श्री वैष्णव लक्षण – ११

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्री वैष्णव लक्षण << पूर्व अनुच्छेद श्रीवैष्णव दिनचर्या (भाग–२) श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी – कालक्षेप गोश्टि पिछले लेख में हमने सामान्य निर्देश देखे कि कैसे एक श्रीवैष्णव इस संसार में रहकर अपना जीवन काल बिताये। अब हम श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी के श्रीवचन भूषण, जो एक दिव्य शास्त्र … Read more

श्री वैष्णव लक्षण – १०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्री वैष्णव लक्षण << पूर्व अनुच्छेद श्रीवैष्णव दिनचर्या (भाग–१) अब तक हमने एक श्रीवैष्णव के बाह्य स्वरूप और आंतरिक स्वरूप के बारें में देखा है। यह भी देखा है कि हमें कौन से अपचारों से बचना चाहिए। अंत में हमने यह … Read more

श्री वैष्णव लक्षण – ९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्री वैष्णव लक्षण << पूर्व अनुच्छेद श्रीवैष्णवों की श्रेष्ठता को समझना – (भाग–२) पिछले लेख में हमने श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी के काम (जो कि आचार्य और पूर्वाचार्य के काम पर आधारित है) से यह देखा कि, किसी के जन्म के आधार पर एक श्रीवैष्णव … Read more

श्री वैष्णव लक्षण – ८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्री वैष्णव लक्षण << पूर्व अनुच्छेद श्रीवैष्णवों की श्रेष्ठता को समझना – (भाग–१) पिछले लेख में हमने कई विशय के अपचारों के बारें में चर्चा की थी| हर एक श्री वैष्णव को इन अपचारों से बचने में ध्यान देना चाहिए। उन सभी … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां नम्पिळ्ळै   1) स्वपक्षत्तै स्थापिक्कवे परपक्षम् निरस्ततमामिरे | नेर्चेय्यप्पुत्तेयुमापोळे |  जैसे चावल को उत्थित कर पीटने से, स्वत: अपतृण विनष्ट हो जाते है, उसी प्रकार जब स्वयं का मत स्थापित हो, अन्य मत स्वत: निरस्त हो जाते है | २) स्वरूपानुसन्धानत्तुक्क … Read more

श्री वैष्णव लक्षण – ७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्री वैष्णव लक्षण << पूर्व अनुच्छेद अपचारों से बचना अपने पिछले लेख में हमने यह देखा कि श्रीवैष्णवों को अपने आंतरिक स्वरूप को कैसे विस्तार करना चाहिए। हमने यह भी देखा कि हमें इन महत्वपूर्ण गुणों से भरपूर श्रीवैष्णवों के सत्संग … Read more

श्री वैष्णव लक्षण – ६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्री वैष्णव लक्षण << पूर्व अनुच्छेद उन श्रीवैष्णवों की स्तुति करना जिनके पास श्रीवैष्णव गुण/ ज्ञान/अनुष्ठान है पिछले लेख में हम श्रीवैष्णव अधिकारियों के गुणों के बारे में देखा था | अब हम फिर से नीचे दिए गए इस तर्क को देखेंगे: … Read more

श्री वैष्णव लक्षण – ५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्री वैष्णव लक्षण << पूर्व अनुच्छेद श्रीवैष्णवों के आंतरिक गुण अब तक हमने श्रीवैष्णवों के बाह्य स्वरूप, पञ्च संस्कार के बारे में जाना है जिससे एक श्रीवैष्णव के जीवन का प्रारंभ होता है और आचार्य–शिष्य के रिश्तो के बारे में जाना … Read more

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) -१३

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । … Read more

श्री वैष्णव लक्षण – ४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्री वैष्णव लक्षण << पूर्व अनुच्छेद गुरू परम्परा अपने पिछले लेख में हमने आचार्य और शिष्य के रिश्ते के बारे में चर्चा की थी। कोई अगर हमें पुछे कि, “हमें अपने और भगवान के बीच में आचार्य की क्या जरूरत है? … Read more