श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक उस जन्म में ऐसी कमियों के न होने के विषय में बताते हैं जो पहले बताए गए जन्म के सर्वथा विपरीत है।
सूत्रं – २१४
अपकृष्टमाग भ्रमित्त उत्कृश्ट जन्मत्तुक्कु इरण्डु दोषमुम् इल्लै
सरल अनुवाद
उत्तम जन्म, जिसे भ्रान्तिवश हीन जन्म मान लिया जाता है, उसमें ये दोनों दोष नहीं होते।
व्याख्या
अपकृष्टमाग …
ऊँचे कुल में जन्म लेने से जो अहंकार उत्पन्न हो सकता है, उसके अतिरिक्त नीच कुल में जन्म लेना सेवा-भाव के लिए अनुकूल होता है। इसलिए वास्तव में श्रेष्ठ जन्म को नीच मान लेना अतस्मिंस्तद् बुद्धि (जो श्रेष्ठ नहीं है उसे श्रेष्ठ समझ लेने की भ्रान्ति) है। इसी बात को समझाने के लिए श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी “अपकृष्टमाग भ्रमित्त उत्कृष्ट जन्मम्” कहते हैं।
इरण्डु दोषमुम् इल्लै
इसमें वे दो कमियाँ नहीं हैं – अर्थात् पतन का भय और विनम्रता का आडम्बर; क्योंकि विनम्रता तो आत्मा का स्वाभाविक गुण है।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/09/08/srivachana-bhushanam-suthram-214-english/
संगृहीत- https://granthams.koyil.org/
प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – https://pillai.koyil.org