श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
सूत्रं १३६ “पूर्ण विषयम्” से लेकर यहाँ तक, अतिरिक्त जानकारी दी गई है, किन्तु इससे पहिले प्रपत्ती की महानता का वर्णन किया जा चुका है। अतः प्रपत्ती की एक और महानता समझाने के लिए श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वमीजी कृपापूर्वक सिद्धोपाय (भगवान को साधन के रूप में) और फलम् (लक्ष्य) की समानता पर प्रकाश डाल रहे हैं।
सूत्रं – १४०
पुल्लैक् काट्टि अऴैत्तुप् पुल्लै इडुवारैप्पोले, फल साधनङ्गळुक्कु भेदम् इल्लै।
सरल अनुवाद
जिस प्रकार लोग घास दिखाकर गाय को आकर्षित करते हैं और पश्चात उसे वही घास खिलाते हैं उसी प्रकार साध्य और साधन में कोई अंतर नहीं है।
व्याख्या
पुल्लैक् काट्टि…
अर्थात् – जो लोग गाय को लाना चाहते हैं और उसे पालने वाले पदार्थों को खिलाकर उसकी रक्षा करना चाहते हैं, वे गाय के लिए जो घास आनन्ददायक है उसे गाय को आकर्षित करने वाले रूप में उपयोग करेंगे, उसे अपने निकट लाएँगे और उसे खिलाएँगे – इसलिए लक्ष्य और साधन में कोई अंतर नहीं है; इसी प्रकार भगवान, जिनके विशिष्ट गुण और रूप हैं, वे पहिले चेतन को स्वीकार करने के साधन के रूप में रहते हैं और चेतन के लिए सदैव लक्ष्य के रूप में भी रहेंगे; इस प्रकार लक्ष्य और साधन एक ही रहते हैं।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/24/srivachana-bhushanam-suthram-140-english/
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