श्रीवचन भूषण – सूत्रं १३६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:

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जब पूछा गया कि “क्या कोई पूर्णतः इस बात पर विश्वास रख सकता है कि वह ही उपाय (साधन) है और आत्म-प्रयत्न से विमुख रह सकता है? क्या चेतन को भगवान को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी नहीं करना चाहिए?”  श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी  कृपापूर्वक समझाते हैं।

सूत्रं १३६

पूर्ण विषयम् आगैयाले पॆरुमैक्कीडागप् पच्चैयिड को ऒण्णादु।

सरल अनुवाद


क्योंकि भगवान स्वाभाविक रूप से पूर्ण हैं, इसलिए कोई भी उनकी महानता के अनुरूप उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ नहीं कर सकता।

व्याख्या

पूर्ण विषयम्…….

अर्थात् – इस संसार में जब कोई किसी को प्रसन्न करने का प्रयास करता है तो वह दूसरे व्यक्ति की महानता के अनुरूप वस्तुएँ अर्पित करता है; यहाँ भी उसे भगवान के अनुरूप वस्तुएँ अर्पित करनी चाहिए। क्योंकि वे अवाप्तस्तकामत्वम्  (जिनकी कोई भी इच्छा अधूरी नहीं है) के कारण पूर्ण हैं, इसलिए कोई भी ऐसे भगवान को उनकी महानता के अनुरूप प्रसन्न करने के लिए कुछ भी नहीं कर सकता।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/20/srivachana-bhushanam-suthram-136-english/

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