श्री रामायण तनि श्लोकम् – ८ – बालकाण्डम् ६.८ – द्रष्टुं शक्यम्, २३.२ – कौसल्या सुप्रजा राम

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः

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<< भाग ७

द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिकः ।
सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयताः ॥

प्रतिपदार्थ

अयोध्यायाम् — अयोध्या में।

— नहीं।

अविद्वान् — अशिक्षित, अज्ञानी।

न च नास्तिकः — न ही नास्तिक (जो वेदों में विश्वास नहीं रखता)।

द्रष्टुं शक्यम् — देखने को नहीं मिलता था।

सर्वे नराश्च — सभी पुरुष।

नार्यश्च — तथा सभी स्त्रियाँ।

धर्मशीलाः — धर्मपरायण।

सुसंयताः — संयमी (उत्तम प्रकार से अपने इन्द्रिय को अपने वश में रखने वाले)।

सरल अर्थ

यह श्लोक अयोध्या के निवासियों की महानता का वर्णन करता है। अयोध्या में कोई भी अधार्मिक आचरण वाला व्यक्ति नहीं था। वहाँ न तो कोई अज्ञानी था और न ही ऐसा कोई व्यक्ति था जो वेद अथवा शास्त्रों में विश्वास न रखता हो। सभी पुरुष और स्त्रियाँ धर्मशील, इन्द्रिय-निग्रहयुक्त तथा सदैव धर्मानुकूल आचरण में प्रवृत्त रहते थे।

राजा दशरथ ने साठ हजार वर्षों तक अयोध्या की प्रजा की शत्रुओं से रक्षा की और अपने राज्य के कल्याण का पालन किया। उनकी महिमा ऐसी थी कि वे अपने राज्य में सब कुछ उत्पन्न कर सकते थे, किन्तु एक ऐसी प्रजा नहीं जो अज्ञानी हो अथवा वेदों में विश्वास न रखता हो।

पेरियवाच्चान् पिळ्ळै (कृष्णपाद आचार्य) की व्याख्या से 

  • अयोध्या के लोग प्रजाजन श्रीराम के अतिरिक्त किसी अन्य का राज्याभिषेक नहीं चाहते थे। यदि वे श्रीराम का राज्याभिषेक होते हुए न देख पाते, तो वे अपने प्राणों का त्याग करने को भी इच्छुक थे। श्रीराम के प्रति उनका प्रेम निम्नलिखित प्रमाणों से स्पष्ट होता है:
  • श्रीराम के सिंहासन पर आसीन हुए बिना अयोध्या के पुरुष अपने जीवन को श्मशान में होने के समान निरर्थक मानते थे। श्रीरामायण, अयोध्याकाण्ड ४७.७ — “इहैव निधनं यामो महाप्रस्थानमेव वा। रामेण रहितानां हि किमर्थं जीवितं हि नः ॥” (यदि श्रीराम का राज्याभिषेक नहीं हुआ, तो हम या तो अयोध्या से दूर दीर्घकाल के लिए महाप्रस्थान कर जाएँगे अथवा अपने प्राणों का त्याग कर देंगे; क्योंकि श्रीराम के बिना हमारे जीवन का क्या प्रयोजन है?)
  • जब अयोध्या के पुरुष श्रीराम के पीछे वन में जाने में असमर्थ होकर अपने घर लौट आए, तब अयोध्या की स्त्रियों ने उनके मुख पर द्वार बन्द कर दिए और उन्हें लौटा दिया | श्रीरामायण, अयोध्याकाण्ड ४८.२७ —“राममेवानुगच्छध्वमश्रुतिं वापि गच्छत ॥” —(अयोध्या की स्त्रियों ने अपने पुरुषों से कहा— “यदि तुम श्रीराम के पीछे नहीं जाते, तो ऐसे स्थान पर चले जाओ, जिसका नाम भी किसी ने नहीं सुना हो।”)
  • धर्मशीलाः — अयोध्या के लोग अपने व्यक्तिगत भोग के लिए कोई कार्य नहीं करते थे। उनका मुख्य तथा एकमात्र धर्म श्रीराम की सेवा करना था।

बालकाण्डम् २३.२

कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्त्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥ १.२३.२ ॥

नरशार्दूल — हे मनुष्यों में सिंह के समान !

कौसल्या सुप्रजा राम — हे कौसल्या के उत्तम/श्रेष्ठ पुत्र! (वह संतान जिससे माता ‘उत्कृष्ट प्रजा/संतान वाली’ कहलाती है)

पूर्वा — प्रथम

सन्ध्या — (रात्रि और दिन के मध्य का) संधिकाल ।

प्रवर्तते — अब आरम्भ हो रहा है।

दैवमाह्निकम् — भगवान् की आज्ञा के अनुसार प्रतिदिन सम्पन्न किए जाने वाले नित्य धार्मिक कर्तव्य एवं अनुष्ठान।

कर्तव्यम् — किया जाना चाहिए; 

उत्तिष्ठ — उठिए

पेरियवाच्चान् पिळ्ळै यहाँ एक प्रश्न के साथ अपने व्याख्यान का आरम्भ करते हैं। महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को राजा दशरथ और कौसल्या मैया दोनों के पुत्र के रूप में संबोधित करने के स्थान पर केवल कौसल्या के पुत्र के रूप में ही क्यों संबोधित किया?

कौसल्या

श्रीराम का अवतार राजा दशरथ और कौसल्या मैया, दोनों की तपस्या का फल था। फिर भी महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें इस प्रकार संबोधित करने का क्या कारण था? कौसल्या अम्माजी के विशेष महत्त्व को निम्नलिखित प्रमाणों द्वारा स्पष्ट किया गया है।

  • यहाँ कौसल्या की भूमिका अधिक प्रमुख है, क्योंकि सामान्यतः पिता की अपेक्षा माता का योगदान पुत्र के पालन-पोषण में अधिक होता है। “माता पुत्रत्वस्य भूयांसि कर्माण्यारभते तस्यां शुश्रूषा नित्या पतितायामपि।” (आपस्तम्ब धर्मसूत्र २.२.५६)  — (माता अपने पुत्र के लिए अनेक (अनगिनत) कार्य करती है।)
  • वेद भी अपने उपदेश में पिता का उल्लेख करने से पहले माता का उल्लेख करते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् १.११.२ — “मातृदेवो भव।” — (माता को देवता के समान मानो।)
  • श्रीराम का स्वभाव सदैव ऐसा था कि वे अपनी माता की इच्छाओं को पूर्ण करते थे। माता कैकेयी की इच्छा की पूर्ति के लिए उन्होंने अत्यन्त कठिन कार्यों का भी पालन किया। श्रीरामायण, बालकाण्ड १.२४ — “कैकेय्याः प्रियकारणात्।” — (कैकेयी माता की प्रसन्नता के लिए।)
  • जब राजा दशरथ ने महर्षि विश्वामित्र के साथ श्रीराम को भेजने के विषय में विचार-विमर्श किया, तब कौसल्या मैया ने इसके प्रति कोई आपत्ति नहीं की। महर्षि विश्वामित्र इसे कौसल्या महारानी द्वारा किया गया एक उपकार मानते हैं; इसी कारण वे कृतज्ञतावश श्रीराम को “कौसल्या के पुत्र” कहकर संबोधित करते हैं।

सुप्रजा

श्रेष्ठ पुत्र वह है जो अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करता हो, उनकी इच्छानुसार आचरण करता हो तथा उनके कल्याण के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करता हो। श्रीराम ऐसे ही समस्त सद्गुणों के मूर्तिमान स्वरूप थे। इसी तथ्य को प्रकट करने के लिए उन्हें “सुप्रजा” कहा गया है।

  • श्रीरामायण, युद्धकाण्ड १८.१६“मद्विधा वा पितुः पुत्राः।” — (मेरे समान अपने पिता का उत्तम पुत्र कोई नहीं है।)
  • श्रीरामायण, बालकाण्ड १८.११“कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा।” — (ऐसे असीम तेजयुक्त पुत्र को जन्म देने के कारण कौसल्या माता शोभायमान हुईं।)
  • तिरुप्पावै “तायैक् कुडल् विलक्कम् सेय्द दामोदरनै।” — (दामोदर ने अपनी माता यशोदा की कोख का गौरव बढ़ाया।)
  • पेरियाऴ्वार् तिरुमोऴि २.२.६“ऎन्न नोन्बु नोट्राळ् कॊलो इवनैप् पॆट्र वयिऱुडैयाळ्” — (जिस माता ने ऐसे पुत्र को जन्म दिया, उसने न जाने कैसी तपस्या की होगी?)

राम!

  • श्रीराम का दिव्य स्वरूप, उनकी करुणा, उनके कल्याणकारी दिव्य गुण तथा उनका अनुपम सामर्थ्य सभी को अपनी ओर आकर्षित करती है। श्रीराम का वह दिव्य स्वरूप प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को आनन्द प्रदान करता है।
  • महाभारतम्, सभापर्व (अध्याय ४३, श्लोक ११)“देवो नामसहस्रवान्।” — (भगवान् के सहस्र नाम हैं।) श्रीराम-नाम भगवान् के सहस्र नामों के समतुल्य माना गया है।
  • श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण भगवान् की शरण में आने वाले चार प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन करते हैं— आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी। आर्त — वह जो दुःख से पीड़ित हो अथवा जिसने अपना धन-वैभव खो दिया हो। अर्थार्थी — वह जो धन अथवा अन्य सांसारिक सम्पत्ति की कामना करता हो। जिज्ञासु — वह जो आत्मा-स्वरुप का आनन्द लेना चाहता है। ज्ञानी — शुद्ध भक्त। इन चारों प्रकार के व्यक्तियों के लिए श्रीराम-नाम अपने-अपने अभिष्ट की प्राप्ति का मन्त्र है। यह ऐसा दिव्य नाम है जो साधक की सभी उचित अभिलाषाओं को पूर्ण करने की सामर्थ्य रखता है।

कौसल्या सुप्रजा राम

  • श्रीराम को कौसल्या मैया के पुत्र के रूप में संबोधित किए जाने के कारण किसी प्रकार का संशय नहीं रहता। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ अभिप्राय परशुराम से नहीं, बल्कि श्रीराम से है।

नरशार्दूल

  • वे समस्त पुरुषों में व्याघ्र के समान श्रेष्ठ हैं तथा महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के पूर्णतः योग्य हैं।

पूर्वा सन्ध्या

  • महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को इस उद्देश्य से जगाते हैं कि उन्हें भगवान् का प्रथम दर्शन प्राप्त हो।
  • वे उन्हें इसीलिए भी जगाते हैं कि जिस कार्य की सिद्धि के लिए वे आए हैं, उसके लिए वे तत्पर हो जाएँ। प्रातःकाल में प्रकाश का उदय अज्ञान के निवारण तथा प्रातःकालीन समय में प्राप्त होने वाले ज्ञान का भी प्रतीक है। पूर्वा सन्ध्या वह समय है जो ज्ञान को ग्रहण और आत्मसात् करने के लिए सर्वथा उपयुक्त माना गया है।
  • श्रीराम सदैव शास्त्रविहित समस्त आचारों एवं अनुष्ठानों का पालन करने वाले हैं। अतः महर्षि विश्वामित्र उन्हें यह स्मरण कराने के लिए जगाते हैं कि अब पूर्वा सन्ध्या का समय उपस्थित हो गया है।

प्रवर्तते

  • प्रवर्तते का अर्थ है— “यह समय अब प्रारम्भ हो गया है।” यह वर्तमान काल में इसलिए कहा गया है कि इस शुभ समय की मंगलमयता निरन्तर बनी रहे।

कर्तव्यं दैवमाह्निकम्

  • दैवमाह्निकम् — भगवान् द्वारा शास्त्रों के माध्यम से विहित दैनिक कर्तव्य एवं अनुष्ठान। आह्निक कर्म — वे कर्म जो प्रतिदिन किए जाते हैं। इनमें नित्यकर्म, जैसे सन्ध्यावन्दन, तथा नैमित्तिक कर्म, जैसे पुण्यकाल में सम्पन्न किए जाने वाले शास्त्रविहित कर्म, सम्मिलित हैं।
  • अतः महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को जगाते हुए कहते हैं—

“कौसल्या सुप्रजा राम! पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते। उत्तिष्ठ नरशार्दूल! कर्तव्यं दैवमाह्निकम्॥”

अडियेन माधव श्रीनिवास रामानुज दास।
अडियेन रमा श्रीनिवास रामानुज दासी।

आधार –   https://granthams.koyil.org/2025/07/18/sri-ramayana-thani-slokam-8-english/

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