श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
जब पूछा गया कि “यद्यपि ये अन्य उपायों को विशिष्ट विधियों में विश्वास उत्पन्न करने के लिए निर्धारित किए गए हैं और पश्चात निषिद्ध किए गए हैं, यदि हम उपासना पर अड़े रहे तो क्या यह अभिचार कर्म के समान क्रूर नहीं है?” श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “यह अभिचार कर्म पर अड़े रहने से भी अधिक क्रूर है”।
सूत्रं – १३२
अदु तोल् पुरैये पोम्; इदु मर्म स्पर्शि।
सरल अनुवाद
वह [अभिचार कर्म] त्वचा के स्तर [शारीरिक स्तर] तक जाएगा; यह [भक्ति योग] गहराई तक [आत्मा तक] प्रवेश करेगा।
व्याख्या
अदु …
वह अभिचार कर्म जो दूसरों को हानि पहुँचाने के रूप में है, देहात्माभिमानी (जो शरीर को ही आत्मा समझने की भूल करता है) का कर्म है जो शरीर में स्थित आत्मा के लिए एक बाधा है और इसका परिणाम सीमित दुःख होगा जो शरीर को हानि पहुँचाने के बाद चला जाएगा। इसी कारण इसे तोल् पुरैये पोम् (केवल शरीर को हानि पहुँचाना) कहा गया है।
यह उपासना जिसमें अहंकार (स्व-प्रयास) है उस व्यक्ति का कार्य है जिसने स्वयं को जान लिया है और यह सीधे आत्मा के लिए एक बाधा है और भगवान पर पूर्णतः निर्भर होने के वास्तविक स्वरूप को नष्ट कर देगा। इसलिए इसे मर्म स्पर्शि (जो गहराई तक प्रवेश करता है) कहा गया है।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/16/srivachana-bhushanam-suthram-132-english/
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