श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४१

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श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक प्रपत्ति की महानता की व्याख्या करते हैं (फल और साधन एक ही होने के आधार पर)।

सूत्रं 

आगैयाले सुख रूपमाय् इरुक्कुम्।

सरल अनुवाद

अतः प्रपत्ति सुखदायक है।

व्याख्या

आगैयाले……

अर्थात् – क्योंकि जो सत्ता साध्य है, वही साधन भी है, अतः यह प्रपत्ति जो ऐसे उपाय की स्वीकृति है, कष्टदायक होने के स्थान पर सुखदायी होगी। 

विकल्पतः – श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक प्रपत्ति की एक और महानता समझा रहे हैं।

 पुल्लै…. (पिछला सूत्र)

अर्थात् – जब घास का उपयोग करके गाय को आकर्षित किया जाता है और उसे वही घास दी जाती है तो साधन (उपायम्) और लक्ष्य (उपेयम्) एक ही होते हैं; इसी प्रकार, जैसा कि स्तोत्र रत्नम् २८ में कहा गया है “सकृत् कृतोऽञ्जलिः” (एक बार अंजलि (हथेलियाँ जोड़कर) की गई पूजा) और महाभारत में “नमश्चक्रुर जनार्दनम्” (अंजलि करके जनार्धन की पूजा), अंजलि आदि के रूप में प्रपत्ती के माध्यम से ईश्वर को आकर्षित करने के पश्चात, उन्हें की गई सेवा जो उन्हें प्रसन्न करती है, वह भी अंजलि आदि जैसे कार्यों को करने के रूप में होती है जैसा कि “बद्धाञ्जलि पुता हृष्टा नम इथेव वादिनः” (जो लोग हाथ जोड़कर प्रसन्न हैं, “नम:” कहते हुए भगवान के प्रति समर्पित हैं) और श्रीसहस्रगीति ३.८.४ “कैगळालारत् तॊऴुदु तॊऴुदुन्नै” (अपने हाथों से आपकी कई बार पूरी तरह से पूजा करता हूँ) में कहा गया है; क्योंकि ये कर्म आत्मा के वास्तविक स्वरूप के अनुरूप हैं इसलिए यहाँ भी साध्य और साधन में कोई अंतर नहीं है। इस प्रकार, क्योंकि साध्य (उपेयम्) और साधन (उपायम्) एक ही हैं यह प्रपत्ती चेतन के लिए कष्टकारी कर्म न होकर सुखदायी होगी।

इस प्रकार सूत्र १३४ “प्रपत्ति उपायत्तुक्कु” से लेकर यहाँ तक प्रपत्ति में दोषों का अभाव और अच्छे गुणों का अस्तित्व समझाया गया है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/25/srivachana-bhushanam-suthram-141-english/

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