श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
सूत्र १७९ में, “तन्नैत् ताने …”, कहते हुए, अहंकार (अपने स्वरूप को भ्रमित करना, अहंकार) और सांसारिक विषयों (सांसारिक सुख) की क्रूर प्रकृति को अलग-अलग पहचाना गया था, जो आत्मा के सच्चे स्वरूप के लिए विनाशकारी हैं; अब, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी सामूहिक रूप से उस विशिष्ट क्रूरता को पहचान रहे हैं जो दोनों के लिए समान है।
सूत्रं – १८९
इवै इरण्डुम् स्वरूपेण मुडिक्कुम् अळवन्ऱिक्के भागवत विरोधत्तैयुम् विळैत्तु मुडिक्कुम्।
सरल अनुवाद
ये दोनों ही वस्तु न केवल स्वयं के वास्तविक स्वरूप को नष्ट कर देंगी, साथ ही, भागवतों के प्रति शत्रुता उत्पन्न करके व्यक्ति को भी नष्ट कर देंगी।
व्याख्या
इवै …
अर्थात्, उपर्युक्त दोष से ग्रसित ये अहंकार और विषय प्रवाह, आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नष्ट कर देंगे। इतना ही नहीं, ये भागवत अपाचार की विपत्ति को भी जन्म देंगे और उसके द्वारा आत्मा का भी नाश कर देंगे।
स्वरूपेण
स्वेन रूपेण (स्वयं)। भागवत अपाचार करने पर भगवान का क्रोध, अहंकार आदि के कारण सांसारिक सुखों से आसक्त होने से कई अधिक होता है।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/12/srivachana-bhushanam-suthram-189-english/
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