श्रीवचनभूषण – सूत्रं १३८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:

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अवतारिका

जब उनसे पूछा गया कि “यद्यपि वह (भगवान) पूर्ण है क्या उसकी पूर्णता चेतन को यह सोचकर पीछे हटा देगी कि ‘हम अपनी शून्यता के कारण उन्हें कभी प्रसन्न नहीं कर सकते’?”  तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक समझाते हैं।

सूत्रं-१३८

पूर्ति कैवाङ्गादे मेल् विऴुगैक्कु हेतु इत्तनै।

सरल अनुवाद

उनकी सम्पूर्णता ही चेतना के लिए भगवान से विमुख होने के स्थान पर उनका अनुसरण करने का कारण है।

व्याख्या

पूर्ति

अर्थात् – उसका अवाप्तसमस्तकामत्वम् (किसी भी अपूर्ण इच्छा का न होना) चेतन को, जो भगवान के प्रति समर्पण करने में तत्पर है, यह सोचने पर विवश कर देगा कि “वह इतना पूर्ण है कि उसे हमारे द्वारा अर्पित की गई वस्तु से संतुष्ट होने की आवश्यकता नहीं है अपितु हम जो कुछ भी अर्पित करते हैं उससे वह प्रसन्न हो जाएगा” और वे बड़ी उत्सुकता के साथ उसका अनुसरण करेंगे न कि, यह सोचकर कि “हम उसे कभी प्रसन्न नहीं कर सकते”, ऐसे समर्पण से पीछे हटेंगे।

वैकल्पिक व्याख्या। 

जब उनसे पूछा गया कि “क्या उसकी पूर्णता उसे इस माध्यम से सुखी होने देगी? क्या यह उसे चेतन के प्रति उदासीन नहीं बनाएगी और उससे विमुख नहीं कर देगी?” श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं।

पूर्ति……

अर्थात् – उसकी पूर्णता उसे चेतन को आनंद से स्वीकार करने के लिए प्रेरित करेगी, यह सोचते हुए कि “इस चेतन को मेरे प्रति अनुकूल होने के अतिरिक्त मेरे लिए और क्या करना यह गया है?”, और न कि वह चेतना को स्वीकार करने से पीछे हट जाए यह सोचते हुए कि “उसने मुझे [मेरी महानता के समान] कुछ भी नहीं दिया है ।”

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/22/srivachana-bhushanam-suthram-138-english/

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