श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
जब यह पूछा गया कि “इस तरह (जैसा कि पिछले सूत्रों में बताया गया है), अगर ऊँचे कुल में जन्म आदि से हानि हो सकता है, तो क्या निचले कुल में जन्म आदि से वांछित फल मिल सकता है?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने कृपापूर्वक उत्तर दिया।
सूत्रं – २०८
जन्म वृत्तङ्गळिनुडैय उत्कर्षमुम् अपकर्षमुम्, पेट्रुक्कुम् इऴवुक्कुम् अप्रयोजकम्।
सरल अनुवाद
जन्म, आचरण आदि के आधार पर श्रेष्ठता या हीनता, परिणाम के लाभ या हानि का कारण नहीं होती है।
व्याख्या
जन्म वृत्तङ्गळिनुडैय …
अर्थात् – ऊँचे कुल या अच्छे आचरण आदि का होना किसी परिणाम के मिलने या न मिलने का कारण नहीं है; उसी प्रकार, निचले कुल या बुरे आचरण आदि का होना भी परिणाम के मिलने या न मिलने का कारण नहीं है।
वैकल्पिक स्पष्टीकरण।
यहाँ एक प्रश्न उठता है – आपने सूत्र २०५ में कहा “इदिल् जन्म वृत्तादि नियमम् इल्लै” (अर्थात जन्म, आचरण आदि के आधार पर कोई रोक-टोक नहीं है) और सूत्रं २०७ में कहा “इऴवुक्कु उऱुप्पागिल् त्याज्यमामिऱे” (अर्थात अगर वही ब्राह्मणत्व नष्ट का कारण बने, तो उसे छोड़ देना चाहिए)। क्या आप ऐसा कह सकते हैं? क्योंकि वेद आदि के अध्ययन से ही भगवान की प्राप्ति होती है तो क्या हमें यह नहीं मानना चाहिए कि यह श्रेष्ठ जन्म, आचरण आदि ही अंतिम परिणाम तक पहुँचाते हैं और इनके निम्न होने का अर्थ है वेद अध्ययन के लिए अयोग्यता और हानि का कारण बनना? – श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक इसका उत्तर देते हैं।
जन्म वृत्तङ्गळिनुडैय …
अर्थात – जन्म, आचरण आदि की श्रेष्ठता परिणाम (भगवान की प्राप्ति) का कारण नहीं है और इनकी हीनता हानी (भगवान की प्राप्ति न होना) का कारण नहीं है। पेऱु – भगवान को पाना; इऴवु – भगवान को न पाना।
प्रयोजकम्
जिससे फल मिलता है। हम देखते हैं कि ऊँचे जन्म और अच्छे आचरण वाले कुछ लोगों को फल मिलता है, जबकि उसी समूह के दूसरों को नहीं; और इसी तरह, निचले जन्म और दुष्ट आचरण वाले कुछ लोगों को फल मिलता है, जबकि उसी समूह के दूसरों को नहीं। इससे स्पष्ट होता है कि जन्म या आचरण का ऊँचा या नीचा होना फल मिलने का कारण नहीं है।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/09/01/srivachana-bhushanam-suthram-208-english/
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