श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः।
श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में आऴ्वारों का स्थान अत्यन्त गौरवपूर्ण एवं वन्दनीय है। समस्त आऴ्वारों में श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) को मुख्य आचार्य एवं आऴ्वार्-शिरोमणि के रूप में आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है। वे “वेदम् तमिऴ् सॆय्द माऱन्” अर्थात् वेदों के गूढ़ रहस्यों को मधुर तमिऴ् दिव्यप्रबन्धों के रूप में प्रकट करने वाले महापुरुष हैं। विशेषतः उनकी “सहस्रगीति” तिरुवाय्मोऴि में चारों वेदों का सार, तत्त्व और परम रहस्य अत्यन्त करुणा के साथ समाहित है। ऐसे कृपासागर श्री शठकोप स्वामी ने जीवमात्र पर अगणित उपकार किये हैं। उनके उपकारों में दो विशेष रूप से स्मरणीय हैं। प्रथम, उन्होंने चार दिव्यप्रबन्धों को प्रसादित कर समस्त संसार को वेद-सार की अमूल्य निधि प्रदान की। ये चार दिव्यप्रबन्ध हैं:
- तिरुविरुत्तम्
- तिरुवासिरियम्
- पेरिय तिरुवन्दादि
- तिरुवाय्मोऴि।
इन्हें क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद तथा सामवेद का सार स्वरूप माना गया है। द्वितीय, उन्होंने अपने अनुग्रह से हमारे पूर्वाचार्यों को सम्प्रदाय का दिव्य प्रकाश अनुभूत करवाया। विशेषतः श्रीमन्नाथमुनि से आरम्भ होने वाली श्रीसम्प्रदाय की आचार्य-परम्परा श्री शठकोप स्वामी की कृपादृष्टि से ही प्रकाशित हुई। उनके अनुग्रह के कारण ही वे महान आचार्य बने और सम्प्रदाय का दिव्य वैभव जगत में प्रतिष्ठित हुआ। इसी हेतु श्रीमन्नाथमुनि से लेकर समस्त आचार्यगण श्री शठकोप स्वामी को अत्यन्त उच्च एवं पूजनीय स्थान प्रदान करते हैं।
श्री शठकोप स्वामी का आऴ्वारत्व किसी सामान्य साधना का प्रतिफल नहीं था। वे भी अनादि काल से संसार चक्र में भटकते हुए जीवों में से एक थे। किन्तु भगवान् ने अपनी निरपेक्ष एवं अहैतुकी कृपा से उन्हें अपनाया और “मयर्वऱ मदि नलम्” – अर्थात् अज्ञान और मोह से रहित निर्मल ज्ञान तथा भगवद्भक्ति – का दिव्य वरदान प्रदान किया।
उसी दिव्य कृपा के प्रताप से वे जगदाचार्य रूप में प्रकट हुए। ऐसे कृपामूर्ति श्री शठकोप स्वामी के दिव्य नामों का चिन्तन, उनके अर्थ का मनन तथा उनका कीर्तन करना प्रत्येक श्रीवैष्णव का परम सौभाग्य है। श्री शठकोप स्वामी के अवतार-स्थल तिरुक्कुरुगूर् (आऴ्वार् तिरुनगरी) के दिव्यदेश मन्दिर में एक शिला-पट्ट पर उनके बत्तीस (३२) दिव्य नाम उत्कीर्ण हैं। अब हम उन दिव्य नामों तथा उनके आध्यात्मिक अर्थों का श्रद्धापूर्वक अनुचिन्तन करेंगे।
अडियेन् श्यामसुंदर रामानुज दास
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