श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः
नायनार् द्वारा सन्यासाश्रम् स्वीकारना
उस समय दक्षीण दिशा से कुछ जन नायनार् के पास आकर नायनार् के हीं परिवार में किसी के मृत्यु का समाचार उन्हें सुनाया जिसके कारण उनका श्रीरङ्गनाथ भगवान के प्रति कैङ्कर्य में बाधा आगई। उन्होंने यह महसूस किया कि उनके लिये जिन्होंने श्रीरङ्गनाथ भगवान के दिव्य चरण उनके सिर पर रखे हैं और उस कृत्य के माध्यम से उन्हें बनाये हैं, भगवान से ऐसे बिछुड़ना उन्हें दु:ख पहुँचा रहा हैं। जैसे कि कहा गया हैं “त्वत्पादपद्म प्रणवात्म वृद्धेः भवन्ति सर्वे प्रतिकूलरूपा:” (दास जो आप श्रीमान के दिव्य चरण कमलों कि सेवा में निरत हैं, यह सभी आप श्रीमान के प्रति कैङ्कर्य के लिये बाधा हैं) वें तुरन्त अपने सहाध्यायी श्रीशठकोप जीयर को मिलने पहुँचे।
चन्दं तस्यैश विग्याय नन्दन् नन्दन् निरन्तरम्।
सर्वं सङ्गंपरित्यज्य तुङ्गं प्रविशदाश्रमम्॥
(श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीशठकोप जीयर स्वामीजी के दिव्य मन को जानकर बहुत प्रसन्न हुए। सभी बंधनों को त्यागकर उन्होंने सन्यासाश्रम में प्रवेश किया), सभी से अपना सम्बन्ध त्यागकर और पूर्ण त्याग और बड़ी करूणा से सन्यासी हो गये। श्रीशठकोप जीयर ने उन्हें त्रीदण्ड [तीन लकड़ीयों से बनी एक छड़ी जो चित्त, अचित्त और ईश्वर का प्रतिनिधित्तव करते हैं] और भगवा वस्त्र अपने दिव्य हस्त से प्रदान किया। उन्होंने श्रीरङ्गनाथ भगवान कि सन्निधी में श्रीशठकोप जीयर् के साथ गये और उनकी पूजा किए। उन्होंने यह श्लोक को गाया
मङ्गळं रङ्गदुर्याय नमः पन्नगशायिने।
मङ्गळं सह्यजामद्ये सान्नित्यकृत चेतसे॥
(श्रीरङ्गनाथ भगवान तक मंगल पहुँचने दो। मैं श्रीरङ्गनाथ भगवान के दिव्य चरणों में नत मस्तक होता हूँ जो श्रीआदिशेष के शेषशैया पर शयन किये हैं। श्रीरङ्गनाथ भगवान तक मंगल पहुँचने दो जिनका दिव्य मन दो कावेरी नदी के मध्य में स्थायी रूप से स्थापित हैं)। भगवान ने भी उन्हें दया से पोषित किया और उनसे कहा कि वें उनके पहिले के दिव्य नाम मणवाळन् को अपने सन्यासाश्रम् नाम के रूप में रखे। उन्होंने कहा “हम आपको पल्लवराज मठ अर्पण कर रहे हैं। जब तक आपका शरीर हैं इस संसार में एम्पेरुमनार् के जैसे रहें” [पहिले पल्लवराज मठ कन्दाडैयाण्डान् जो दाशरथि स्वामिजि (रामानुज स्वामि के मौसेरे भाइ और शिष्य थे) के सुपुत्र ने अपने आचार्य आटकोण्डविल्लि जीयर् के लिए निर्माण किया था। उनके तिरुवाराधन पेरुमाळ् (वह विग्रह जिसकी वो प्रति दिन पूजा करते थे) जिन्हें एन्नैत् तीमनम् केडुत्तार् (श्रीकृष्ण का एक दिव्य नाम क्योंकि वें उनके मन से बुरे विचारों को मिटाते थे) कहकर बुलाते थे के लिये श्रीरङ्गम् के मंदिर में प्रसाद (प्रसाद जो अर्पण किया जाता था) और घी के दीपक [जीयर् स्वामीयों का अग्नि के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता हैं इसलिये वें प्रसाद बना नहीं सकते और दीपक भी नहीं जला सकते हैं] कि व्यवस्था करते थे। उस समय उनके वंशज कुछ आपसी गलतफहमी के कारण उस विग्रह को मन्दिर में दे दिये थे। पहिले के दिनों में रामानुज कोट को पल्लवराज मठ बनाया गया क्योंकि पल्लवरायन् उसकी देख रेख करते थे]। श्रीरङ्गनाथ भगवान ने उस मठ और तिरुवाराधन पेरुमाळ् एन्नैत् तीमनम् केडुत्तार् को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अर्पण किये और जैसे “निसृष्टात्मा सुहृत्सुच” में कहा गया हैं (वह जो अपनी ज़िम्मेदारी अपने मित्रों को सौंपते हैं) भगवान ने भी अपनी ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दी और उन्हें श्रीतीर्थ, प्रसाद, परिवट्टम् और श्रीशठारी दिये। उन्होंने तत्पश्चात श्रीउत्तम नम्बी और अन्य से कहा “अपने अऴगिय मणवाळ जीयर् को उनके मठ कि ओर लेकर जाये”। उन्होंने भी वैसे ही किया और उनकी पूजा कर कहे “अडियार्गळ् वाऴ अरङ्गनगर् वाऴ… मणवाळ मामुनिये इन्नुमोरु नूट्राण्डु इरुम् ” (उनके शिष्य और श्रीरङ्गम् कि उत्थान के लिये ओ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आप और सौ वर्ष रहे)।
श्रीवानमामलै जीयर् और अन्यों के साथ पूरे मठ का पुनर्निर्माण किया गया। उनके आचार्य श्रीशैलेश स्वामीजी के नाम पर उन्होंने एक कालक्षेप मण्टप बनाया। उन्होंने अपने शिष्यों द्वारा श्रीलोकाचार्य स्वामीजी के प्राचीन गृहकी मृत्तिका मंगायी जिसे “रहस्यम् विळैन्द मण” (वह मिट्ठी जहां से सभी गूढ़ार्थ उत्पन्न हुए) और उस स्थान से प्रचार करेंग जहाँ वे संरक्षण के जैसे विराजमान हैं। फिर उस मंडप को ही गुरुकुल मानकर वहाँ अपने स्वाचार्य के दिव्य चरण कमलों को मध्य में विराजमान कर नियमित रूप से कालक्षेप किया। जैसे श्रीशैलेश स्वामीजी श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य नाम से चमके वैसे हीं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी भी श्रीरङ्गनाथ भगवान के दिव्य नाम से चमके। उस समय जब वें मन्दिर को मंगल पहुंचा रहे थे जैसे कि कहा गया हैं “रङ्गमङ्गळ दुर्याय रम्यजामातृयोगिनः” (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का मंगल हो जो मन्दिर का मंगलाशासन् कर रहे हैं) लोग उनके विषय में कहे
आचार ज्ञान वैराग्यै रागारेणच तादृशः।
श्रीमान् रामानुजः सोयमित्याशं सन्मितः प्रजाः॥
(क्योंकि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के रूप, आचरण, ज्ञान और सांसारिक कार्यों से भिन्न में श्रीरामानुज स्वामीजी के समान हैं सभी जन दोनों की प्रशंसा किये कि वें श्रीमान् रामानुज (जिनके पास कैङ्कर्य का धन था) के जैसे हैं)। उनके मन में इतनी दृढ़ता थी कि वें हीं श्रीरामानुज स्वामीजी के अपरावतार हैं। वें उनके दिव्य चरणों के शरण हुए जिसके परिणाम वें विशिष्ट हो गये। उन्होंने कहा “परमपदनिवास पणिपुङ्गव रङ्गपतेः भवनमिदं हिताय जगतो भवतऽधिगतम्” (ओ आदिशेष जो श्रीवैकुंठ लोक में निवास करते हैं! यह श्रीरङ्गम् जो श्रीरङ्गनाथ भगवान का निवास स्थान हैं वह आप श्रीमान द्वारा संसार के रक्षण के लिये हैं)। उन्होंने पेरुमाळ् तिरुमोऴि के १०.१ पाशुर कि ओर बताये “वन्पेरु वानगम् उय्य अमररुय्य मण्णुय्य मण्णुलगिल् मनिसरुय्य तुन्बमिगु तुयर् अगल अयर्वोन्ऱिल्लाच् चुगम् वळर अगमगिऴुम् तोण्डर् वाऴ अन्बोडु तेन्दिसै नोक्किप् पळ्ळि कोळ्ळुम्” (श्रीरङ्गनाथ भगवान दक्षीण दिशा में देखते हुए श्रीरङ्गम् में स्वर्ग और अन्य ऊपरी संसार के उद्दार, खगोलीय, धरती, लोग जो इस संसार में रहते हैं, अपने अनुयायियों को आनंदित महसूस करने के हेतु निवास करते हैं) यह कहते हुए कि जैसे श्रीरङ्गनाथ भगवान इस संसार कि रक्षण हेतु श्रीरङ्गम् को अपना निवास चुना हैं वैसे हीं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी भी श्रीरङ्गम् को हीं अपना निवास स्थान चुने हैं और वें उनके प्रति बहुत संवेदनशील थे।
आदार – https://granthams.koyil.org/2021/08/24/yathindhra-pravana-prabhavam-39-english/
अडियेन् केशव् रामानुज दास्
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