श्रीवचन भूषण – सूत्रं २०३

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इस संदर्भ में, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी हमें दो घटनाओं का स्मरण दिला रहे हैं।

सूत्रं – २०३

इव्विडत्तिले, वैनतेय व्रुत्तान्तत्तैयुं, पिळ्ळैप पिळ्ळै आऴ्वानुक्कु आऴ्वान् पणित्त वार्त्तैयैयुं स्मरिप्पदु.

सरल अनुवाद

यहाँ, श्रीगरुडाऴ्वार् से जुड़ी घटना और पिळ्ळैप्‌ पिळ्ळै आऴ्वान् से श्रीकुरेश स्वामीजी  के कहे शब्दों को स्मरण करें।

व्याख्या

इव्विडत्तिले …

वैनतेय व्रुत्तान्तं 

महर्षि विश्वामित्र से समीप शिक्षा प्राप्त कर समस्त विद्याओं में पारंगत हुए गालव नामक एक ब्राह्मण ने विचार किया कि यदि वह गुरु-दक्षिणा अर्पित नहीं करेगा, तो प्राप्त की हुई विद्या स्थिर नहीं रहेगी। अतः वह महर्षि विश्वामित्र के समीप जाकर विनयपूर्वक बोला, “भगवन्! मैं आपको उपयुक्त रूप से कौन-सी भेंट अर्पित करूँ?”

महर्षि विश्वामित्र ने बार-बार कहा, “तुम्हें मेरे लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। हम तुम्हारी सेवा और भक्ति से संतुष्ट हैं। अब तुम जा सकते हो और अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत कर सकते हो।” किन्तु गालव ने अपने गुरु के वचनों पर ध्यान नहीं दिया और बार-बार आग्रहपूर्वक निवेदन करते हुए कहा, “भगवन्! आप मुझसे अवश्य ही कुछ गुरु-दक्षिणा स्वीकार करें।” गालव के इस निरन्तर आग्रह से महर्षि विश्वामित्र क्रुद्ध हो उठे। महाभारत के उद्योगपर्व में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है “किन्चिदागतसम्रंभो विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम् । एकतः श्यामकर्णानां शतान्यष्टौ तु देहि मे । हयानां चन्द्रसदृशानां गच्छ गालव मा चिरम् ॥ ” – उन्होंने गालव की ओर दृष्टि डालकर कहा, “तुम ऐसे आठ सौ अश्व लाओ, जिनका शरीर चन्द्रमा के समान श्वेत हो तथा जिनके कर्ण हरित वर्ण के हों।”

यह सुनकर गालव अत्यन्त चिन्तित हो गए और मन-ही-मन विचार करने लगे, “अब मैं क्या करूँ?” तत्पश्चात् वे समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले सर्वेश्वर की तपस्या करने के लिए प्रस्थान कर गए। उसी समय उनके मित्र पेरिय तिरुवडि नयनार् (गरुड़जी) उनके समक्ष प्रकट हुए। गालव ने उनकी स्तुति करके अपना संकट का निवेदन किया, गरुड़जी ने कहा, “मैं तुम्हें सम्पूर्ण पृथ्वी का परिभ्रमण कराऊँगा; हम दोनों मिलकर इन अश्वों की खोज करेंगे।” ऐसा कहकर गरुड़जी गालव को साथ लेकर सम्पूर्ण पृथ्वी का परिभ्रमण करते रहे। अन्ततः वे श्रान्त हो गए। पश्चिमी समुद्र में स्थित ऋषभ नामक पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने विचार किया, “आओ, यहाँ कुछ समय विश्राम करें; तत्पश्चात् पुनः अपनी खोज आरम्भ करेंगे।” वहाँ निवास करने वाली अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न भागवता शाण्डिली के समीप वे गए। उन्होंने दोनों का यथोचित आदर किया और शाण्डिली ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक उनका स्वागत तथा आतिथ्य किया। विश्राम करते समय गरुड़जी के मन में विचार उत्पन्न हुआ, “इतनी महान् भागवता भगवान् के किसी दिव्यदेश में निवास क्यों नहीं करतीं?” वे उन्हें वहाँ से ले जाकर किसी दिव्यदेश में प्रतिष्ठित करने का विचार करने लगे। किन्तु उस भागवता के निवास-स्थान को हीन समझने के अपराध के कारण उनके पंख तत्काल जल गए और वे असहाय हो गए। 

गरुड़जी के साथ आए ब्राह्मण ने यह देखकर महाभारत के उद्योगपर्व में वर्णित वचनों के अनुसार कहा “किन्तु ते मनसा ध्यातम्‌ अशुभम्‌ पदताम्वर । नह्ययम भवत: स्वल्पो व्यभिचारो भविश्यति ॥“ क्या तुमने अपने मन में कोई अशुभ चिन्तन किया है? तुम जैसे महापुरुष के लिए अल्पमात्र भी अशुभ चिन्तन करना उचित नहीं है।” गरुडाऴ्वार् ने उत्तर दिया, “हाँ, मेरे मन में एक अशुभ विचार उत्पन्न हुआ था।” तत्पश्चात् उन्होंने दयाभावपूर्वक उस भागवता के विषय में अपने अन्तःकरण के विचारों का वर्णन किया। इसके पश्चात् गरुडाऴ्वार् उनके समीप गए और क्षमायाचना की। उनकी कृपा से वह अपराध नष्ट हो गया और उन्हें पुनः अपना स्वरूप प्राप्त हुआ। उद्योगपर्व में वर्णित है कि जब श्रीकृष्ण वहाँ दिव्य दूत के रूप में उपस्थित थे तथा अनेक महर्षिगण भी वहाँ विद्यमान थे, तब श्रीनारद भगवान् ने धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण के दिव्य हृदय (उनकी इच्छा एवं संदेश) का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते हुए अनेक घटनाओं का उल्लेख किया।

इस तथ्य की पुष्टि वेद-उपबृंहण ग्रन्थों में भी की गई है।

पिळ्ळैप पिळ्ळै आऴ्वानुक्कु आऴ्वान् पणित्त वार्त्तै

जब श्रीकुरेश स्वामीजी (आऴ्वान्/कूरत्ताऴ्वान्) ने पिळ्ळैप् पिळ्ळै आऴ्वान् को अपना शिष्य रूप में स्वीकार किया, तब उन्होंने यह अवलोकन किया कि उच्च कुल में जन्म होने पर भी उनमें भागवतों के प्रति विनय एवं नम्रता का अभाव था। उन्होंने अपने दिव्य अन्तःकरण में विचार किया कि “इनके द्वारा किया गया यह भागवत-अपचार उनके ज्ञान तथा सदाचरण को विनष्ट कर अन्ततः पतन का कारण बनेगा; अतः किसी उपाय से इन्हें संयमित करना आवश्यक है।” आयन (छः मासीय काल के प्रारम्भ) के पवित्र दिवस पर, जब पिळ्ळैप् पिळ्ळै आऴ्वान् नदी में स्नान कर तट पर आए, तब श्रीकुरेश स्वामीजी ने उन्हें देखकर कहा, “जब सभी जन दान प्रदान कर रहे हैं, तो क्या तुम भी मुझे कुछ दान दोगे?” पिळ्ळैप् पिळ्ळै आऴ्वान् ने उत्तर दिया, “मेरे पास आपको देने योग्य क्या है? सर्वस्व तो पहले से ही आपका है।” तब आऴ्वान् ने कहा, “तुम्हारा कथन उचित है, किन्तु केवल इतना पर्याप्त नहीं है। तुम्हें यह प्रतिज्ञा करनी होगी कि ‘मैं अपने मन, वाणी एवं कर्म द्वारा कभी भी भागवताओं का अपमान नहीं करूँगा।’ इसके लिए तुम्हें मेरे हस्त में जल अर्पित करना होगा।” पिळ्ळैप् पिळ्ळै आऴ्वान् ने श्रीकुरेश स्वामीजी के हस्त में जल अर्पित कर यह व्रत ग्रहण किया। परन्तु पश्चात्, अपने पूर्व संस्कारों के प्रभाव से, उनके मन में किसी भागवत के विषय में अल्प अवमानना का विचार उत्पन्न हुआ और वे भीतर ही विचार करने लगे—“अब मेरा सर्वनाश निश्चित है।” वे गृह से बाहर न निकलकर अपने निवास में ही स्थित हो गए। श्रीकुरेश स्वामीजी ने यह देखकर विचार किया कि वे सामान्य समय पर क्यों नहीं आए, अतः वे उनके गृह पहुँचे और पूछने लगे, “क्या हुआ? तुम चिन्तित क्यों हो?”

तब पिळ्ळैप् पिळ्ळै आऴ्वान् ने भागवत के प्रति उत्पन्न हुए मनोविचार को निवेदन किया और कहा, “इस शरीर के रहते हुए मन, वाणी और कर्म द्वारा पूर्णतः निर्दोष रहना अत्यन्त कठिन है।” ऐसा कहकर वे श्रीकुरेश स्वामीजी के दिव्य चरणों को पकड़कर विलाप करने लगे। तब श्रीकुरेश स्वामीजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और करुणापूर्वक बोले, “तुमने कितना प्रायश्चित्त किया है! मन में किए गए अपराध का प्रायश्चित्त करने पर भगवान् उसे क्षमा कर देते हैं; किन्तु शरीर द्वारा किया गया अपचार तत्काल एवं सर्वसाक्षी रूप से फल देता है। अतः मैंने यह सुनिश्चित किया है कि तुम पुनः ऐसा आचरण न करो। अब अपनी वाणी पर विशेष संयम रखो और उसी के अनुसार आचरण करो।”

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/27/srivachana-bhushanam-suthram-203-english/

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