श्रीवचन भूषण – सूत्रं १९६

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अवतारिका

श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक यह समझा रहे हैं कि जन्म के आधार पर भागवतों को आंकना कितना क्रूर है।

सूत्रं – १९६

इदुदान्‌ अर्चावतारत्तिल्‌ उपादान स्मृतियिलुम्‌ काट्टिल्‌ क्रूरम्‌.

सरल अनुवाद

भगवान के दिव्य ‘अर्चा’ स्वरूप को उस कच्चे माल के आधार पर आंकना, जिससे वह बना है उससे भी अधिक क्रूरतापूर्ण है।

व्याख्या

इदुदान्‌

इदुदान्‌

श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी भागवतों को उनके जन्म के आधार पर परखने के विषय में बात कर रहे हैं।

अर्चावतारत्तिल्‌ उपादान स्मृतियिलुम्‌ 

भगवान किसी भी वस्तु को अपने दिव्य रूप में [मूल पदार्थ के रूप में] स्वीकार करते हैं और उसके प्रति भी उतना ही गहरा स्नेह दिखाते हैं जितना वे अपने आध्यात्मिक दिव्य रूप [परमपद में] के प्रति दिखाते हैं और वे दयापूर्वक उसमें उपस्थित रहते हैं। इस महानता को जाने बिना उस मूल पदार्थ की तुच्छ प्रकृति के विषय में सोचना जिससे वह रूप बनाया गया है।

काट्टिल्‌ क्रूरम्‌

भगवान को जितना क्रोध तब आता है जब उनके दिव्य स्वरूप को उस सामग्री के आधार पर आंका जाता है जिससे वह बना हो, सर्वेश्वर को उससे यह [जिसका इदुदान् में उल्लेख किया है] कहीं अधिक क्रोधित करेगा ।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/19/srivachana-bhushanam-suthram-196-english/

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