आचार्य हृदयम् – २३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः

 श्रृंखला

<< आचार्य हृदयम् – २२

अवतारिका (परिचय)

इस तर्कानुसार, पारतन्त्र्य आदि जो स्वरूप यथात्म्य ज्ञान अवस्था (स्वयं के आंतरिक वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होना) में दर्शाए गए हैं, उन गुणों के द्वारा स्वरूप ज्ञान अवस्था (स्वयं के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होना) में दर्शाए गए शेषत्व आदि गुणों का छुपाना, यहाँ वर्णित है।

चूर्णिका – २३

मुळैत्तॆऴुन्द सूर्यतुल्य याथात्म्य चरमम् विधियिल् काणुम् प्रथम मध्यम दशैगळैप् पगल् विळक्कुम् मिन्मिनियुम् आक्कुम्।

सरल व्याख्या –

पारतन्त्र्य और भोग्यता की चरम अवस्थाएँ जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप के लिए स्वाभाविक हैं, जो सूर्योदय के समान प्रकाशित है, आत्मा की प्रारम्भिक और माध्यमिक अवस्थाओं को, जो शेषत्व और भोक्तृत्व हैं, दिन के प्रकाश में दीपक और खद्योत (जुगुनु) के समान बना देंगी।

व्याख्यानम् (टीका)

अर्थात् – स्वस्वरूप साक्षात्कार ज्ञान (आत्म साक्षात्कार का ज्ञान) जैसे कि तिरुनेडुन्दाण्डगम् में वर्णित है “मुळैत्तॆऴुन्द तिङ्गळ् तानाय्” (पर्वत पर चन्द्रमा का प्रकट होना और आकाश में उदय होना) और विष्णु पुराण ६.५.६२ में “यथा सूर्यस्तथा ज्ञानम्” (सूर्य तुल्य ज्ञान) कहा गया है; इस प्रकार आत्मा का आंतरिक स्वरूप जो स्वरूप याथात्म्य कहलाता है, पारतन्त्रय और भोग्यता द्वारा इंगित होता है जिसका उल्लेख [तिरुमन्त्र में] अंत में है। आऴ्वार् ने स्वरूप साक्षात्कार ज्ञान के उदाहरण स्वरूप चन्द्रमा को उद्धृत किया है, क्योंकि यह उसके प्रयास के बिना अर्थात् भगवान की कृपा से ही प्राप्त हुआ और प्रसन्नता प्रदान करने वाला है। इस स्थान पर नायनार् वर्णन करते हैं कि स्वरूप याथत्म्य ज्ञान भगवान की कृपा से प्राप्त हुआ है जैसे कि चूर्णिका २० में वर्णित है “उणर्वैप् पॆऱवूर मिगवुणरवुम् उण्डाम्”। यद्यपि “यथा सूर्य:” आत्म प्रयास के कारण वेदना को इंगित करता है, परन्तु यहाँ इसका उद्देश्य यह नहीं है। ज्ञान के उज्जवल स्वरूप का प्रकटीकरण करना ही इस संदर्भ का उद्देश्य है। पारतन्त्रय और भोग्यता की चरम अवस्था जो आत्म-साक्षात्कार ज्ञान की याथात्म्य (आन्तरिक) अवस्था में प्रकाशित हो रहे हैं (शेषत्व और भोक्तृत्व को छिपा देते हैं जो प्रारम्भिक और माध्यमिक अवस्थाएँ हैं)।

जैसे कि चूर्णिका २० में “स्वरूपत्तै उणर्न्दु उणर्न्दु उणर्वुम्” कहा गया था, तिरुक्कुऱुन्दाण्डगम् १८ में जैसे “विधियिल् काण्बार्” (शास्त्रानुसार देखें) कहा है, शास्त्र में निर्देशित विधि के अनुसार, श्रवणम् (सुनना), मननम् (ध्यान करना) आदि के माध्यम से शेषत्वम् जो कि प्रारम्भिक अवस्था है, भोक्तृत्व जो कि मध्यम अवस्था है, देखा गया है। पारतन्त्र्यम् और भोग्यता इन शेषत्वम् और भोक्तृत्व को दिन के समय दीपक और जुगनु के समान ही छिपा लेते हैं, जो दिन में अनुपयोगी हैं जिनके प्रकाश का कोई महत्त्व नहीं है।

प्रणवम् (ओंकार) से उद्भासित वास्तविक स्वरूप की अन्तर्निहित अवस्था के कारण, और तिरुमन्त्र के मध्य और अन्तिम शब्दों में आने के कारण पारतन्त्र्य और भोग्यता को चरम माना गया है।

जबकि पारतन्त्र्य और भोग्यता के आगे वाले दो शब्दों (‘नमः’ और ‘नारायणाय’) में आने से पहले, शेषत्व [प्रणवम् के] प्रथम अक्षर (अ) की (लुप्त) चतुर्थी विभक्ति (आय) में आता है, और प्रणवम् के अन्तिम अक्षर (अर्थात् ‘मकारम्’) में जहाँ शेषत्व का वास है, भोक्तृत्व आता है जिस पर ज्ञातृत्व का प्रभाव है, इसलिए शेषत्व और भोक्तृत्व को प्रारम्भिक और माध्यमिक अवस्था कहा जाता है।

इस प्रकार इस वाक्य से यह स्पष्ट होता है कि यह पारतन्त्र्य और भोक्तृत्व जिनको आत्म भोग  लेष मात्र भी असहनीय है और केवल भगवान के भोग के प्रति ही अनुकूल हैं, और इस प्रकार व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप को स्थापित करेंगे, वे इन तथ्यों का अभाव होनेवाले शेषत्व और भोक्तृत्व को छिपाते हुए, उनके ऊपर ही रहेंगे।

अडियेन् अमिता रामानुजदासी 

आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/18/acharya-hrudhayam-23-english/

प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – https://pillai.koyil.org

Leave a Comment