आचार्य हृदयम् – २७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः

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अवतारिका (परिचय)

इन दोनों (कर्म, कैङ्कर्य) के लिए प्रेरक यहाँ बताए गए हैं।

चूर्णिका – २७

इवट्रुक्कु विधिराङ्गळ् प्रेरङ्गळ्।

सरल व्याख्या

नियम और इच्छा इनके लिए प्रेरक हैं।

व्याख्यान (टीका)

अर्थात – शास्त्र के नियम जैसे कि यजुर्वेद “यजेत” (यज्ञ करना चाहिए), कर्म मीमाम्सा “जुहुयात्” (हविष्य (आहुति) प्रदान करना) कर्म के लिए प्रेरक हैं। शरणागति गद्यम् में जैसे वर्णित है,अशेष शेषतिक रति”  (एक भी न वर्जित किए, सभी प्रकार की सेवाएँ करने की इच्छा) इच्छा ही कैङ्कर्य के लिए सदैव तत्पर रहने हेतु प्रेरक है। कैङ्कर्य को शरणागति गद्यम् में कहा है, भगवदनुभव जनित प्रीतिकारित” (भगवान का अनुभव करने से उनके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है जो कैङ्कर्य की ओर ले जाता है)। तिरुवाय्मोऴि १०.८.१० में वर्णित है, उगन्दु पणि सॆय्दु” (इच्छापूर्वक कैङ्कर्य में संलग्न हों)।

अडियेन् अमिता रामानुज दासी 

आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/21/acharya-hrudhayam-27-english/

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