यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ५६
श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ५५ अप्पिळ्ळै (श्रीप्रणतार्तिहारी स्वामीजी) और अप्पिळ्ळार् (श्रीरामानुज स्वामीजी) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य चरणों के शरण होते हैं सात गोत्रों के नियम को सम्पन्न कर एऱुम्बियप्पा एऱुम्बि लौटने का निर्णय करते हैं परन्तु पूर्वसंकेत शुभ नहीं थे। उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष … Read more