श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः
अवतारिका (परिचय)
वे जन (शास्त्री जो शास्त्र में पारङ्गत हैं) और सारज्ञों (शास्त्र के सार के ज्ञाता) द्वारा इन अवस्थाओं (स्वयं का प्रयास सहित भगवान की कृपा पर निर्भर रहने की अवस्था, और भगवान पर पूर्णाश्रित रहने की अवस्था) को प्राप्त करने के कारण यहां समझाते हुए कहा गया है।
चूर्णिका -२०
इवै स्वरूपत्तै उणर्न्दु उणर्न्दु उणरवुम् उणरवैप् पेऱवूर मिगवुणरवुम् उण्डाम्।
सरल व्याख्या
शास्त्रज्ञ, क्रमानुसार आगे बढ़ते हुए, स्वयं के प्रयास और भगवान की कृपा पर आश्रित रहेंगे; सारज्ञ, भगवान की कृपा से सत्य का ज्ञान होते ही उसी कृपा पर पूर्णाश्रित रहेंगे।
व्याख्यानम् (टीका)
इसका अर्थ है – जैसे कि तिरुवाय्मोऴि१.३.६ में वर्णित है, “उणर्न्दु उणर्न्दु इऴिन्दु अगन्ऱु उयर्न्दु उरुवियन्द इन् निलैमै उणर्न्दु उणर्न्दु उणरिलुम्” (जबकि जीवात्मा स्वभावतया ज्ञानी है और वह ज्ञान अपने असीमित शुद्ध अवस्था में और सर्व दिशाओं में विस्तृत रूप में फैला है, इसलिए श्रवण और ध्यान करने से आत्मा का देह से भिन्न होना समझा जा सकता है। भले ही सिद्ध हो जाये), शास्त्रज्ञों के लिए, श्रवण और ध्यान के माध्यम से आत्मा के सच्चे स्वरूप को देखने से, जो कि उसके न केवल ज्ञानी होना, बल्कि, १)शाश्वत ज्ञान से परिपूर्ण होना, २) उस ज्ञान को पूर्ण देह को व्याप्त करना, ३) देह से भिन्न होना, ४) ज्ञानी होने के कारण कर्त्ता और भोक्ता होना और ५) भगवान पर अधीन होना, इसके उपरांत प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के पार जाने का स्वयं प्रयास करेगा।
सारज्ञों के लिए, आत्मा के सर्वस्वरूप की महानता का प्रकटीकरण करने के लिए जैसे तिरुवाय्मोऴि ८.८.३ में कहा गया है कि, “उणर्वुम् उयिरुम् उडम्बुम् मट्रुलप्पिलनवुम् पऴुदेयाम् उणर्वैप् पॆऱ ऊर्न्दु” (उनसे मुझे यह ज्ञात हुआ कि “वे सारे ज्ञान जो कर्मों, पाँच प्रकार के प्राणों, विभिन्न प्रकार की देहों, महत्, अहंकार और इन्द्रियों के रूप में हैं, सभी का त्याग करना है”, विशिष्ट आत्मा तक पहुँचकर मेरी चेतना और बुद्धि को प्राप्त करना है), जैसे ईश्वर सांसारिक तत्वों, प्राण, वायु, देह, प्रकृति (आदिम पदार्थ) के अकल्पनीय परिवर्तनों के ज्ञान को त्यागने का ज्ञान प्राप्त करने की व्यवस्था करते हैं, जैसे कि तिरुमालै ३८ “मॆय्म्मैयै मिग उणर्न्दु” (सत्य को स्पष्ट रूप से जानकर), मनुष्य को आत्मा के सर्वस्वरूप का ज्ञान हो पाता है, जो है कि आत्मा देहादि से विमुख होकर, ज्ञान और आनन्द का साकार रूप धारण करके, ज्ञान आदि सब इसके गुण होते हुए, भगवान के प्रति अधीनता रखकर, और ऐसी अधीनता की चरमावस्था पहँचकर अर्थात भागवतों के प्रति अधीनता रखकर पूर्णाश्रित होता है; तब मनुष्य अपना भार पूर्णतः भगवान पर सौंपकर स्वयं के प्रयासों से मुक्त हो जाएगा।
इससे यह स्पष्टीकरण हुआ कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने में जो भिन्नता है, वहीं उनकी विभिन्न अवस्थाओं का कारण है।
इस प्रकार चूर्णिका १७, “मुनिवरै इडुक्कियुम्” से लेकर यहाँ तक, शास्त्र और उसके सार के सम्बन्ध में, लक्ष्य में, योग्य मनुष्य और उनकी समझ में, और ऐसी अवस्थाओं के कारण में, जो कि सच्चे स्वरूप के ज्ञान में भिन्नता है, इन सब में भिन्नताओं की व्याख्या की गई है।
अडियेन् अमिता रामानुजदासी
आधार – https://granthams.koyil.org/2024/03/14/acharya-hrudhayam-20-english/
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