श्रीवचन भूषण – सूत्रं २०४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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जब यह प्रश्न प्रस्तुत किया गया कि यदि कोई ऐसा पुरुष, जो सम्यक् ज्ञान एवं सदाचार से सम्पन्न है और जो भगवद्प्राप्ति का साधनभूत मार्ग जानता है, अनजाने या जानबूझकर भागवतों के प्रति किसी प्रकार का अपचार कर बैठे, तो क्या भगवान् उसे अल्प दण्ड देकर स्वीकार नहीं करेंगे? अथवा क्या यह माना जाए कि उसका वह ज्ञान एवं सदाचार गौण हो जाता है और भागवत-अपचार इतना गंभीर हो जाता है कि वह भगवत्प्राप्ति से वंचित कर देता है? इस प्रकार के संशय पर श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी करुणापूर्वक समाधान प्रदान करते हैं।

सूत्रं – २०४

ज्ञानानुष्ठानन्गळै ओळिन्दालुम्‌ पेऱुक्कु अवर्गळ्‌ पक्कल्‌ सम्बन्धमे अमैगिऱाप्पोले, अवै उण्डानालुम्‌ इळवुक्कु अवर्गळ्‌ पक्कल्‌ अपचारमे पोरुम्‌.

सरल अनुवाद

जिस प्रकार केवल भागवद्सम्बन्ध ही परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पर्याप्त माना गया है, यद्यपि किसी व्यक्ति में ज्ञान तथा अनुष्ठान की पूर्णता न भी हो, उसी प्रकार यदि वे गुण विद्यमान भी हों, तथापि भागवतों के प्रति किया गया अल्पमात्र अपचार भी परम लक्ष्य से वंचित करने के लिए पर्याप्त होता है।

व्याख्या

ज्ञानानुष्ठानन्गळै …

अर्थात् – जैसा कि कहा गया है, “उभाभ्याम् एव पक्षाभ्याम् आकाशे पक्षिणां गतिः। तथा एव ज्ञान-कर्माभ्यां प्राप्त्यते भगवान् हरिः॥” ( जैसे पक्षी आकाश में अपने दोनों पंखों के सहारे गमन करते हैं, उसी प्रकार ज्ञान और अनुष्ठान, इन दोनों के द्वारा ही भगवान् हरि की प्राप्ति होती है) और तिरुविरुत्तम् ५४ में कहा गया है, “वीसुम् सिऱगाल् परत्तीर् विण्णाडु नुङ्गट्कॆळिदु” (हे पंखों वाले पक्षियों! तुम्हारे लिए परमपद की प्राप्ति सरल है)। इस प्रकार, यद्यपि किसी व्यक्ति में सिद्धान्तों का सम्यक् ज्ञान तथा उसके अनुरूप आचरण का अभाव हो, तथापि भागवद्सम्बन्ध को भगवान् की प्राप्ति का स्वतंत्र साधन माना गया है। जैसा कि भारद्वाज-स्मृति में कहा गया है, “पशुर् मनुष्यः पक्षी वा ये च वैष्णवसंस्रयाः। तेनैव ते प्रयास्यन्ति तत् विष्णोः परमं पदम्॥” अर्थात् चाहे कोई पशु हो, मनुष्य हो अथवा पक्षी, यदि वे वैष्णवों की शरण ग्रहण करते हैं, तो उसी सम्बन्ध के कारण वे भगवान् विष्णु के परमधाम को प्राप्त करते हैं। तथा पराशर-स्मृति में कहा गया है, “यं यं स्पृशति पाणिभ्याम् यं यं पश्यति चक्षुषा। स्थावराण्यपि मुच्यन्ते किम्पुनः बान्धवाजनाः॥” (महान् भागवतों के कर-स्पर्श से अथवा उनकी दृष्टि मात्र से जिसे भी स्पर्श या दर्शन प्राप्त होता है, वे पेड़-पौधे होते हुए भी मुक्ति प्राप्त करते हैं, तो फिर उनके सम्बन्धियों के विषय में कहना ही क्या!) इसी प्रकार, यद्यपि किसी व्यक्ति में ज्ञान और अनुष्ठान पूर्ण रूप से विद्यमान हों, तथापि भागवतों के प्रति किया गया अपचार स्वयं में इतना गंभीर होता है कि वह भगवत्प्राप्ति से वंचित करने का स्वतंत्र कारण बन सकता है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/28/srivachana-bhushanam-suthram-204-english/

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