श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
जब यह पूछा गया कि “क्या यह सिद्धान्त कहीं देखने को मिलता है?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक उत्तर देते हैं।
सूत्रं – २०६
इव्वर्थम्, कैशिक वृत्तान्तत्तिलुम्, उपरिचरवसु वृत्तान्तत्तिलुम् काणलाम्.
सरल अनुवाद
यह सिद्धांत कैशिक और उपरिचरवसु की घटनाओं में देखा जाता है।
व्याख्या
इव्वर्थम् …
कैशिक वृत्तान्तम्
कथा इस प्रकार है, चरककुल में उत्पन्न सोमशर्मा नामक एक ब्राह्मण ने यज्ञ करने का संकल्प किया। किन्तु यज्ञ-सम्पादन पूर्ण होने से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई। इस कारण वे ब्रह्मराक्षस रूप में उत्पन्न होकर भटकने लगे।
उसी समय एक भागवत थे, जिनकी एकमात्र पहचान भगवान् के प्रति उनकी भक्ति थी तथा जिनमें स्वाभाविक विनम्रता विद्यमान थी, क्योंकि उनका जन्म निम्न कुल में हुआ था, जैसा कि वराहपुराण में वर्णित है – “मद्भक्तं श्वपचं वापि” (यदि मेरा भक्त चाण्डाल-भोजी भी हो, तथापि मैं उसके अपमान को किसी प्रकार सहन नहीं करूँगा), उत्थान (कैशिक) एकादशी की रात्रि में वे वीणा को हाथ में धारण कर तिरुक्कुरुङ्गुडी (जिसे सिद्धाश्रम भी कहा जाता है) की ओर प्रस्थान कर रहे थे, ताकि श्रीनम्बि भगवान् के लिए गायन कर सकें तथा उनके कैंकर्य का सौभाग्य प्राप्त कर सकें।
इसी समय ब्रह्मराक्षस उस भागवत को भक्षण करने के उद्देश्य से उनके समीप आया। उस भागवत ने अनेक प्रकार से यह वचन दिया कि “श्रीनम्बि के लिए गायन सम्पन्न करने के पश्चात् मैं पुनः लौट आऊँगा,” और उन्होंने राक्षस से अनुमति प्राप्त कर ली। तत्पश्चात् वे श्रीनम्बि भगवान् के समीप गए, श्रद्धापूर्वक उनकी आराधना की तथा शीघ्र ही पुनः उसी स्थान पर लौट आए जहाँ ब्रह्मराक्षस स्थित था, और कहा, “यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम मेरे शरीर का भक्षण कर सकते हो।” किन्तु राक्षस ने उस भागवत की सत्यनिष्ठा एवं महिमा को देखकर कहा, “तुम आज गाए गए गीतों का फल मुझे प्रदान कर दो, मैं तुम्हें छोड़ दूँगा।” परन्तु भागवत ने यह स्वीकार नहीं किया। तत्पश्चात् राक्षस ने मध्यरात्रि, एक प्रहर में किए गए गायन के फल को देने का और इस प्रकार आग्रह करता गया , किन्तु भागवत अपने संकल्प पर अटल रहे और बोले, “मैं ऐसा कदापि नहीं कर सकता; तुम अपनी पूर्व इच्छा के अनुसार मेरा भक्षण कर सकते हो।” कैशिकपुराण में वर्णन है कि राक्षस ने अन्ततः उस भागवत के समक्ष आत्मसमर्पण कर प्रार्थना की, “आप अपने गायन की महिमा से मुझे मेरे पाप-कर्मों के फल से पार करा दें।” जैसे “त्वम्वै गीत प्रभावेन निष्ठरायितुमाहसि । एवम् उक्त्वाद चण्डाळम् राक्षसस् शरणाम्गत: ||” में कहा गया है; अन्त में उस भागवत ने उसे कैशिक राग का फल प्रदान किया, जिसके प्रभाव से उसके कर्मजन्य राक्षस-भाव का नाश हो गया। तत्पश्चात् उसे पुनः ब्राह्मण-स्वरूप प्राप्त हुआ तथा आगे चलकर मोक्ष की प्राप्ति हेतु भागवतत्व की दिशा में उन्नति का मार्ग भी प्राप्त हुआ (जैसा कि शास्त्रों में वर्णित है)। (जैसा कि “यन्मया पश्चिमं गीतं स्वरं कैशिकम् उत्तमम्” में कहा गया है); इस कैशिक-आख्यान से यह सिद्ध होता है कि ऐसी कोई सीमा नहीं है कि केवल उच्च कुल में उत्पन्न भागवतों के साथ सम्बन्ध ही मोक्षप्राप्ति का साधन होगा तथा निम्न कुल में उत्पन्न भागवतों के साथ सम्बन्ध से मोक्षप्राप्ति संभव नहीं होगी।
उपरिचरवसु व्रुत्तान्तम्
उपरिचरवसु एक महान राजा तथा अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न पुरुष थे; यहाँ तक कि ऋषिगण एवं देवगण भी धर्म से सम्बन्धित अपने संशयों के निवारण हेतु उनसे परामर्श लिया करते थे। उनका आचरण उनके क्षत्रिय वर्ण के अनुरूप अत्यन्त श्रेष्ठ था। वे सात्वत तन्त्र (श्री पाञ्चरात्र आगम का एक भाग) के भी ज्ञाता थे तथा भगवान् की निरन्तर उपासना के कारण उनका चरित्र परम पवित्र था। अपनी तपोशक्ति के कारण वे आकाश में विचरण करने में समर्थ थे। जब ऋषिगण एवं देवगण यज्ञ में पशु-उपयोग के विषय में विवाद कर रहे थे, तब उन्होंने उन्हें आकाश में देखा, जैसा कि निम्न श्लोक में कहा गया है:
“मार्गागतः नृपश्रेष्ठः तं देवं प्राप्तवान् वसु: । अन्तरिक्षचरः श्रीमान् समग्र बलवाहनः ॥
तं दृष्ट्वा सहसयान्तं वसुं तेथवन् अन्तरिक्षगम् । ऊचुर्द्विजातयो देवा एषः छेत्स्यति संशयम् ॥”
अर्थात् जब राजाओं में श्रेष्ठ उपरिचरवसु मार्ग में गमन कर रहे थे, तब वे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ यह विवाद चल रहा था। ऋषिगण एवं देवगणों ने उस आकाशचारी राजा को देखा, जो अपनी सम्पूर्ण सेना एवं वैभव सहित विद्यमान थे, और उन्होंने कहा कि वही हमारे संशय का निवारण करेंगे। तत्पश्चात् वे उनके समीप जाकर बोले, “हमें क्या करना चाहिए?” राजा ने उत्तर दिया, “आप दोनों अपने-अपने मत मुझे निवेदन करें।”
ऋषियों ने कहा, “हमारा मत है कि यज्ञ अन्न द्वारा किया जाना चाहिए; जबकि देवताओं का मत है कि यज्ञ पशुओं द्वारा किया जाना चाहिए। अतः आप ही निर्णय करें।”
जैसा कि कहा गया है:
“धान्यैर्यस्तव्यमित्येष पक्षोऽस्माकं नराधिप । देवतानाम् हि पशुभिः पक्षो राजन् वध स्वनः ॥”
देवताओं के मत के प्रति उनके झुकाव के कारण उन्होंने कहा—“यज्ञ पशुओं द्वारा ही किया जाना चाहिए।” यह सुनकर ऋषि गण क्रोधित हो उठे। देवताओं के पक्ष में झुकाव रखने वाले तथा आकाश में स्थित उस राजा को देखकर उन्होंने शाप देते हुए कहा—“यदि तुम्हारा यह कथन वेद-शास्त्रों के विपरीत है, तो हे देवताओं के पक्ष में स्थित राजा, तुम आकाश से पतित हो जाओगे; तुम्हारी गति तुरन्त रुक जाएगी और तुम पाताल में गिर जाओगे। यदि हमने भी वेद-विरुद्ध कहा होता, तो हम भी पाताल में गिर जाते।”
जैसा कि कहा गया है,
“कुपितास्ते तथा सर्वे मुनयः सूर्यवर्चर्चसः ।
ऊचुर्वसुं विमानस्थं देव पक्षार्थ वादिनम् ॥
सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्मात् दिवः पत ।
अद्य प्रभृतिते राजन्नाकाशे विहतागति: ॥
अस्मत् शापाभिगातेन महीं भित्वा प्रवेक्ष्यसि ।
विरुद्धं वेदसूत्राणाम् उक्तं यद्भवेत् नृप ॥
वयं विरुद्धवचनाय तत्र पतामहे ॥”
तत्पश्चात् उसी क्षण शापवश वह राजा उपरिचरवसु आकाश से पृथ्वी की ओर पतित हो गए और पृथ्वी में स्थित एक छिद्र के माध्यम से पाताल में प्रविष्ट हो गए,
“ततः तस्मिन् मुहूर्ते तु राजो परिचरश् तथा ।
अथो वै संभभूवाशु भूमेः विवरगो नृपः ॥”
इस उपरिचरवसु की कथा से यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि वे ज्ञान के कारण ऋषियों से भी श्रेष्ठ थे, तथापि धर्म-विषयक संशय के कारण ऋषियों के प्रति किया गया अपराध उनके पतन का कारण बना। इससे यह सिद्ध होता है कि ऐसी कोई कठोर बाध्यता नहीं है कि जन्म से निम्न भागवतों द्वारा जन्म से उच्च भागवतों के प्रति किया गया अपचार ही पतन का कारण होगा, और इसके विपरीत स्थिति में ऐसा नहीं होगा।
यद्यपि ऋषि जन्म के आधार पर श्रेष्ठ माने जाते हैं, तथापि उपरिचरवसु ज्ञान के आधार पर उनसे श्रेष्ठ थे; अतः ज्ञान को जन्म से श्रेष्ठ माना जाता है।
क्योंकि श्रीवराहपुराण में श्रीवराह भगवान् द्वारा श्रीभूमि देवी (पिराट्टी) को कैशिक-वृत्तान्त करुणापूर्वक वर्णित किया गया है, तथा महाभारत के मोक्षधर्म में श्रीभीष्म द्वारा धर्मपुत्र को उपरिचरवसु का वृत्तान्त उपदेश रूप में कहा गया है, जो पंचम वेद के रूप में प्रतिष्ठित है, ये दोनों ही अत्यन्त प्रमाणिक प्रमाण हैं।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/30/srivachana-bhushanam-suthram-206-english/
संगृहीत- https://granthams.koyil.org/
प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org