श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:
अवतारिका (परिचय)
इसके अतिरिक्त, नायनार् शास्त्र के अर्थों का संक्षिप्त विवरण करते हैं और दयापूर्वक विवरण करते हैं कि कैसे ईश्वर ने अपने दिव्य हृदय में दयालुता से विचार किया कि ऐसे शास्त्रों के अध्ययन के लिए कितने पूर्व-निर्धारित आवश्यकताएँ होती हैं, यह बहुत ही दुर्लभ है, और इसीलिए मार्मिकता से तिरुमन्त्र का प्रकटीकरण किया जो कि ऐसे शास्त्र का सार है जिसके लिए ऐसी पूर्व-निर्धारित आवश्यकता भी अपेक्षित नहीं है, और इसका अध्ययन भी सरल है।
चूर्णिका १६
चतुर्विधमान देह वर्ण आश्रम अधिकार फल मोक्ष साधन गति युग धर्म व्यूह रूप क्रियादिगळै अऱिविक्किऱ पाट्टुप् परप्पुक्कु-पॆरिय तीविनिल् ऒन्बदाम् कूऱुम् मानिडप् पिऱवियुम् आक्कै निलैयुम् ईरिरण्डिलॊन्ऱुम् इळमैयुम् इसैवुम् उण्डाय्, पुगुवरेलुम् ऎङ्गिऱदुक्कुळ्ळे विघ्नमऱ निन्ऱवा निल्ला प्रमादियैक् कॊण्डु अऱक्कऱ्-कै अरिदॆन्ऱिऱे वेदसार उपनिषद् सारतर अनुवाक सारतम गायत्रियिल् मुदलोदुगिऱ पॊरुळ् मुडिवान सुरुक्कैत् तॆय्ववण्डाय् अन्नमाय् अमुदम् कॊण्डवन् शाकैगळिलुम् ओदम् पोल् किळर् नाल्वेदक् कडलिलुम् तेनुम् पालुम् अमुदुमाग ऎडुत्तुप् पॆरुविसुम्बरुळुम् पेररुळाले सिङ्गामै विरित्तदु।
सरल व्याख्या
वेदाध्ययन के लिए जो चतुर्विधा शरीर, सामाजिक विभाजन व व्यवस्था, योग्यता, उपेय, मोक्ष, उपाय, गति, युग (दीर्घ अवधि का निश्चित समयावधि), धर्म, व्यूह, रूप, स्वरूप, कर्मादि का प्रकटीकरण करता है – मनुष्य को भारतवर्ष में जम्बूद्वीप भरतखण्ड में, मनुष्य योनि में, समर्थ शरीर सहित, ब्राह्मण वर्ण में जन्म लेना चाहिए, ऐसे जन्म के पश्चात् भी, मनुष्य का स्थिर विचार होना चाहिए, उसका पूर्ण अध्ययन कठिन है, इसीलिए विष्णु गायत्री के प्रारंभ में नारायण नाम गाया जाता है जो कि नारायण सूक्त में सारतम है (श्रेष्ठतम सार है), जो कि वेदांत का सार है (श्रेष्ठ सार) जो वेद का सार है; तिरुमन्त्र जिसका नाम नारायण है, उसे स्वयं भगवान ने अलङ्कृत किया है, जो हंस के रूप में, मधु, दुग्ध और अमृत के रूप में प्रकट हुए।
व्याख्या (टीका टिप्पणी)
चतुर्विधमान ……
“चार प्रकार के” निम्नलिखित तथ्यों पर लागू होता है, वे हैं-
- देहम् (शरीर) – देव (दैविक), मनुष्य (मानव), तिर्यक (पशु), स्थावर (अचल जैसे पेड़ पौधे आदि)
- वर्ण (समाज का विभाजन) – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
- आश्रम (समाज की व्यवस्था) – ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास
- अधिकार (नैतिक मूल्य) – जैसे कि श्रीमद्भगवद्गीता के ७.१६ अध्याय में वर्णित है, “आर्तो जिज्ञासुर् अर्थार्ती ज्ञानी” (जो धनाभाव के कारण शोकग्रस्त है, जो आत्मानंद बनना चाहता है, जो (नवीन) धन प्राप्त करना चाहता है और जिसको सत्य ज्ञान है)।
- फल (पुरुषार्थ) – धर्म (धार्मिक कृत्य), अर्थ (धन), काम (आनन्द), मोक्ष (मुक्ति)
- मोक्ष (मुक्ति) – सालोक्य (एक ही निजधाम होना), सामीप्य (भगवान के समीप होना), सारूप्य (भगवान के जैसे ही दिखाई देना), सायुज्य (भगवान के साथ एक होकर कैङ्कर्य करना)।
- साधन (उपाय) – कर्म, ज्ञान, भक्ति और प्रपत्ति।
- गति (मार्ग) – गर्भ गति (इस जगत में माता के गर्भ में स्थान ग्रहण करने के लिए मार्ग), याम्य गति (यमलोक की ओर जाने का मार्ग), धूमादि गति (स्वर्गादि पहुँचने का मार्ग), अर्चिरादि गति (श्री वैकुण्ठ पहुँचने का मार्ग) यह सब पञ्चाग्नि विद्या में वर्णित है।
- युग – कृत, त्रेता, द्वापर और कलि।
- युग धर्म (प्रत्येक युगानुसार अनुशंसित अभ्यास) – चार अनुशीलन जैसे ध्यान, यज्ञ (अग्नि यज्ञ), अर्चन (प्रार्थना), संकीर्तन (गायन) जैसे कि श्री विष्णु पुराण ६.२.१६ में वर्णित है, “ध्यान कृते यज्ञ यज्ञै: त्रेतायां द्वापरेर् अर्चयेत् यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्” (कृतयुग में ध्यान करने से जो प्राप्त होता है, त्रेता युग में अर्चना करने से जो प्राप्त होता है, द्वापर युग में यज्ञ करने से जो प्राप्त होता है, वहीं कलयुग में भगवान के नाम संकीर्तन से प्राप्त होता है)।
- व्यूह – वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध।
- रूपम् (रूप) – कृतादि युग में जैसे कि तिरुच्चन्द विरुत्तम् ४४, “पालिनीर्मै सॆम्बॊनीर्मै पासियिन् पसुम्बुऱम् पोलुनीर्मै पॊऱ्–पुडैत् तडत्तु वण्डु विण्डुला नीलनीर्मै ऎन्ऱिवै निऱैन्द काल नान्गुमाय् मालिनीर्मै वैयगम् मऱैत्तदॆन्न नीर्मैये” (दुग्ध का श्वेतपन, स्वर्ण की लालिमा, काई के बाह्य भाग में दिखने वाली ताजगी से भरी हरियाली और सरोवर में भृङ्ग अपने पंख फैलाए हुए तब वैसा घना श्यामल रंग एम्पेरुमान् के दिव्य अङ्ग में दिखाई देते हैं जो क्रमशः कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग इन चारों युगों के नियन्त्रक हैं। कितनी स्तब्ध करने वाली बात है कि इस पृथ्वी के निवासी ऐसी सहजता के प्रति जागरूक नहीं हैं!) में कहा गया है, श्वेत, पीत, श्यामल, गहरा नीला इन रंगों में चार प्रकार के रूप।
- क्रिया (कार्य) – सृष्टि (सृजन), स्थिति (जीविका), संहार (विनाश) और मोक्ष प्रदत्व (मोक्ष प्रदान करना)
अन्ततः आदि शब्द से चार प्रकार के विशेष प्रमेय (उपेय) बताये गये हैं। अन्य चार प्रकार के व्यूह -केशव, नारायण, माधव जो वासुदेव से निर्माण हुए; गोविंद, विष्णु, मधुसूदन जो संकर्षण से उत्पन्न हुए; त्रिविक्रम, वामन और श्रीधर जो प्रद्युम्न से उत्पन्न हुए; ऋषिकेश, पद्मनाभ, दामोदर जो अनिरुद्ध से प्रकट हुए। व्यूह निवास चार प्रकार के होते हैं – आमोद, प्रमोद, सम्मोद, वैकुण्ठ। इस प्रकार, जो नान्मुगन् तिरुवन्दादि ७६ में इस शास्त्र का विस्तृत रूप “पाट्टुम् मुऱैयुम्” (संगीत और गद्य) में वर्णित है, जो चतुर्विधा (चारप्रकार) के विशेष अर्थ बताता है।
पॆरिय तीविनिल्…
पॆरिय तीविनिल् ऒन्बदाम् कूऱुम्
जैसे कि पेरियाऴ्वार् तिरुमोऴि ३.६.१ में वर्णित है “नावलम् पॆरिय तीवु” (प्रमुख जम्बूद्वीप), यह जम्बूद्वीप एक ऐसा स्थान है जहाँ भोग और मोक्ष की प्राप्ति करते हैं, और अन्य महाद्वीपों से विशाल है, जिसके कुल नौ खंडों में, ऐसे कर्म जो स्वर्ग और मोक्ष के उपाय हैं उनके लिए भारतवर्ष ही उन कर्मों में संलग्न होने के लिए उपयुक्त खंड है, एवं यह अन्य खण्डों से भिन्न है जो सांसारिक स्वर्ग के समान हैं और केवल भोग के लिए उपयुक्त हैं। यह नौवां खण्ड है, और देवताओं द्वारा भी सम्मानित है जैसे कि श्रीविष्णुपुराण २.३.२४ में वर्णित है “गायन्ति देवाः खिल कीदकादि धन्यास्तु ये भारत भूमिपाके स्वर्गापवरगास्पद मार्ग भूते भवन्ति भूय: पुरुषास् सुरत्वात्” (देवगण इस प्रकार गाते हैं, भरत खण्डम् स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करने का उपाय होते हुए, जो जन अपने दिव्य जन्म के समाप्त होने के पश्चात् मनुष्य रूप में भरत खंडम् में जन्मे उसका गुणगान किया जाना चाहिए)।
मानिडप् पिऱवियुम्–
मानव जन्म दुर्लभ है जैसे कि श्रीमद् भागवत पुराण में ११.२.२१ वर्णन है “दुर्लभो मानुषो देह:” (मानव जन्म दुर्लभ है) श्रीविष्णुपुराण २.३.२४ “अत्र जन्म सहस्राणाम् सहस्रैरपि सत्तम कदाचित् लभते जन्तु: मानुष्यम् पुण्य संजयत्” (हे श्रेष्ठ मैत्रेय! एक आत्मा पवित्र कर्मों के कारण, सहस्र जन्मों के पश्चात् भारतवर्ष में मानव जन्म लेता है) और तिरुक्कुऱुन्दाण्डगम् ८ में “मानिडप् पिऱवि अन्दो” (मानव जन्म जो दुर्लभ है)।
आक्कै निलैयुम् –
यदि देह की स्थिरता (सुख) हो जिसे सामान्यतः अभावग्रस्त कहा गया है, जैसे कि तिरुवाय्मोऴि १.२.२ में वर्णित है, “मिन्निन् निलैयिल मन्नुयिर् आक्कैगळ्” (ये देह इतनी अनित्य है कि उसकी विद्युत के समान भी स्थायी प्रकृति नहीं है जो एक बार चमक सहित प्रकट होकर लुप्त हो जाती है) और श्रीमद्भागवत पुराण ११.२.२१ में वर्णन है, “मानुषो देहो देहिनाम् क्षणपङ्गुरः” (ऐसी मानव देह क्षण के एक अंश में नष्ट हो जाती है)।
ईरिरण्डिल् ऒन्ऱुम्–
चाहे किसी को मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ हो, यदि वह जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ हो, जो कि शास्त्र ज्ञान प्राप्त करने के लिए अग्रगण्य है, जैसे कि तिरुच्चन्द विरुत्तम् ९० में कहा गया है, “कुलङ्गळाय ईरिरण्डिल् ऒन्ऱु” (चारों वर्णों में से एक)
इळमैयुम्–
यदि युवावस्था हो जैसे श्रीविष्णु पुराण १.१७.७५ में कहता है “तस्मात् बाल्ये विवेकात्मा यदेव श्रेयसे सदा” (अपनी युवावस्था में बुद्धिमान व्यक्ति गौरवशाली गतिविधियों में संलग्न रहने का प्रयास करेगा), जो ज्ञान की कांति को सुगम बनाएगा, जैसे तिरुवाय्मोऴि २.१०.१ में वर्णित है “किळरॊळि इळमै” (ज्ञान और आभा का बढ़ना)
इसैवुम् उण्डाय्-हो जैसे कि पेरिय तिरुवन्दादि में एए किया है, “यानुम् ऎन्नॆञ्जुम् इसैन्दॊऴिन्दोम्” (मैं औ मेरा मन सहमत हुए), क्योंकि किसी भी कृत्य के लिए हृदय में इच्छा होनी चाहिए।
पुगुवरेलुम्–
इन उपर्युक्त सारे विषयों के होने पर भी है जैसे कि तिरुमालै ३, “वेदनूल् पिरायम् नूऱु मनिसर्ताम् पुगुवरेलुम्” (जबकि वेद शास्त्रानुसार लोग सहस्र वर्ष तक जीवित रह सकते हैं) और “शतायुर्वै पुरुष:” (मानव के पास जीवन जीने के लिए सौ वर्ष हैं), यदि ऐसे लोग सौ वर्ष तक जीवित रहे जैसे कि वेदों में वर्णित है।
ऎन्गिऱदक्कुळ्ळे विघ्नमऱ–
उस जीवन काल में शास्त्राभ्यास में कोई विघ्न नहीं आना जैसे कि उत्तर गीता में ७.१० में वर्णित है, “अनन्तपारं, बहुवेदितव्यम् अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः” (असीमित शास्त्र हैं, वे अगणित हैं, परन्तु उनके अभ्यास के लिए यह जीवन काल अल्प है, और विघ्न भी अनेक आते हैं) और “श्रेयांसि बहु विघ्नानि भवन्ति महतामपि” (महात्माओं के ऐसे प्रयासों में भी विघ्न आते हैं) शास्त्राभ्यास में आने वाले विघ्नों से मुक्त हो पाना।
निन्ऱवा निल्ला प्रमादियैक् कोण्डु–
किसी एक विषय पर जो मन क्षणभर भी स्थिर नहीं रहता और मनुष्य को अपने मार्ग से भ्रमित करता है, जैसे कि पेरिय तिरुमोऴि १.१.४ में वर्णित है, “निन्ऱवा निल्ला नेञ्जु” (यह हृदय जो किसी भी विषय पर स्थिर नहीं है) और श्री भगवद्गीता ६.३४ “चञ्चलम् हि मन: कृष्ण प्रमाति बलवत् दृढ़म्” (यह मन स्वभाविकतया डगमगाता है, दृढ़ है, भरमाता है और (हमें सांसारिक सुखों की ओर आकर्षित करने में) दृढ़ता भी रखता है)…
अऱक्कऱ्-कै-
जैसे कि तिरुमालै ७ में कहा है “कलैयऱक् कट्र मान्दर्” (जिस मनुष्य ने किसी शंका के बिना शास्त्रों का गहन अभ्यास किया है) उनके सार को समझने के लिए श्रुति, स्मृति आदि जैसे शास्त्रों का अभ्यास करना
अरिदॆन्ऱिऱे-
ऐसा ज्ञान, सिद्धान्तों पर दृढ़ रहना और सिद्धान्तों को लागू करने के लिए मनस्वी होना बहुत कठिन है जैसे कि पेरिय तिरुवन्दादि ३७ में वर्णित है “आमाऱु अऱिवुडैयार् आवदु अरिदन्ऱे” (क्या सुमार्ग पर अभ्यास करने वाली बुद्धि प्राप्त करना कठिन नहीं है?)
अपने दिव्य हृदय में ऐसा विचार करते हुए कि सुविज्ञ बनना कठिन होगा,
वेद सार उपनिषद् …
जैसे कि वैकुण्ठ दीक्षितियम् में वर्णित है कि, “असारम् अल्प सारञ्च सारं सारतरं त्यजेत्, भजेत् सारतमं शास्त्रं रत्नाकर इवामृतम्” (१.ऐसे शास्त्रों को जो असारम् (जिनका कोई सार नहीं है) हैं, २. वेद के पूर्व भाग, वेदान्त – जो सार हैं और ३. नारायण अनुवाकम् -जो सारतर (श्रेष्ठ सार) हैं इन्हें त्यागना चाहिए; इनमें से व्यक्ति को विष्णु गायत्री जो सारतमम् (श्रेष्ठतम सार) होते हुए क्षीरसागर से अमृत के रूप में है, इसे स्वीकार करना चाहिए), शास्त्रों में जो सारतमम् है उसका ही अनुसरण करने पर बल दिया गया है, नायनार् तिरुमन्त्रम् (अष्टाक्षरम्) की श्रेष्ठतम प्रकृति स्थापित कर रहे हैं जो उपेय है।
वेद सार उपनिषद् –
वेदान्त जो पूर्व भाग का सार है (वेद का वह भाग जो अनुष्ठान और पूजा के विषय में बताता है)। बाह्य शास्त्र (जो वेदों पर आधारित शास्त्रों के बाहर हैं) जो सत्य के विपरीत तथ्यों को प्रकट करें वे सार नहीं है। परन्तु पूर्व भाग सत्य के अनुरूप तथ्यों को प्रकट करता है, तब भी यह श्येन विधि (काला जादू) से लेकर ज्योतिष्टोम आदि तक के विभिन्न तथ्यों को निर्धारित करता है जो इस जगत और उच्चतर जगत के उपेय और उपायों के विषय में बताता है, और वे केवल शास्त्र में विश्वास और देह-आत्मा के मध्य के अन्तर के ज्ञान देते हैं, और निम्न उपेय और उपायों के कारण बनते हैं, इसलिए इसे महत्त्वहीन सार के रूप में जाना जाता है। इसके विपरीत जबकि उपनिषद् ब्रह्म स्वरूप आदि को प्रकट करता है जो अनन्त, स्थायी उपेय और उनके उपाय हैं, अतः इसी भाग को सार कहते हैं।
सारतर अनुवाक-
जबकि उन उपनिषदों में भगवान को परब्रह्म, परतत्व, परञ्ज्योति, परमात्मा, इत्यादि नामों से पुकारा जाता है और विशिष्ट नाम जैसे शम्भू, शिव आदि के माध्यम से सम्बोधित करते हैं, नारायण अनुवाकम् (नारायण सूक्त) जो विशेषतः भगवान पर केंद्रित है, स्पष्टीकरण करता है कि ऐसे भगवान जिनको सामान्य शब्दों और विशिष्ट नामों से संबोधित किया गया है, वे नारायण ही हैं। ऐसा नारायण अनुवाकम् (नारायण सूक्त) सारतर (श्रेष्ठतम सार) है जो भगवान की सर्वोच्चता को स्थापित करते हुए स्पष्टीकरण करता है।
सारतम गायत्री –
इससे अधिक, सर्वेश्वरन् की महत्ता उनकी अन्तरात्मत्वम् (अन्तरात्मा) है; जिससे यह ज्ञात होता है कि, विष्णु गायत्री जो त्रय व्यापक मन्त्रों को (वे मन्त्र जो उनकी सर्वव्यापकता का वर्णन करते हैं- नारायण, वासुदेव और विष्णु मन्त्र) दर्शाता है, अन्य तथ्यों के स्पष्टीकरण करने वाले मन्त्रों से श्रेष्ठ होते हुए, सारतम (सर्वश्रेष्ठ सार) माननीय है।
गायत्रियिल् मुदलोदुगिऱ पोरुळ् मुडिवयान् सुरुक्कै
इस विष्णु गायत्री में, “नारायणाय विद्महे” का सर्वप्रथम अधीरता से पाठ किया जाता है, क्योंकि अन्य व्यापक मन्त्र (वासुदेव और विष्णु) जिनमें व्यापक अर्थ की प्राप्ति के लिए बाह्य तथ्यों से अतिरिक्त संदर्भ की अपेक्षा होती है, उनसे इसकी विशिष्टता है। जैसे कि इरण्डाम् तिरुवन्दादि ३९ में कहा गया है, “ओत्तिन् पॊरुळ् मुडिवुम् इत्तनैये उत्तमन् पेर् एत्तुम् तिऱम् अऱिमिन् एऴैगाळ् ओत्तदनै वल्लीरेल् नन्ऱु अदनै माट्टीरेल् माधवन् पेर् सॊल्लुवदे ओत्तिन सुरुक्कु” (भगवान के दिव्य नामों के संग, जो सभी तत्वों में सर्वश्रेष्ठ हैं, केवल इतना ही स्तुति करना – वेदों का सार है। हे अज्ञान से शक्तिहीन लोगों! यदि आप वेदों के सार को जानने में सक्षम हैं तो जानें; यदि आप अर्थ जानने में सक्षम नहीं हैं, तब श्रीमन्नारायण के दिव्य नामों का जप करना ही वेदों का सार है; इतना तो जान लें।), यह तिरुमन्त्र वेदान्तम् का सार और वेदों का संक्षिप्त रूप है, जैसे कि पञ्चरात्रम् में वर्णित है, “रुचो यजुंशी सामानि तथैव अथर्वणानिच सर्वम् अष्टाक्षरन्तस्तम्” (ऋग्, यजुर्, साम, अथर्वण वेदम् और अन्य शास्त्र अष्टाक्षर में पूर्णतः समाहित हैं)।
दॆय्व वण्डाय्…
तिरुमन्त्र जो सब वेदों का सार है और जैसे कि पेरिय तिरुमोऴि में वर्णित है, “तेनुम् पालुम् अमुदुमाय् तिरुमाल् तिरुनामम्” (श्रीमन्नारायण का दिव्य नाम जो मधु, दुग्ध और अमृत समान है), भगवान द्वारा वेदों से निकाला गया है; नायनार् कृपापूर्वक इसे तीन भिन्न – भिन्न विधियों से समझाते हैं।
दॆय्व वण्डाय्–
अर्थात् – तिरुवाय्मोऴि ९.९.४ “तूवियुम् पुळ्ळुडैत्त तॆय्व वण्डु” (दिव्य भृङ्ग अर्थात् परम भगवान, जिनके पेरिय तिरुवडि (गरुड़) वाहन हैं, जिनके पंख आकर्षक हैं) में भगवान को भृङ्ग नाम से पुकारे जाने के कारण, जिस प्रकार षट्पदम् शाखाओं के बीच से चलकर मधु निकालता है, उसी प्रकार भगवान इस तिरुमन्त्र रूपी मधु को वेद शाखा (वेदों की शाखाओं) से निकालते हैं जो सबका सार है, जो सर्वार्थ को प्रकट करता है, और जो मधु के समान अत्यन्त मीठा है।
अन्नमाय्–
जैसे कि पेरिय तिरुमोऴि में वर्णित है कि, “अन्नमाय् अन्ऱङ्गु अरुमऱै पयन्दान्” (जिस वेद को प्राप्त करना कठिन है भगवान ने उस दिन हन्स के रूप में वेद को प्रकट किया), जबकि वह उस हंस के रूप में हैं जो पानी मिश्रित दुग्ध से दुग्ध अलग कर देता है, वैसे ही तिरुमन्त्र को अलग कर दिया जिसको प्रत्येक व्यक्ति अनुसरण कर सकता है, जैसे कि पेरिय तिरुमोऴि ६.१०.६ “नानुम् सॊन्नेन् नमरुम् उरैमिन्” (मैंने भी पाठ किया; मेरे लोग भी पाठ करें) वेद सागर से, जैसे तिरुवाय्मोऴि१.८.१०में वर्णित है कि, “ओदम् पोल् किळर् वेद नीरने” (जो वेद सागर में उठने वाले ज्वार के सम बोलते हैं।
अमुदम् कॏण्डवन् –
जैसे कि पेरिय तिरुमोऴि ६.१०.३ में वर्णित है, “अमुदम् कॊण्ड पॆरुमान्” (अमृत ग्रहण करने वाले भगवान), देवताओं को असुरों से भय था और अमर होने की इच्छा थी; उनकी रक्षा करने के लिए क्षीराब्धि (दुग्ध सागर) का मंथन किया और अमृत निकाला; उसी प्रकार से, जो लोग जगत से भयभीत हैं परन्तु शाश्वत जीवन जीना चाहते हैं उनकी रक्षा करने के लिए, यह तिरुमन्त्र जो अमृत तुल्य है बहुत मधुर है और विनाश को समाप्त करने वाला है, उसका उसी प्रकार प्रकटीकरण होता है जैसे समुद्र से अमृत निकालते हैं, जैसे पेरियाऴ्वार् तिरुमोऴि ४.३.११ में वर्णित है, “नाल् वेदक् कडल्” (ये चार वेद जो सागर समान हैं)।
अमुदमाग ऎडुत्तुप् पॆरुविसुम्बरुळुम् पेररुळाले सिङ्गामै विरित्तदु
ऐसे, इस तिरुमन्त्र जो वेदसारम् होते हुए इसको स्वयं ही प्रकट करना जैसे कि पेरिय तिरुमोऴि १.४.४ में कहा गया है, “अमरर् पॆरुविसुम्बु अरुळुम् पेररुळाळन् ऎम्पॆरुमान् अणिमलर्क्कुऴलार् अरम्बैयर् तुगिलुम् आरमुम् वारि वन्दु अणिनीर् मणि कोऴित्तिऴिन्द गङ्गैयिन् करैमेल् वदरियाच्चिरामत्तुळ्ळाणे” (हे हृदय! मैं तुझे निश्चित रूप से सलाह देता हूँ तुम्हें जिसे भगवान की महानता का ज्ञान नहीं है। जागृति से मेरे उस दयालु भगवान की स्तुति करो जो भक्तों के भय को दूर कर विशाल शाश्वत आकाश को दे देते हैं, वे गंगा तट पर, जहाँ स्वच्छ सुगंधित पुष्पों से सजे हुए केश वाली अप्सराएँ दुर्लभ रत्नजड़ित गहनों से सुसज्जित हैं आप का निवास स्थान बद्रिकाश्रम है आप ऐसे सर्वेश्वर की स्तुति करें और स्वयं का उत्थान करें, जो नित्यसूरियों के आनन्दवर्धक हैं।), जैसे कि, “नर नारायणराय् उलगत्तु अऱनूल् सिङ्गामै विरित्तवन्” (नर और नारायण होने के नाते उन्होंने सत्य को विस्तृत रूप से प्रकट किया) में वर्णित है कि वे बद्रिकाश्रम में क्रमशः शिष्य और आचार्य के रूप में नर ऋषि और नारायण ऋषि के रूप में अवतरित होना, इस से उन्होंने दृढ़ता से सुनिश्चित किया भगवान के स्वस्वरूप को समझाने वाला शास्त्र विस्तृत जानकारी वाला हो लघु न हो।
अडियेन् अमिता रामानुजदासी
आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/10/acharya-hrudhayam-16-english/
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