श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:
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अवतारिका
जब पूछा गया कि “क्या भगवान के सुलभता से संतुष्ट होने के लिए कोई प्रमाण (शास्त्रों में प्रमाण) है?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने तदपश्चात समझाया।
सूत्रं – १३९
“पत्रं पुष्पम्”, “अन्यत् पूर्णात्”, “पुरिवदुवुम् पुगै पूवे”
सरल अनुवाद
श्रीभगवद्गीता ९.२६ “पत्रं पुष्पं…” (पत्ती, पुष्प आदि प्रेम से अर्पित किए जा सकते हैं), महाभारत “अन्यत् पूर्णात्” (क्योंकि वह पूर्ण है, उसे कुछ भी अपेक्षित नहीं होगी), श्रीसहस्रगीति (तिरुवाय्मोऴि) १.६.१“पुरिवदुवुम् पुगै पूवे” (कोई भी धूम्र या पुष्प चढ़ा सकता है)
व्याख्या
पत्रम् पुष्पम्……..
भगवान श्री भगवद्गीता ९.२६ में स्वयं भगवान ने दयापूर्वक कहा है “पत्रं पुष्पं फलम् तोयम् यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहम् भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः।।” (जो व्यक्ति प्रेमपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है मैं उस शुद्ध हृदयवाले व्यक्ति द्वारा प्रेमपूर्वक समर्पित ऐसी सामग्री को स्वीकार करता/पाता/भोगता हूँ) – यदि कोई शुद्ध हृदय से बदले में कुछ न चाहने वाला, पत्र, फल या जल अर्पित करता है तो मैं, जिसकी कोई अपूर्ण इच्छा नहीं है, महान प्रेम से उत्पन्न मोह के साथ उसे स्वीकार करता हूँ जैसे वह महान भक्ति से उत्पन्न मोह के साथ सामग्री अर्पित करेगा।
संजय ने महाभारत में कहा है – “अन्यत् पूर्णात् अपां कुम्भात् अन्यत् पादावने जनात्। अन्यत् कुशल सम्प्रश्नात् नचेच्छति जनार्दनः।।” अर्थात् – भगवान जनार्दन को किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती, सिवाय एक जल से भरे घड़े की (अतिथि के लिए शीतल जल देना), उनके चरणों को धोने मात्र के (अतिथि-सत्कार के रूप में) और स्नेहपूर्वक उनका कुशल-क्षेम पूछना। वे इससे बढ़कर कुछ नहीं चाहते। जब कृष्ण शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर आ रहे थे, तब धृतराष्ट्र ने सोचा – “कृष्ण पाण्डवों का पक्षपाती है, अतः हम उन्हें राज्य और धन देकर अपनी ओर कर सकते हैं।” संजय ने धृतराष्ट्र के मन और वाणी के इस विरोध को भली-भाँति समझ लिया और कहा – “कृष्ण वैसे नहीं हैं जैसा आप सोचते हैं। वे सोने-राज्य आदि में किंचित भी रुचि नहीं रखते। वे तो केवल यही अपेक्षा करते हैं — जब वे यहाँ आएँगे तो एक घड़ा जल का उनके लिए रखा जाए; सामान्य शास्त्र-विधान के अनुसार उनके चरणों का अभिषेक (पाद-प्रक्षालन) किया जाए; और दूर से आए अतिथि के प्रति जैसे स्नेहपूर्वक कुशल-क्षेम पूछी जाती है वैसा ही उनसे पूछा जाए। इससे अधिक वे कुछ अपेक्षा नहीं रखते।” इस प्रकार संजय ने अप्रत्यक्ष रूप से धृतराष्ट्र से कहा – “आप जिस राज्य और स्वर्ण को उन्हें देने का सोच रहे हैं, क्या वह बात कृष्ण के लिए मूल्यवान होगी? यदि करना ही है तो केवल इतना ही करें कि उनका आदर प्रेमपूर्वक प्रकट हो।”
“परिवदिल् ईसनैप् पाडि विरिवदु मेवल् उऱुवीर् पिरिवगै इन्ऱि नल् नीर् तूय् पुरिवदुवुम् पुगै पूवे” (ओह, जो लोग सभी अशुभ गुणों के ठीक विपरीत सर्वेश्वर की महिमा का गान करने में दृढ़ विश्वास रखते हैं, और स्वयं का स्वाभाविक विकास (आत्म-साक्षात्कार) प्राप्त करते हैं! भगवान से दूर जाने के विपरीत (अपनी इच्छाओं की पूर्ति के पश्चात), केवल शुद्ध जल अर्पित करें (भले ही अनियमित रूप से परंतु प्रेम के साथ) और कुछ धूप और पुष्प अर्पित करें) – आऴ्वार् ने इस पाशुर में भगवान के सहज पूजनीय स्वभाव को बहुत स्पष्ट रूप से समझाया। अर्थात् – हे जो लोग संसार से मुक्ति पाना चाहते हैं, वे भगवान का आनंद लें और तैतिरीय उपनिषद् के अनुसार ”ऐतत् साम् ज्ञान्नास्ते” (वे भगवान के प्रति प्रेम और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के कारण साम वेद का गान करते रहते हैं) गाएँ! भगवान को त्यागने के विपरीत, स्वयं में कमियों का विचार करते हुए, किसी भी प्रकार से सादा जल का उपयोग करें और उन्हें उदारतापूर्वक धूप (अगरबत्ती) और पुष्प अर्पित करते हुए उनकी पूजा करें। यही उनसे अपेक्षित है।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/23/srivachana-bhushanam-suthram-139-english/
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