स्वतंत्रता) को प्रकट करती है जो स्वयं की सुरक्षा में स्वयं के प्रयास को प्रकट करती है और तत्पश्चात् “न” (नकार) से समाप्त होती है।

इससे, यह भी समझाया गया है कि – शेषत्व को दर्शाने वाली चतुर्थी विभक्ति (‘नारायणाय’ में ‘आय’) के पश्चात् षष्ठी विभक्ति (मः) जो स्वातंत्र्य को दर्शाती हुई, प्रकट होती है, जो आत्मरक्षा में आत्म प्रयास की ओर ले जाती है; ज्ञान, जो भोक्तृत्वम् को दर्शाता है, ऐसे आनन्दम् की ओर ले जाता है, जिसका उद्देश्य आत्मानन्द प्राप्त करना है। इसलिए शेषत्व और भोक्तृत्व अपने विरोधियों को रहने देंगे; परन्तु ‘नमः’ के माध्यम से पारतन्त्र्य प्राप्त करने के पश्चात् व्यक्ति आत्मरक्षा के प्रयास को त्याग देगा; अन्तिम (चरम) चतुर्थी विभक्ति (‘नारायणाय’ में ‘आय’) में, जो ‘नमः’ से शुद्धि होती है, ज्ञान प्राप्त कर लेने पर कि आत्मा केवल भगवान के लिए आनन्ददायी होनी चाहिए, स्वयं के लाभ की इच्छा समाप्त होने पर कैङ्कर्य में आत्मानन्द की अनुभूति को त्याग देगा; इस प्रकार पारतन्त्र्य और भोग्यता बाधाओं को सहन नहीं करेंगे 

अतः यह ज्ञान होना चाहिए कि पारतन्त्र्य और भोग्यता जो बाधाओं को सहन नहीं कर सकते वे शेषत्व और भोक्तृत्व से महान हैं जो उन बाधाओं को पनपना देते हैं।

अडियेन् अमिता रामानुजदासी 

आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/16/acharya-hrudhayam-22-english/

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