विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २०

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । … Read more

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १९

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ८

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां << पूर्व अनुच्छेद नम्पिळ्ळै एवं एम्पेरुमान् सहित उभय नाच्चियार् 71) भक्तिमानुडैय भक्ति वैदमाय् वरुमतु । प्रपन्नुडैय भक्ति रुचि कार्यमायिरुक्कुम् । भक्तिपरनुक्कु साधनमायिरुक्कुम् । इवनुक्कु देहयात्रा शेषमायिरुक्कुम् ।  भगवद्भक्ति (भगवद्रति) के कारण कृष्ण-तृष्ण-तत्त्वज्ञता से स्तव्य) — नम्माऴ्वार् भक्त की भक्ति भक्ति-योग … Read more

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १८

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ७

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां << पूर्व अनुच्छेद नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि ६१) एम्पेरुमानार् दर्शनस्तरिल् एत्तनैयेणुम् कल्वियिल्लात स्त्रीप्रायरुम् देवतान्तरगळै अडुप्पिडु कल्लोपादियाग निनैत्तिरुक्कुम् श्रीरामानुज दर्शनान्तर्गत अनुयायियों मे, एक अशिक्षित स्त्री (जिसको प्राथमिक शिक्षा भी अप्राप्त हो वह) भी जानती है कि परतत्त्व, परमेश्वर, परब्रह्म श्रीमन्नारायण ही है … Read more

कैशिक माहात्म्य (कैशिक पुराण का माहात्म्य)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद्वरवरमुनये नम: श्रीवानाचल महामुनये नम: यह हिन्दी लेख, ” कथा-सङ्ग्रह ” (सङ्क्षिप्त कथा वर्णन) जो ” कैशिक-महात्म्य ” नामक ग्रन्थ से उद्धृत है जिसका संस्करण श्रीमान् उ.वे. कृष्णस्वामी अय्यङ्गार (जो श्रीवैष्णव सुदर्शन के मुख्य संपादक है) ने किया है । यह वराह-पुराणान्तर्गत कैशिक-पुराण कि कथा का सङ्क्षिप्त वर्णन … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ६

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां << पूर्व अनुच्छेद नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि ५१) मुन्बु मुकम् तोट्ट्राते (तोत्ताते) निन्रानागिलुम् आबत्तु वन्दवारे मुकम् काट्टि रक्षिक्कुमवनायिट्ट्रु (रक्षिक्कुमवनायित्तु) | अवनिप्पडि इरुप्पानोरुवनागैयाले स्वाराधन् | हालांकि बहुत लम्बे समय तक भगवान् प्रकट नही होते व दर्शन नही देते पर जब भी भक्त … Read more

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १७

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां << पूर्व अनुच्छेद नम्पिळ्ळै – तिरुवल्लिक्केणि ४१) अव्यतत्तिनुडैय व्यक्ततदशैयिरे महानागिरतु मूल प्रकृति प्रथम तत्त्व है | ऐसी प्रकृति के तीन गुण हैं : सत्त्व, रजस, तमस | प्रकृति केअव्यक्त स्थिति को अव्यक्त कहते हैं| इस स्थिति मे तीनो गुण (सत्त्व, … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां << पूर्व अनुच्छेद नम्पिळ्ळै – तिरुवल्लिक्केणि ३१)  पिराट्टि अशोकवनैकैयिळे पिरिन्तिरुन्ताप् पोलेयिरुक्किरतु काणुम् स्वरूप ज्ञान् पिरन्तवारे उडम्बुडनिरुक्कुमिरुप्पु चेतन (जीव) को स्वस्वरूप ज्ञान के माध्यम से अपने निज स्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है कि वह भगवान् और भागवतों का … Read more