श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
<< पूर्व
अवतारिका
तत्पश्चात, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक प्रपत्ती के अनुपायत्व (साधन न होना) और उसके विपरीत, जो परगत स्वीकार (भगवान द्वारा अपनी इच्छा से स्वीकार किया जाना) है, को उपाय (साधन) समझा रहे हैं जिनकी व्याख्या पहले क्रमशः सूत्र ५४ “इदु तन्नैप् पार्त्ताल्” और सूत्र ६६ “प्राप्तिक्कु उपायम् अवन् निनैवु” में भिन्न रूप से की गई है। उसमें, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कह रहे हैं, “जब कोई अपने स्वरूप के योग्य प्रपत्ती को साधन मानकर भगवान को प्राप्त करने का प्रयास करता है जो स्वतंत्र हैं, यदि भगवान उसे स्वीकार नहीं करते हैं तो उसकी इच्छा पूरी नहीं होगी”।
सूत्रं – १४२
इवन् अवनैप् पॆऱ निनैक्कुम्बोदु इन्द प्रपत्तियुम् उपायमन्ऱु।
सरल अनुवाद
जब चेतन भगवान को प्राप्त करने की इच्छा रखता है, तो यह प्रपत्ती भी उपाय नहीं है।
व्याख्या
इवन् अवनै…
अर्थात् – जिस प्रकार एक स्वामी जाकर अपनी वस्तु ग्रहण करता है उसी प्रकार जब भगवान जो स्वामी होने के नाते उस परतंत्र चेतन को स्वीकार करने के लिए तत्पर हैं, तब यदि वह चेतन जो लाभार्थी होते हुए भी, अपनी प्रपत्ती के माध्यम से स्वतंत्र भगवान को प्राप्त करने का प्रयास करता है, और यदि भगवान का दिव्य हृदय उसे स्वीकार करने इच्छुक नहीं हों तो यह विशिष्ट प्रपत्ती भी भगवान की प्राप्ति का साधन नहीं होगी।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/26/srivachana-bhushanam-suthram-142-english/
संगृहीत- https://granthams.koyil.org/
प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org