श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः।
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१. श्री शठकोप दिव्य नाम की महिमा
“शठकोप” नम्माऴ्वार् का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं परम पावन संस्कृत नाम है। स्वयं आऴ्वार् ने भी अपने दिव्यप्रबन्धों में अनेक स्थानों पर इस नाम का उल्लेख किया है। श्रीसम्प्रदाय में इस नाम का इतना माहात्म्य है कि “शठकोप” नाम का श्रवण होते ही भक्तगण उस दक्षिण दिक् की ओर श्रद्धापूर्वक अञ्जलि अर्पित करते हैं, जहाँ श्री नम्माऴ्वार् तिरुक्कुरुगूर् (आऴ्वार् तिरुनगरी) में अवतरित हुए ।
“शठकोप” शब्द दो पदों से बना है— शठ (शठम्) तथा कोप।
सम्प्रदाय-ग्रन्थों के अनुसार, प्रत्येक जीव के जन्म के समय “शठम्” नामक एक विशेष मोहकारिणी वायु उसे स्पर्श कर संसार-मोह और अज्ञान में प्रवृत्त करती है। किन्तु जब भगवान् के परमकृपापात्र श्री नम्माऴ्वार् का प्राकट्य हुआ, तब उस शठम्-वायु ने उन्हें भी स्पर्श करने की चेष्टा की। आऴ्वार् ने जन्म लेते ही उस अज्ञानकारिणी वायु का प्रबल प्रतिरोध किया और उसे अपने चरणारविन्द से दूर कर दिया। अर्थात् जिन महापुरुष ने अज्ञानरूप “शठम्” पर कोप प्रकट कर उसे अपने समीप आने ही नहीं दिया, वे “शठकोप” कहलाए। इस प्रकार यह उनका प्रथम, मुख्य और सर्वाधिक वन्दनीय नाम है।
२. श्री तोण्डर् पिरान्
तमिऴ् भाषा में “तोण्डर्” शब्द के दो अर्थ बताए गए हैं। भगवान् के प्रिय भक्त। संसार-मोह में आसक्त सामान्य जीव। श्री नम्माऴ्वार् ने अपने दिव्यप्रबन्धों द्वारा केवल भगवद्भक्तों का ही नहीं, अपितु संसार में आसक्त जीवों का भी महान उपकार किया। इसलिए वे “पिरान्” अर्थात् समस्त जनों के परम हितैषी कहलाते हैं।
“पिरान्” का अर्थ है— महान उपकारी, जो सबका कल्याण करता है। भगवद्भक्तों के लिए उन्होंने दिव्यप्रबन्धों का अमृत प्रदान किया। स्वयं वे तिरुवाय्मोऴि (९.४.९) में कहते हैं: “तोण्डर्क्कमुदुण्णच् चोल् मालैगळ् सोन्नॅ” (मैंने अपने दिव्य शब्द हार भगवान् के भक्तों के लिए अमृतस्वरूप प्रदान किए हैं।) इन दिव्यप्रबन्धों के द्वारा भक्तों को भगवदनुभव, भगवद्भक्ति तथा परम आनन्द की प्राप्ति होती है।
दूसरी ओर, जो जीव संसार में विषयासक्ति के कारण भगवान् से विमुख थे, उन्हें भी श्री नम्माऴ्वार् ने अपने दिव्य उपदेशों द्वारा भगवान् के वास्तविक स्वरूप, उनके अनन्त कल्याणगुण तथा शरणागति के मार्ग का ज्ञान कराया। उनके उपदेशों से असंख्य जीवों का जीवन परिवर्तित हुआ और वे भगवन्मार्ग पर अग्रसर हुए।
श्रीनम्माऴ्वार अपने परम विनय का परिचय भी देते हुए, तिरुवाय्मोऴि (८.१०.११) में कहते हैं।
वे स्वयं को इस प्रकार संबोधित करते हैं:
“तोण्डर् तोण्डर् तोण्डन् शठगोपन्”
(“मैं शठकोप, भगवान् के भक्तों के भक्तों का भी सेवक हूँ।”)
यह केवल विनय का वचन नहीं, अपितु श्रीवैष्णव जीवन का सर्वोच्च आदर्श है। भगवान् की सेवा महान है, किन्तु भगवान् के भक्तों की सेवा उससे भी अधिक गौरवशाली मानी गई है। श्री नम्माऴ्वार् स्वयं को भक्तों का दास मानकर भागवत-शेषत्व का सर्वोच्च आदर्श स्थापित करते हैं।
इस प्रकार वे हमें भगवान् की सेवा का मार्ग भी सिखाते हैं और भगवान् के भक्तों की विनीत सेवा का सर्वोच्च आदर्श भी प्रस्तुत करते हैं।
इसी कारण श्री नम्माऴ्वार् “तोण्डर पिरान”, अर्थात् भक्तों तथा समस्त जीवों के परम हितैषी और महान उपकारी के नाम से सम्पूर्ण श्रीसम्प्रदाय में आदरपूर्वक वन्दित हैं।
अडियेन् श्यामसुंदर रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2026/06/18/nammazhwars-divine-names-satakopan-thondar-piran-english/
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