श्रीवैष्णव दैनिक दिनचर्या

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में एक अनुशासित और मानक दिनचर्या का पालन करना चाहिए। प्रत्येक गतिविधि केवल हमारे सम्प्रदाय पर ही केंद्रित होनी चाहिए।

  • जागना
    • प्रातः लगभग 4:30 बजे उठना चाहिए
    • गुरु-परंपरा मंत्र तथा “हरिः” का सात बार जप करें
    • हाथ-पैर धोकर मुख शुद्ध करें
    • परत्वादि पंञ्चकम्, परमार्थ श्लोक द्वयम्, गजेन्द्र मोक्ष द्वयम् श्लोकों का पाठ करें
    • कम से कम कुछ मिनटों तक गुरु-परंपरा और द्वय महा मंत्र का ध्यान करें
  • प्रातःकालीन दिनचर्या
    • प्रातः की आवश्यक क्रियाएँ पूर्ण करें (दन्तमंजन करना आदि)
    • स्नान – “गङ्गैयिल पुनिदमाय”, “निन्ऱ वण् कीर्त्ति”, “कदा पुनश्चङ्क”, आचार्य तनियन् (आचार्य ध्यान श्लोक) का पाठ करें
    • ऊर्ध्व पुंड्रम – “केशव” आदि भगवान के द्वादश नाम तथा “श्रीः” आदि श्रीमहालक्ष्मी (पिराट्टि/तायार्) के द्वादश नामों का जप करें
    • गुरु-परंपरा मंत्र, तिरुमंत्र (अष्टाक्षर मंत्र), द्वयम्, चरम श्लोक का पाठ करें
    • सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्य (ओराण वऴि आचार्य) के ध्यान श्लोकों (तनियन्) तथा हमारी आचार्य परंपरा के ध्यान श्लोकों का पाठ करें
    • संध्या वंदनम् (जिनके पास यज्ञोपवीत है उनके लिए)
    • तिरुवाराधनम् – चरण 1
      • जल, सुगंधित चूर्ण, पुष्प, धूप, दीप आदि सज करें
      • दीप जलाते समय “वैयम् तगळिया”, “अनबे तगळिया”, “तिरुक्कण्डेन्”, “मङ्गुल् तोय सॆन्नि” पासुरों का पाठ करें
      • आचार्य श्रीपाद अमृत (जल) सज कर उसका ग्रहण करें
      • सन्निधि के सामने साष्टांग प्रणाम करें
      • तीन बार ताली बजाकर पश्चात सन्निधि (मंदिर/पूजा स्थान) का द्वार खोलें।
      • इसके बाद “नायगनाय् निन्ऱ”, “तिरुप्पळ्ळियेऴुच्चि”, “मारि मलै मुऴञ्जिल्”, “अन्ऱु इव्वुलगम्” और “अङ्गण्मा ज्ञालत्तु” पाशुरों का पाठ करें।
      • मंत्रासनम् करें
  • भोजन तैयार करें
  • संदै (अध्ययन), पासुरम्/स्तोत्रम्/रहस्य ग्रंथों का अभ्यास, तथा प्रवचन सुनना किया जा सकता है
  • मध्याह्न/दोपहर की दिनचर्या
    • माध्याह्निकम् (जिनके पास यज्ञोपवीत है उनके लिए)
    • तिरुवाराधनम् – चरण 2
      • स्नानासनम् – पंच सूक्तों का यथासंभव पाठ करें (जिनके पास यज्ञोपवीत है)। “वॆण्णॆय अळैन्द कुणुङ्गुम्” का पाठ करें
      • अलंकारासनम् – धूप, दीप, वेद आरंभ (जिनके पास यज्ञोपवीत है), अर्चन करें
      • नित्यानुसंधानम् का पाठ या ४००० (आऴ्वार् तिरुनगरी क्रम) का पाठ करें
      • भोज्यासनम्
      • पुनः मंत्रासनम्
      • मंगल आरती
      • साट्ट्रुमुरै, तीर्थ वितरण
      • अनुयागम् – अतिथियों के लिए तदीयाराधनम् (अतिथियों का भोजन सत्कार)
  • परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें
  • संदै (अध्ययन), पासुरम्/स्तोत्रम्/रहस्य ग्रंथों का अभ्यास, तथा प्रवचन का श्रवण किया जा सकता है
  • सायंकालीन दिनचर्या
    • सायं संध्या वंदनम् (जिनके पास यज्ञोपवीत है उनके लिए)
    • तिरुवाराधनम् – चरण 3
      • दीप जलाते समय “वैयम् तगळिया”, “अनबे तगळिया”, “तिरुक्कण्डेन्”, “मङ्गुल् तोय सॆन्नि” पासुरों का पाठ करें
      • सहस्रनामम्, पूर्वाचार्य स्तोत्रम् का पाठ करें तथा साट्ट्रुमुरै करें
      • पर्यंकासनम् (शयन)
      • सन्निधि को बंद करें
    • परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें
    • संदै (अध्ययन), पासुरम्/स्तोत्रम्/रहस्य ग्रंथों का अभ्यास, तथा प्रवचन श्रवण किया जा सकता है
    • यदि संभव हो तो समान विचारधारा वाले भक्तों के साथ सत्संग में सम्मिलित हों
  • रात्रि
    • परिवार के सदस्यों के साथ संप्रदाय संबंधी विषयों पर चर्चा करेंअधिकतम रात्रि १० बजे तक विश्राम/नींद के लिए जाएँ

टिप्पणियाँ:

  • जिनके पास यज्ञोपवीतम् नहीं है, वे स्वयं को दिव्यप्रबन्ध पासुरों, पूर्वाचार्य स्तोत्रों और रहस्य ग्रंथों के अध्ययन एवं पाठ तक सीमित रखें। आवश्यकता अनुसार इस विषय में बड़ों से मार्गदर्शन ले सकते हैं।
  • अनध्ययन काल में दिव्यप्रबन्धों का पाठ नहीं करना चाहिए। इस समय पूर्वाचार्य स्तोत्रों और रहस्य ग्रंथों पर ध्यान केंद्रित करें।
  • यद्यपि यह संकलन सामान्यतः पुरुष भक्तों के दृष्टिकोण से किया गया है, तथापि महिला भक्तों को भी अपनी घरेलू उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए इस दिनचर्या में सहयोग करना चाहिए, जो कैङ्कार्यों के लिए आवश्यक हैं।
  • आहार नियम अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें केवल वही भोजन ग्रहण करना चाहिए जो हमारे लिए अनुमत है। जल सहित प्रत्येक वस्तु को भगवान, आऴ्वारों और आचार्यों को अर्पित करने के पश्चात ही प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए।
  • मंदिरों, आचार्य के मठ/तिरुमाळिगै में अपने संलग्नता के अनुसार, आवश्यकतानुसार कैङ्कार्यों के लिए समय का समायोजन करना चाहिए।
  • शास्त्रों की मर्यादा का उल्लंघन किए बिना, यथासंभव आजीविका अर्जन में संलग्न हो सकते हैं। आवश्यकतानुसार समय का विभाजन करें, किन्तु दैनिक दिनचर्या के महत्त्वपूर्ण अंगों का त्याग न करें।
  • अन्य लोगों, विशेषकर परिवार के सदस्यों के साथ भगवद् विषय (आध्यात्मिक विषयों) का अध्ययन, अभ्यास और यथासंभव साझा करें।

संदर्भ (लिंक्स सहित):

स्रोत : https://granthams.koyil.org/2026/03/30/srivaishnava-daily-routine-english/

अडियेन् रोमेश रामानुज दास

संग्रहीत : http://divyaprabandham.koyil.org

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