श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः
अवतारिका (परिचय)
तत्पश्चात्, जैसे कि चूर्णिका १९ “शास्त्रिगळ्..” में वर्णित है, जो प्रवृत्तिपरार् (कर्मों में संलग्न) और निवृत्तिपरार् ([अनावश्यक] कर्मों को त्यागने वाले) कहे गए हैं, जिनके पास क्रमशः स्वरूप ज्ञान और स्वरूप याथात्म्य ज्ञान है ऐसे सुयोग्य पुरुषों को क्या करना चाहिए और क्या त्यागना चाहिए, इसकी व्याख्या की गई है।
चूर्णिका २४
नालिल् ऒन्ऱु प्रवर्तकम् ऒन्ऱु निवर्तकम्।
सरल व्याख्या –
ये चार (शेषत्वम् (दासत्व), भोक्तृत्वम् (भोगने वाला होना), पारतन्त्र्यम् (पूर्ण निर्भरता) और भोग्यता (भोगा जाना)) में से, भोक्तृत्वम् उपाय (साधन) में संलग्न होने के लिए प्रेरित करेगा। भोग्यता उपाय में हमारे प्रयासों को त्यागने की ओर प्रेरित करेगा।
व्याख्यान (टीका)
अर्थात्- इन चारों शेषत्व, भोक्तृत्व, पारतन्त्र्य और भोग्यता में, शास्त्रियों (जो शास्त्रपारङ्गत हैं) ने शेषत्व और भोक्तृत्व को आत्मा के वास्तविक स्वरूप के रूप में जाना है; भोक्तृत्व आत्मा को भगवान का आनन्द प्राप्त करने के लिए उपाय में संलग्न होने को प्रेरित करेगा, यह सोचते हुए “क्या आनन्द लेने वाले को आनन्द के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए?”
सारज्ञ (शास्त्र के सार- तिरुमन्त्र के ज्ञाता) ने स्वरूप याथात्म्य (आत्मा का अन्तर्निहित सत्य-स्वरूप) की अंतर्दृष्टि प्राप्त की है; भोग्यता आत्मा को उपाय से विमुख होने के लिए प्रेरित करेगी, यह विचार करते हुए कि, “ईश्वर भोक्ता होते हुए इस आत्मा की प्राप्ति के लिए उसे स्वयं प्रयास करना चाहिए, जिसका आनंद भी उसे स्वयं ही प्राप्त होगा; जिस आत्मा का आनंद ऐसे भगवान ने ही प्राप्त करना है, तो ऐसे आत्मा को लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु प्रयास करने का कोई अधिकार नहीं है”।
अडियेन् अमिता रामानुजदासी
आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/19/acharya-hrudhayam-24-english/
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