तुला मास अनुभव – भूतयोगी आलवार – इरण्डाम तिरुवंतादी

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः यह लेख भूतयोगी आलवार के इरण्डाम तिरुवंतादी के लिए श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा लिखे गए अवतारिका (प्रस्तावना) का सीधा अनुवाद है। श्री कलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा रचयित इन व्याख्यानों को खोजने, उनके प्रकाशन और इन अद्भुत व्याख्यानों पर सुगम तमिल निरूपण प्रदान करने के अथक … Read more

तुला मास अनुभव – सरोयोगी आलवार – मुदल तिरुवंतादी

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः यह लेख सरोयोगी आलवार के मुदल तिरुवंतादी के लिए श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा लिखे गए अवतारिका (प्रस्तावना) का सीधा अनुवाद है। श्री कलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा रचयित इन व्याख्यानों को खोजने, उनके प्रकाशन और इन अद्भुत व्याख्यानों पर सुगम तमिल निरूपण प्रदान करने के अथक … Read more

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ७०

श्रीभट्टार्य का विजय 🔹श्री पराशर भट्टार्य समस्त शिष्योंके साथ श्रीरंग पट्टण के समीप पहुँचे। 🔹एक ब्राह्मण ने उन्हे कहा की अगर वेदान्ति को मिलना है तो समस्त वैभव को त्यागकर एक याचक के रुपमें उनके अन्नक्षेत्र में मिलें। अन्यथा मिलना दुष्कर होगा। 🔹श्री पराशर भट्टार्य याचक के रुपमें वहाँ गये और वेदान्ति से बोले, “मैं … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ६९

श्री भट्टार्य का विजय प्रस्थान 🔹श्री यतिराज रामानुजाचार्य ने वेदान्तसार, वेदान्त दीप, वेदार्थ-संग्रह, श्रीभाष्य, गद्यत्रय आदि अनेक ग्रंथोंकी रचना की। 🔹श्री यतिराज के वैकुण्ठ गमन के पश्चात् श्री पराशर भट्टार्य ने श्री गोविन्दाचार्य की सेवा द्वारा शीघ्र ही उभय वेदान्त का ज्ञान संपादन किया। 🔹श्री पराशर भट्टार्य स्वामीजी को ज्ञात हुवा की पश्चिम दिशा में … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ६८

श्रीयतिराज का वैकुण्ठ गमन 🔹वैकुण्ठ गमन से पुर्व श्री यतिराज ने श्री पराशर भट्ट स्वामीजी को श्रीरंगेश के दास्यसाम्राज्य का राजा बनाया। 🔹श्री रंगनाथ भगवान की सन्निधीमें श्री पराशर भट्टार्य को तीर्थ शठकोप दिलवाकर समस्त श्रीवैष्णवोंको कहा, “ये रंगनाथ भगवान के पुत्र हैं और श्रीवैष्णव दर्शन को बढानेवाले तथा आपके रक्षक हैं।” 🔹तत्पश्चात श्री यतिराज … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ६७

श्रीयतिराज का परमधाम गमन 🔹श्रीरंगम निवासी सभी श्रीवैष्णवोंके पुछनेपर यतिराज ने सबको कर्तव्य का आदेश दिया। 🏼 लोकसुख प्रारब्धाधीन और मोक्षसुख भगवत्संकल्पाधीन होने के कारण दोनों के  विषय में निश्चिन्त रहना चाहिये। 🏼 ऐसे प्रपञ्चोंमें पडनेसे शरणागति व्यर्थ हो जाती है। 🏼 आपलोगोंको मोक्ष का उपाय मानकर कोई कर्म नही करना चाहिये अपितु भगवत् कैंकर्य … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ६६

श्रीभूतपुरी माहात्म्य 🔹श्रीरामानुजाचार्य वैकुण्ठ गमन से ३दिन पुर्व अहर्निश गूढार्थ का उपदेश देते रहे। 🔹यतिराज ने सभी शिष्योंको बताया की उनका ४ दिनमें वैकुण्ठगमन निश्चित है। 🔹सभी शिष्य दु:खी होकर शरीर त्यागनेके लिये तैय्यार होगये तो यतिराजने बताया, “मेरे वियोगमें शरीर त्यागोगे तो पतित होजाओगे” 🔹शिष्य बोले, “हम आपकी सेवाके बिना एक क्षण भी नही … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ६५ श्री यतिराज के द्वारा ७४ वाक्यों का उपदेश 🔹परम ऐश्वर्य सम्पन्न श्रीरामानुजाचार्य के भूमण्डल में रहते हुये १२० वर्ष होगये। 🔹उन्होने जीवनके ६० वर्ष श्रीरंगम में व्यतीत किये। 🔹अब यतिराज ने वैकुण्ठ जाने का निश्चय किया और यह निश्चय भगवान को निवेदन किया। 🔹भगवान ने अनुमति प्रदान की और वर माँगनेको … Read more

प्रपन्नामृत – अध्याय ६४

जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य का प्रभाव 🔹एकबार धनुर्धरदास स्वामीजी बोले “बिभीषण जी स्त्री पुत्र आदि का त्याग करके श्री रामजी की शरणागति किये परंतुु मैंने तो कुछ नही त्याग किया है। मेरी गति कैसे होगी?” 🔹रामानुजाचार्य बोले, “अगर शठकोप स्वामीजी को मुक्ति मिली है, यामुनाचार्य, महापुर्णाचार्य को मुक्ति मिली है तो मुझे मुक्ति मिलेगी। और अगर … Read more